सतपुड़ा के जंगल और आदिवासी बच्चे

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बारिश के दिन हों, आसमान पर घनी बदली छाई हो, कभी-कभी धीरे से बदली की चादर हटा कर सूरज झांक कर कहीं सुनहरी धूप चमका दे, दूर तक जाती हुई काली सपाट सड़क हो, आसपास देर रात या सुबह-सवेरे बरसी रिमझिम बारिश से भीगी, सौंधी सुगंध देती धरती, सड़क के दोनों ओर सागौन और शाल के घने ऊंघते जंगल हों और उस नीम खामोशी में आपके कानों में कवि भवानी प्रसाद मिश्र गुनगुनाते हों-‘सतपुड़ा के घने जंगल!’

बिल्कुल ऐसा ही था जब हम होशंगाबाद के इटारसी शहर से पैंतीस किलोमीटर दूर तक बांध के निकट आदिवासी बच्चों के स्कूल में उनसे मिलने जा रहे थे। शहर से आगे बढ़ते ही सड़क के दोनों ओर फैले सतपुड़ा के घने जंगलों की सम्मोहक वनैली गंध नाक में पहुंची तो जैसे बीजों से फूटें नवांकुरों की तरह मां प्रकृति की उस आदि गंध से मन-मस्तिष्क का एक-एक रेशा जाग उठा।

हम बीस-पच्चीस किलोमीटर इसी तरह जंगल के बीच से गुजरती सड़क पर आगे बढ़ते रहे। बीच-बीच में गाड़ी के विंडस्क्रीन पर बूंदें आ गिरतीं जिन्हें हरीश भाई वाइपर से हटा देते। दाहिने-बाएं टीक यानी सागौन, शाल, तेंदू, बेल और बांस का घना जंगल था। खूबसूरत और शांत पहाड़ी इलाका। हम बेतूल नागपुर रोड पर आगे बढ़ रहे थे। तभी साथी राजेश पाराशर बोले, “सामने वहां ऊपर देखिए।”

मैंने देखा। सड़क के ऊपर ऊंचाई में हाथी द्वार की तरह का विशाल मेहराब बना था। उसके इधर-उधर भी हरियाली में बहुत पुराने मेहराब दिख रहे थे।

“देखा आपने? वह ओवर ब्रिज है जिसके ऊपर रेल की पटरियां बिछी हैं। इस पहाड़ी इलाके में यहां रेल सिर के ऊपर से होकर निकलती है। ब्रिटिश पीरियड का बना ओवरब्रिज है।”

DSCN0301 facebookहम उस ओवर ब्रिज के नीचे से निकले तो सहसा मुझे लगा, कौन जाने कभी हो सकता है भोपाल से यहां इस जगह से होकर हिंदी गजलकार दुष्यंत कुमार भी निकले हों और तब हो सकता है सिर ऊपर इस पुल पर से कोई ट्रेन भी गुजरी हो…हो सकता है तभी दुष्यंत ने लिखा हो-

तू किसी रेल सी गुजरती है

मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं

लेकिन, आश्चर्य। आगे बढ़े तो पता लगा, सड़क पर बने इस पुल के नीचे से ट्रेन गुजरती है! राजेश बोले, “सतपुड़ा की इन पहाड़ियों की यही खासियत है- कहीं तो ट्रेन सिर ऊपर से गुजरती है और कहीं पैरों के नीचे से।”

मैंने कहा, “मैं उत्तराखंड के पहाड़ों का निवासी हूं। मेरे गांव में भी, मेरे बचपन में घने जंगल थे, ऐसे ही घने जंगल। इसलिए मुझे ये पेड़, पहाड़, जंगल सभी बड़े आत्मीय लग रहे हैं।”

हम बेतूल-नागपुर रोड पर आगे बढ़ रहे थे। हम यानी विज्ञान साथी शिक्षक राजेश पाराशर, हरीश भाई और आशी चौहान। यह आशी भी गजब की हिम्मती लड़की निकली। कल रात बारह बजे बाद इटारसी से अपने घर भोपाल को निकली तो कह कर गई, “कल विज्ञान प्रोग्राम मुझे भी सुनना है। मैं सुबह सात बजे की ट्रेन में बैठ कर आ जाऊंगी।” राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान से कल वह भी सम्मानित हुई थी। राजेश जी ने बताया कि वह भी विज्ञान जागरूकता फैलानी वाली टीम की सदस्या है और तथाकथित चमत्कारों की पोल खोलने में उसे महारत हासिल है। वह रात तीन-साढ़े तीन बजे भोपाल पहुंची होगी घर पर और सुबह-सुबह ट्रेन लेकर यहां पहुंच गई है। आना तो 60 किलोमीटर दूर पिपरिया से विज्ञान शिक्षिका सारिका घारू को भी था लेकिन पता लगा, उनकी तबियत अचानक खराब हो जाने के कारण वे नहीं आ सकेंगी। यह विडंबना ही थी क्योंकि आदिवासी बच्चों से मुलाकात की यह पूरी योजना उन्हीं ने तैयार की थी। लेकिन, वे फोन पर हमसे लगातार जुड़ी थीं।

