विज्ञान के मनोहरश्याम जोशी

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आज (9 अगस्त) प्रसिद्ध लेखक मनोहरश्याम जोशी जी का  जन्मदिन है। विज्ञान लेखकों की जिस पीढ़ी ने सन् साठ-सत्तर में लोकप्रिय पत्रिका ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में लिखा, उन्हें उनकी यह बात शायद आज भी अच्छी तरह याद होगी कि जटिल विज्ञान भी पठनीय हो सकता है बशर्ते उसे अच्छी तरह समझ-बूझ कर सरल-सहज भाषा और रोचक शैली में लिखा जाए। उन्होंने हिंदी विज्ञान लेखन को ऐसी ही साहित्यिक सरसता के साथ आगे बढ़ाने में भरपूर योगदान दिया और इस बात को सुनिश्चित किया कि सरसता में भी विज्ञान बना रहे। उन्होंने उस दौर के हिंदी विज्ञान लेखकों की पूरी पीढ़ी को पठनीय विज्ञान लिखने के लिए प्रोत्साहित किया और उनकी रचनाओं में अपने चकित कर देने वाले चुनिंदा शीर्षक जड़ कर पाठकों को विज्ञान पढ़ने के लिए प्रेरित किया। विज्ञान के हर छपे हुए लेख पर उनकी छाप होती थी। यही कारण था कि साठ और सत्तर के उन दशकों में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ का विज्ञान कथा-कहानी-सा रोचक और पठनीय विज्ञान बन गया था। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की हर वैज्ञानिक हलचल पठनीय रूप में पाठकों को मिलने लगी थी और वे इस तरह के नए विज्ञान लेखन के लिए हम जैेसे नए विज्ञान लेखकों को लेखन की दीक्षा दे रहे थे। ऐसे थे वे हम विज्ञान लेखकों के संपादक मनोहर श्याम जोशी जिनकी अब केवल स्मृति शेष है।

‘कुरू-कुरू स्वाहा’, ‘कसप’ ‘क्याप’ तथा ‘हमजाद’ जैसे गंभीर उपन्यासों के रचयिता, साहित्य अकादमी से सम्मानित साहित्यकार और ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’, ‘हमराही’ तथा ‘गाथा’ जैसे अपने बहुचर्चित दूरदर्शन धारावाहिकों से करोड़ों लोगों की प्रशंसा पाने वाले बहुपठित बहुश्रुत मनोहर श्याम जोशी विज्ञान में गहरी रूचि रखते थे।  वे हर नई वैज्ञानिक उपलब्धि की जानकारी अपने पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास करते थे। उनके लिए कहा जाता था कि लोकप्रिय विज्ञान के क्षेत्र की कोई भी बहु चर्चित पुस्तक उनके पास मिलेगी और वे उसे पढ़ चुके होंगे। ‘द डबल हेलिक्स’ पुस्तक के साथ यही हुआ। डी. एन. ए. के खोजकर्ता जेम्स वाटसन, फ्रैंसिस क्रिक और मौरिस विल्किंस को 1962 में शरीर क्रिया विज्ञान (चिकित्सा) का नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। 1968 में न्यूयार्क में जेम्स वाटसन की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द डबल हेलिक्स’ प्रकाशित हुई तो जोशी जी पढ़ने के लिए बेचैन! वरिष्ठ विज्ञान लेखक कैलाश साह ने एक दिन बताया- ‘जोशी जी के पास ‘द डबल हेलिक्स’ आ चुकी है और वे पढ़ चुके हैं। उनके जरिए हम भी ‘द डबल हेलिक्स’ के दर्शन कर सके। लेकिन, हिंदी के पाठक को डी. एन. ए. के बारे में कैसे पता लगे? तो, संपादक मनोहर श्याम जोशी ने डी. एन. ए. की खोज कथा और उस खोज की भावी संभावनाओं के बारे में तत्काल अपने पाठकों के लिए स्वयं लिखा। इसी प्रकार अनेक ज्वलंत वैज्ञानिक विषयों पर वे यदा-कदा लिखते रहते थे।