अब हम उस जगह आ गए थे, जहां से हमें बाएं मुड़ना था, घने जंगल में। सामने तवा रिजर्वोयर का बोर्ड दिखा। हमने भीतर प्रवेश किया। दस-पंद्रह किलोमीटर उसी के भीतर चलना था। हम चले भीतर और ओह, कितना घना जंगल! मैं तो देखता ही रह गया कि कानों में फिर कवि की आवाज पड़ी:

झाड़ ऊंचे और नीचे

चुप खड़े हैं आंख मींचे

घास चुप है, कास चुप है

मूक शाल, पलाश चुप है।

वही, कवि भवानी प्रसाद मिश्र की आवाज! जैसे, समझा रहे हों कि देखते रहो, देखते रहो वे घने छोटे-बड़े झाड़, वह फूली हुई कांस और चुपचाप खड़े वे शाल और पलाश के पेड़। मैंने तो उन्हें केवल एक बार 1967-68 में रिवोली सिनेमा, दिल्ली के पास देखा था, किसी लेखक के साथ।

वहीं खड़ा एक विशाल महुए का पेड़ भी दिखा। जंगल की हरियाली के बीच से दूर तक उतरती और उसी हरियाली में गुम होती सड़क दिख रही थी। दाहिनी ओर एक जगह दो-चार लाल, तिकोने ध्वज बंधे दिखे तो मैंने जिज्ञासा से उस ओर देखा। गाड़ी चला रहे हरीश भाई ने कहा, “स्थानीय देवी का मंदिर है। कई बार तो यहां सड़क पार करता बाघ दिख जाता है।”

“बाघ? यहां पर?” मैंने पूछा।

“हां, यहीं पर। वैसे यह पूरा घना जंगल तो बाघों का ही घर है।”

तभी पीछे की सीट से राजेश भाई की आवाज आई, “हम लोग सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के भीतर हैं। यह जंगल उसी का हिस्सा है। काफी बाघ हैं इस टाइगर रिजर्व में।”

थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि राजेश बोले, “गाड़ी रोकिए जरा हरीश भाई” और फिर मेरी ओर देख कर उन्होंने कहा, “आप उतरिए तो।”

मैं गाड़ी से बाहर आया तो उन्होंने कहा, “अब आप इस सड़क पर थोड़ा दूर तक जाकर वापस आइए।”

मैं हैरान कि इन्हें मेरे मन की बात का पता कैसे चला? मैं मन ही मन यही सोच रहा था कि काश बाहर निकल कर इन हरे-भरे जंगलों से निकल रही इस सड़क पर मैं कुछ दूर तक घूम सकता! जंगल की उस खुली हवा में मैंने लंबी सांस ली, वह प्राणवायु दिल्ली के अपने प्रदूषित फेफड़ों में भरी और सड़क पर कुछ दूर तक जाकर वापस लौटा। आशी ने मेरे फोटो खींचे। ऊंघते जंगल का सन्नाटा महसूस कर मैंने कहा, “शायद जंगल के पक्षी भी भोजन की तलाश में दूर निकल चुके हैं। किसी पक्षी की कोई आवाज नहीं सुनाई दे रही है।”

“पक्षी ही नहीं, लगता है तितलियां भी फूलों की तलाश में जा चुकी हैं अन्यथा यहां तो बहुत सारी तितलियां उड़ती रहती हैं। किसी चटख धूप वाले दिन में यहां आएं तो आपको चारों ओर उड़ती हुई तितलियां ही तितलियां दिखाई देंगीं,” साथी राजेश ने कहा। वहां हमें चुप बैठे कुछ बंदर और एक भारी-भरकम लंगूर दिखाई दिया। उसी बीच सारिका का भी फोन आ गया। राजेश आदिवासी बच्चों के स्कूल के प्रधानाचार्य को बताते जा रहे थे कि बस हम पहुंचने वाले हैं।

और, हम तवानगर पहुंच गए, तवा बांध से पांच किलोमीटर पहले। पेड़ों की हरियाली और बांध कर्मियों के छिटपुट आवासों के पास शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पहुंचे। विद्यालय की इमारत के ऐन सामने सागौन के पेड़ों की एक लंबी कतार पर इन दिनों सुनहरे फूलों की बहार आई हुई थी। मैं भाग कर कतार के पहले पेड़ से मिलने गया। लगा, वह बहुत खुश हुआ। विद्यालय में प्रधानाचार्य सिद्धार्थ मित्रा जी हमारा इंतजार कर रहे थे। हम पहुंचे तो बच्चे लंबे बरामदे में कतारों में बैठ गए। विद्यालय में कक्षा छह से बारहवीं तक के करीब 280 बच्चे पढ़ते हैं जो जंगल में बसे चचागांव, जीजागांव जैसे छोटे-छोटे आदिवासी गांवों के बच्चे हैं। उन पुश्तैनी गांवों में गोंड और कोरकू आदिवासी रहते हैं।

DSCN0246 facebookसाथियों ने बताया था कि वे बच्चे थोड़ा कम बोलते हैं। लेकिन, मैं तो उनसे बातें करने आया था, इसलिए मैंने चिड़ियों, पेड़-पौधों, जंगल और जंगल में रहने वाले जानवरों से बात शुरू की। यह उनका विषय था। वे बचपन से इसी वातावरण में पल-बढ़ रहे थे। इसलिए वे धीरे-धीरे बातचीत में शामिल हो गए। तब मैंने उनके साथ जानवरों की आवाजों पर आधारित एक गीत गाया जिसे उन्होंने जम कर  गाया। उस गीत से स्मरण-शक्ति का पता लगता है। यह देख कर खुशी हुई कि उन बच्चों की स्मरण शक्ति बहुत तेज थी। जंगल के जीवन में यह गुण होना बेहद जरूरी है। मैंने उन्हें बताया कि मेरा बचपन भी घने जंगलों में बीता है जिसे जान कर वे बहुत खुश हुए।

फिर पर्यावरण की जानकारी देने के लिए मैं उन्हें प्रोफेसर गजानन की टाइम मशीन में 643 वर्ष पीछे की दिल्ली में, अकबर के शासन काल में और उसके बाद भविष्य में ले गया। बच्चों ने अपने मन की आंखों से खुद देखा कि प्रकृति के साथ मनुष्य ने कितनी छेड़छाड़ की है और किस तरह पर्यावरण बर्बाद होता चला गया। विज्ञान की और भी तमाम बातें हुईं। बच्चों ने कई सवाल भी पूछे। हमने उनसे विदा ली।

DSCN0228 facebookपांच किलोमीटर आगे यानी पास में ही तवा बांध था। तय हुआ कि यहां तक आए हैं तो उसे भी एक नजर देख ही लिया जाए और वहीं खाना भी खाया जाए। यही किया। मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के तवा रिजार्ट में पहुंचे। सामने ही विशाल जलाशय फैला हुआ था, सतपुड़ा की शानदार पहाड़ियों के बीच। नज़र हटाने को मन नहीं करता था। खूबी यह कि जलाशय के बीच-बीच में पहाड़ियों के खूबसूरत टापू दिखाई दे रहे थे। यहां भी हमारे आसपास सागौन के छत्र सुनहरे फूलों से लदे हुए थे। जलाशय की सैर कराने वाली जलपरी नीचे विश्राम कर रही थी। पास में ही एक क्रूज का निर्माण चल रहा था।

20180906_141240 facebookदूर क्षितिज तक जल ही जल! चारों ओर इतनी शांति कि लगता था जैसे हम ध्यान की मुद्रा में बैठे हों और मन की आंखें विशाल जलराशि का अकूत भंडार और हरी-नीली पहाड़ियां देख रही हों। तभी मन में विचार आया- कौन रहता होगा जल में डूबी उन पहाड़ियों पर? क्या वहां वे वन्य जीव या उनकी पीढ़ियां अब भी रहती होंगी, जिनकी दुनिया चालीस वर्ष पहले 1978 में बस उन पहाड़ियों तक सीमित रह गई होगी। सतपुड़ा के खुले जंगल तब उनसे दूर हो गए होंगे। न जाने उनमें से कितने वहां रह गए होंगे और भोजन की तलाश में निकले न जाने उनके कितने साथी तब दूर ही रह गए होंगे।