अपनी पत्रिका में सामायिक विषयों पर विज्ञान संबंधी लेख लिखने के लिए वे विज्ञान लेखकों से आग्रह भी करते थे। 1968 में मैक्सिको में आयोजित ओलंपिक खेलों के अवसर पर अचानक उनका फोन आया- ‘खेलों में शारीरिक क्रियाओं पर जो प्रभाव पड़ता है उस पर लेख भेजो।’ तो, शरीर पर खेलों के दबावों-तनावों पर लेख भेजा और आगामी अंक में ‘खेल में दर्दे दिल गुनाह होता है’ जड़े शीर्षक के साथ अपना लेख पढ़ कर दिल बाग-बाग हो गया।

जनवरी 1969 का तीसरा सप्ताह रहा होगा। मैं पूसा इंस्टीट्यूट में अनुसंधान कार्य से जुड़ा हुआ था। फोन पर उन्होंने गांधी शताब्दी पर फरवरी प्रथम सप्ताह में प्रकाश्य अंक के लिए वैज्ञानिक लेख भेजने को कहा। मैं चैंका- गांधी जन्म शताब्दी और विज्ञान? उनसे कहा तो बोले, ‘क्यों, विज्ञान में अहिंसा पर लिखो। जे. बी. एस. हाल्डेन के विचार दो’। हाल्डेन की पुस्तकें खोजीं। उन्हें पढ़ा और लिखा। उस महान वैज्ञानिक से मेरा वही पहला परिचय था। उन्हें पढ़ कर पता लगा कि स्वाभिमान के साथ व्यक्ति कैसे जी सकता है। यह भी तभी पता लगा कि जे. बी. एस. हाल्डेन वैज्ञानिक ही नहीं सिद्धहस्त विज्ञान लेखक भी थे।

2 फरवरी 1969 के अंक में मेरा लेख प्रकाशित हुआ- ‘विज्ञान में अहिंसाः गांधी और हाल्डेन’। लेकिन, घोर आश्चर्य तो तब हुआ जब उसी अंक में गपशप स्तंभ के अंतर्गत उनकी रचना ‘दुर्वासा का सुयोग्य उत्तराधिकारी’ पढ़ी जिसकी शुरूआत यों थीः ”जे. बी. एस. हाल्डेन, जिनके विज्ञान और अहिंसा संबंधी विचार इसी अंक में अन्यत्र प्रकाशित हैं, उस जाति के जीव थे जिसे अंगे्रजी में ‘करैक्टर’ और हिंदी में ‘एक ही’ कहा जाता है।“ प्रसिद्ध वैज्ञानिक जे. बी. एस. हाल्डेन पर लिखी वह अद्भुत रचना थी। वे चाहते तो अंक में उनकी ही रचना काफी थी लेकिन फिर नए विज्ञान लेखक को लिखने की दीक्षा कैसे देते?

एक ही लेख में जिन विषयों पर विचार नहीं किया जा सकता, उन पर उन्होंने विशेष लेखमालाओं के प्रकाशन की परंपरा प्रारंभ की। ‘कम्प्यूटर और समुद्र विज्ञान’ पर लेखमालाएं छपीं और चर्चित हुईं। फिर वरिष्ठ विज्ञान लेखक रमेश दत्त शर्मा ने अपनी विशेष शैली में ‘विरासत में मिली बीमारियां’ लेखमाला लिखी। 1968 का नोबेल पुरस्कार भारतीय मूल के डाॅ. हरगोविंद खुराना को मिल चुका था। इसलिए आनुवंशिकी विज्ञान चर्चा के केंद्र में था। ऐसे समय में पाठकों को तेजी से प्रगति कर रहे आनुवंशिकी विज्ञान या जेनेटिक्स पर और अधिक जानकारी देने के विचार से उन्होंने 18 मई 1969 अंक से मेरी लेखमाला ‘जीवन के सूत्रोें की खोजयात्रा’ प्रकाशित की, जिसके कुछ शीर्षक उन्होंने अपनी भाषा में गढ़े जैसे  ‘मक्खियों के ब्याह रचाए, तब जाकर ये उत्तर पाए’, ‘विधाता के बही खाते की भाषा कौन पढ़ेगा?’ अंतिम किस्त ‘इक्कीसवीं सदी की झांकी’ मैंने तत्कालीन सोवियत संघ के प्रसिद्ध आनुवंशिकीविद् प्रोफेसर निकोलाई पी. दुबिनिन से इंटरव्यू के आधार पर तैयार की थी।