सोच में डूबा था कि साथी राजेश की आवाज से तंद्रा टूटी “चलें अब? दूसरे स्कूल में भी जाना है।”

हमने तवा रिजार्ट के रेस्त्रां में स्वादिष्ट खाना खाया और तीस किलोमीटर दूर केसला के शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय की ओर चल पड़े। पता लगा साथी राजेश पाराशर वहीं आदिवासी बच्चों को विज्ञान पढ़ाते हैं। आंखों को सुकून देती हरियाली के बीच से केसला पहुंचे। प्रधानाचार्य सुनील सक्सेना जी के साथ ही नवीं और दसवीं के 150 बच्चे हमारा इंतजार कर रहे थे।

DSCN0269 facebookविज्ञान की बातें शुरू हुईं। कुछ किस्से-कहानियां और कुछ छोटे गीत सुना कर तारों भरे आकाश की बातें कीं तो देखा बच्चे आकाश के रहस्यों को जानने के लिए बहुत उत्सुक हो गए हैं। मुझे लगा, उन्हें सौरमंडल की सैर कराने का यही सही समय है। मैंने पूछा, दोस्तों किस बारे में जानना चाहते हो? वे बोले- अंतरिक्ष के बारे में। मैंने कहा, तो चलो तुम्हें सौरमंडल की सैर पर ले चलता हूं। हमारा अंतरिक्ष यान ‘कल्पना’ तैयार है और हम सब अब उसके भीतर बैठे हुए हैं। काउंट डाउन पूरा हो गया है और लो, हमारा अंतरिक्षयान अंतरिक्ष की ओर कूच कर गया है। हम तारों की छांव में लगातार आगे बढ़ रहे हैं। चलो, तारों का एक गीत गाएं। तब बच्चों ने मेरे साथ ‘आसमान में लाखों तारे’ गीत गाया और हम चमकते-धधकते सूरज के पास पहुंच गए। बस, उसके बाद तो हम एक-एक कर आठों ग्रहों और छह बौने ग्रहों की सैर करके पृथ्वी की ओर वापस लौटे। तभी हमें अंतरिक्ष में लंबी पूंछ लहराता हुआ धूमकेतु दिखाई दिया। हमने वायुमंडल में प्रवेश किया और अंतरिक्ष से अपनी प्यारी और निराली पृथ्वी को देखा। उसके बाद अपने देश भारत को देखा। हम सतपुड़ा के ऊंचे पहाड़ों के बीच से केसला में शासकीय उत्कृष्ट DSCN0274 facebookविद्यालय के हाल में सुरक्षित उतरे और सभी ने मिल कर जीवन का गीत गाया।

उसके बाद विज्ञान शिक्षक राजेश पाराशर जी का बड़े मन और मेहनत से बनाया विज्ञान का प्रदर्शनी कक्ष देखा जिसके द्वार पर आदिवासी कोरकू भाषा में लिखा था, ‘अले विज्ञान सिखाऊ’ यानी हमें विज्ञान सीखना है! उस विज्ञान कक्ष को देखना एक अद्भुत अनुभव रहा। आश्चर्य हुआ कि एक समर्पित शिक्षक और विज्ञान संचारक चाहे तो क्या नहीं कर सकता! उस कक्ष में विज्ञान के न जाने कितने शानदार माडल रखे थे जिनमें राकेट भी शामिल थे तो माइक्रोस्कोप में देखते राष्ट्रपिता गांधी और मुस्कराते मिसाइल मैन डा. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम भी थे। वहां अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स भी थीं। पूरा सौरमंडल वहां दिखाई दे रहा था। यहां तक कि पृथ्वी की तुलना में अन्य ग्रहों पर वहां के गुरूत्वाकर्षण के बरक्स हम अपना वजन भी देख सकते थे। मैं तो वह सब देख कर सचमुच चकित रह गया। यह सब उस शिक्षक साथी राजेश का काम था जो दो दिन से चुपचाप हमारे साथ चल रहे थे। उन्होंने उस कक्ष में उस अनोखे आदिवासी कारीगर राजेश से भी मिलाया जो आरी, कटर और छेनी-हथौड़ी लेकर राजेश जी की कल्पना को जीवंत माडल में साकार करता है।