रमेश वर्मा, गुणाकर मुले, रमेश दत्त शर्मा उस दौर के सम्मानित विज्ञान लेखक थे। कभी-कभार भेंट होने पर वे इन विज्ञान लेखकों के लेखन पर चर्चा करते थे और उनके लेखन की विशेषताएं बताते थे ताकि हम जैसे अपेक्षाकृत नए विज्ञान लेखकों का मार्गदर्शन हो सके। उन्हीं दिनों विश्व भर में ‘द बायोलाॅजिकल टाइम बम’ पुस्तक का धमाका हुआ। जोशी जी ने आदतन सबसे पहले पुस्तक पढ़ी और इस विषय पर रमेश दत्त शर्मा से लेखमाला की दरकार की। वह लेखमाला बेहद चर्चित हुई और पाठकों को जीवविज्ञान के क्षेत्र में हो रही खोजों और उनकी संभावनाओं का पता लगा। परखनली शिशु और क्लोनिंग तब कल्पना भर थे लेकिन लेखमाला से पाठकों को उनके संभव होने की आहट मिल गई थी।

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में चिकित्सक डाॅ. अनिल चतुर्वेदी की रचनाएं प्रकाशित हो रही थी। शरीर के विभिन्न अंगों पर उनकी एक रोचक लेखमाला छपी। जोशी जी ने कैलाश साह को चिकित्सा विज्ञान पर लिखने के लिए उकसाया और फल यह हुआ कि उन्होंने कई वर्षों तक चिकित्सा विज्ञान पर चिकित्सकों से इंटरव्यू आधारित घनघोर लेखन किया और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में शल्य चिकित्सा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डाॅ. आत्माराम के साथ ‘आधुनिक शल्य चिकित्सा के वरदान’ पुस्तक लिखी। पाठकों के लिए विषय की उपादेयता को देखते हुए जोशी जी ने ‘स्वास्थ्य’ विशेषांकों की परंपरा प्रारंभ की। डाॅ. हरि वैष्णव जैसे वरिष्ठ चिकित्सक ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रायः लिखने लगे।

उन्होंने बाल विज्ञान को भी बढ़ावा दिया। बच्चों के लिए वैज्ञानिक विषयों पर रोचक लेखों के अतिरिक्त लेखमालाएं भी प्रकाशित कीं। ‘आग की कहानी’ (रमेश वर्मा), ‘वैज्ञानिकों का बचपन’ (रमेश दत्त शर्मा), ‘पशुओं की प्यारी दुनिया’ (देवेंद्र मेवाड़ी), ‘कीड़ों की कहानी कीड़ों की जुबानी’ (प्रमोद जोशी) जैसी लेखमालाएं विज्ञान के प्रति उनकी गहरी रूचि और बाल पाठकों को विज्ञान की दुनिया से परिचित कराने के प्रयास का प्रमाण हैं।