DSCN0359 facebookइस बीच साठ किलोमीटर दूर से सारिका फोन पर कार्यक्रम और हमारी यात्रा की जानकारी लेती रहीं। बच्चों से विदा लेकर हम इटारसी को वापस लौटे। वहां तय किया कि अगले दिन मैं और हरीश चौधरी केसला से आगे भरगदा गांव में एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय के बच्चों के पास जाएंगे। यही किया, सुबह मैं हरीश भाई के साथ लगभग 35 किलोमीटर दूर उसी बैतूल-नागपुर रोड पर एकलव्य विद्यालय के लिए निकल गया। रात में बारिश होने के कारण हवा में सौंधी सुगंध, हल्की ठंडक और नमी थी। हम सागौन, शाल और दूसरे पेड़ों की छांव में केसला पहुंचे और वहां से फोन पर साथी राजेश से आगे का रास्ता पूछ कर बाईं ओर भरगदा गांव पहुंच गए। विद्यालय पहुंचने से ठीक पहले सागौन का एक किशोर पेड़ दिखा। खूब खुश था वह। उस पर भी सुनहरे फूलों की बहार आई हुई थी। विद्यालय के पास पुलिया पर मुझे आदिवासी सोनू युवबे बैठे हुए मिले। मैंने उनसे उनके गांव का नाम पूछा तो वे बोले, ‘कालाआखर’।

मैं चौंका, हैं! यह नाम तो मेरे गांव कालाआगर के नाम से मिलता-जुलता था! तब मैंने उनसे कहा, “मेरे गांव का नाम भी ऐसा ही है- कालाआगर”। वे मुस्कराए। पूछने पर पता लगा वे अपनी ग्यारह-बारह वर्ष की बिटिया महक से मिलने आए हुए हैं। महक एकलव्य विद्यालय में कक्षा-6 में पढ़ती है। उन्हें बिटिया के आधार कार्ड में केसला ब्लाक आफिस से कुछ नई सूचनाएं जुड़वाने के लिए आए थे। उनसे मिल कर स्कूल में गया। वहां दशरथ ध्रुवे जी और अन्य शिक्षक मिले। विद्यालय के करीब 350 बच्चे मेरा इंतजार कर रहे थे। प्रधानाचार्य श्री बी. आर. मगरकर का भोपाल से फोन आया उन्हें जरूरी शासकीय कार्य से वहां जाना पड़ा। वे ये जानकर बहुत खुश हुए कि उनके विद्यालय के बच्चों से विज्ञान की बातें की जाएंगी। एकलव्य आदर्श विद्यालय विज्ञान की पढ़ाई को ही समर्पित है, आवासीय विद्यालय है और केवल आदिवासी बच्चों को शिक्षा देने के लिए स्थापित किया गया है।

बच्चों से विज्ञान की बातें शुरू हुई और उन्हें प्रकृति, पर्यावरण और तमाम दूसरी बातों के बारे में मजेदार किस्से सुनाए। स्मरण शक्ति का पता लगाने के बहाने उनके साथ भी गीत गाया। यह देख कर खुशी हुई कि उन बच्चों की भी बहुत अच्छी स्मरण शक्ति है। फिर अपने गांव के जंगलों, वन्य जीवों और चिड़ियों के बारे में बातें करते-करते उन्हें भी टाइम मशीन में अतीत और भविष्य की सैर कराई। उन्होंने इतिहास में प्रकृति का विनाश होते देखा और अनुभव किया कि अगर यही हाल रहा तो भविष्य में क्या हो सकता है। बच्चों ने एक स्वर से कहा कि हमें हरे-भरे जंगल चाहिए, पेड़-पौधे चाहिए, चिड़ियां और तितलियां चाहिए। मैंने कहा, दोस्तो अगर तुम आज इन सबको बचाओगे तो कल की दुनिया हरी-भरी और निराली होगी। फिर हमने मिल कर जीवन का गीत गाया। बच्चों से विदा लेकर हम इटारसी लौट आए।

विज्ञान संचारक साथियो के स्नेह से भीगा मैं शाम की ट्रेन पकड़ने के लिए हरीश भाई के साथ स्टेशन पहुंचा। मुझे तमिलनाडु एक्सप्रेस से दिल्ली लौटना था। ट्रेन बस पहुंचने ही वाली थी कि होटल का एक युवा साथी मेरे रात के भोजन के लिए पराठा और दही लेकर भागता हुआ प्लेटफार्म पर पहुंच गया। यह हरीश भाई और उसकी अपनी व्यवस्था थी। यह आत्मीयता की डोर से बांध लेने वाले इटारसी में ही हो सकता था। उन साथियों और इटारसी को अलविदा कह कर मैं दिल्ली लौट आया।

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