हिंदी में विज्ञान कथा विधा को आगे बढ़ाने में मनोहर श्याम जोशी का बड़ा योगदान है। वे विज्ञान कथाओं के रसिक थे और विश्व विज्ञान कथा साहित्य के गंभीर पाठक भी। हाल ही में अजित राय को दिए गए अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘मैं कुछ वैज्ञानिक कथा साहित्य लिखना चाहता हूं।’ उस समय की अत्यधिक लोकप्रिय पत्रिका ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में ‘विज्ञान कथा विशेषांक प्रकाशित करके उन्होंने हिंदी जगत का ध्यान इस विधा की ओर आकर्षित किया। हिंदी पाठकों को पढ़ने के लिए मौलिक विज्ञान कथाओं के साथ ही विश्व की चुनिंदा चर्चित विज्ञान कथाओं के अनुवाद भी दिए। गुणाकर मुले और रमेश दत्त शर्मा जैसे वरिष्ठ विज्ञान लेखकों से विज्ञान कथाओं के अनुवाद कराए। जिस किसी विज्ञान लेखक में उन्होंने विज्ञान कथा सृजन के बीज देखे उन्हें अंकुरित होने का अवसर दिया। ‘दिनमान’ के दिनों से ही वे इस विधा में रमेश वर्मा की प्रतिभा को पहचानते थे। उन्होंने 1969 में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में  पाठकों के लिए रमेश वर्मा की वैज्ञानिक उपन्यासिका ‘अंतरिक्ष के कीड़े’ प्रकाशित की। ‘विज्ञान कथा विशेषांक’ में पाठकों को रमेश दत्त शर्मा की विज्ञान कथा ‘हरा मानव’ तथा अन्य कहानीकारों की कहानियां पढ़ने को मिलीं। उसी बीच उन्होंने कैलाश साह को विज्ञान कथाएं लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। उनकी मनुष्य और मशीन के रिश्ते पर लिखी गई ‘मशीनों का मसीहा’ चर्चित विज्ञान कथा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में ही प्रकाशित हुई। जोशी जी ने कैलाश साह के विज्ञान कथा संग्रह ‘मृत्युंजयी’ की भूमिका में लिखा- ‘हिंदी में अब तक विज्ञान कथा लेखन का क्षेत्र लगभग अछूता ही रहा है। शायद इसलिए कि यह काम आसान नहीं। उत्कृष्ट विज्ञान कथाओं के सृजन के लिए यह जरूरी है कि विज्ञान के आधुनिकतम आविष्कारों, उनकी संभावनाओं और वर्तमान सामाजिक परिवेश और दायित्व बोध से भली-भांति परिचित होने के साथ ही लेखक रोचक, बोधगम्य शैली का भी धनी हो।’ वे विज्ञान कथाओं की भूमिका को पूरी तरह पहचानते थे। उनके शब्दों में- ”पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बीच के वर्षों में विज्ञान की प्रगति इतनी तेज हो गई कि ट्रांजिस्टर और कम्प्यूटर क्रांति ने कई क्षेत्रों में विज्ञान कथा लेखकों की कल्पना को भी कहीं पीछे छोड़ दिया। वैज्ञानिक आविष्कारों से आम आदमी आज बुरी तरह आक्रान्त हैं। वैज्ञानिक ‘सच’ और विज्ञान की सम्भावनाओं से अपरिचित कोई भी व्यक्ति अपने को साक्षर नहीं कह सकता। इस सन्दर्भ में विचारोत्तेजक चुनौतियों का सामना दुनिया के लगभग सभी देशों के विज्ञान कथा लेखक कर रहे हैं। आर्थर क्लार्क, आइसक आसिमोव, रे ब्रेडबरी, कर्ट वानगेट के नाम विज्ञान कथाओं के माध्यम से ही अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। इनमें आने वाले कल के बारे में दस तरह की रोचक अटकलें तो हैं ही, मशीन और मनुष्य के जटिल, अनिवार्यतः कृत्रिम रिश्ते के बारे में दार्शनिक कुतूहल का अभाव भी नहीं है।“ 1979 में उन्होंने ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में मेरी पहली वैज्ञानिक उपन्यासिका ‘सभ्यता की खोज’ प्रकाशित की जिसे कथा के अनुरूप भरपूर वैज्ञानिक चित्रांकन के साथ प्रस्तुत किया गया था।

मनोहर श्याम जोशी हम विज्ञान लेखकों के लिए दिशा निर्देशक थे। उन्होंने हिंदी विज्ञान लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को प्रोत्साहित करके विज्ञान और विज्ञान कथा लेखन को आगे बढ़ाया।

उनकी स्मृति को सादर नमन।

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