2050 की दुनिया

 

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इक्कीसवीं सदी के मध्यकाल में खड़ा हूं। चकित होकर देख रहा हूं चारों तरफ कि कितनी बदल गई है यह दुनिया! चारों तरफ ये विशाल गगनचुंबी हरी-भरी इमारतें! हां, हरी-भरी, क्योंकि नीचे धरती पर तो जहां-जहां तक नजर जाती है, वहां तक सीमेंट-कंक्रीट का शहर ही दिखाई दे रहा है। फिर, हरियाली कहां उगे? पहले कदम-दर-कदम समतल यानी पड़ा विकास हुआ। ज़मीन में जगह नहीं बची तो वर्टिकल यानी खड़ा विकास शुरू हो गया। बिना हरियाली के तो जी नहीं सकते न? जीने के लिए प्राणवायु चाहिए। इसलिए इन आसमान छू रही इमारतों की हर मंजिल को पेड़-पौधों से हरा-भरा बना दिया गया है। इनके विशाल फ्लोरों पर खेत हैं, नन्हीं बगियां और बागीचे हैं। जलकुंडों और तालाबों में भी खेती की जा रही है। यानी, अब थल की खेती जल में हो रही है। इन्हीं फ्लोरों पर हरी घास के कालीन जैसे मैदान हैं और बाहरी दीवारों पर हरी-भरी बेलें लटकी हैं। इसी हरियाली से इस शहर को प्राणवायु आक्सीजन मिलती है। एक-एक विशाल इमारत अपने-आप में ही मिनी शहर है। बाजार, सड़कें, खेल के मैदान, खेत-खलिहान और घर सभी यहीं है।

सोचता हूं, यह तो होना ही था। आखिर आज दुनिया की आबादी करीब 9 अरब हो चुकी है। उन सब के लिए इतनी जमीन और मकान आखिर कहां से आएंगे। इसलिए इन इमारतों के मिनी शहरों में ही आवास, भोजन, पर्यावरण, यातायात, शिक्षा, रोजगार और मनोरंजन की व्यवस्था कर दी गई है। इन ऊंची-ऊंची इमारतों में फैली सड़कों पर और इनके बाहर भी बिना ड्राइवर के अपने-आप चलने वाली मोटरगाड़ियां दौड़ती रहती हैं। इमारतों के सभी फ्लैट भी बहुत बुद्धिमान हो गए हैं। उनमें शाम ढलते ही खुद रोशनी हो जाती है, कमरों में सर्दी और गर्मी का हिसाब लगा कर अपने-आप तापमान तय हो जाता है, पूरा रसोई घर नए उपकरणों और मशीनों से भरा है, फ्रिज अपने-आप ही बता देता है कि उसके भीतर किस सामान की कमी हो गई है।

एक बात और, हमारे घरों में अब जितनी भी बिजली काम आती है वह सब सौर ऊर्जा से तैयार होती है। इसके अलावा परमाणु ऊर्जा से पहले जितना डर लगता था अब उसका उपयोग घातक बम बनाने के बजाए बिजली बनाने में किया जा रहा है।

अब तो हमारे घरों, आफिसों और कल-कारखानों में बड़ी संख्या में रोबोट काम करने लगे हैं। घर भीतर के काम ज्यादातर वे ही करते हैं। इसके अलावा परमाणु भट्टियों और दूसरी खतरनाक जगहों पर भी अब आदमियों की बजाए रोबोट की काम कर रहे हैं। पापा बताते हैं कि करीब तीस-चालीस साल पहले ही कुछ देशों में रोबोट कई तरह के काम करने लगे थे। चीन और जापान में होटलों, रेस्त्राओं और घरों में रोबोटों का काम करना शुरू हो गया था। वे स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने भी लगे थे। अब तो हमारे ज्यादातर स्कूल-कालेजों और विश्वविद्यालयों में कई विषय रोबोट शिक्षक ही पढ़ा रहे हैं। वह यह भी बताते हैं कि सऊदी अरब ने तो अपने रोबोट ‘सोफिया’ को पहली बार नागरिकता भी प्रदान कर दी थी। रोबोट इतिहास में आज भी वही दुनिया की पहली रोबोट नागरिक मानी जाती है। ‘सोफिया’ भारत भी आई थी।

हमारे घरों के भीतर तो एयरकंडीशनिंग से जरूर ठंडा तापमान रहता है लेकिन गगनचुंबी इमारतों के हमारे महाकाय नगरों में बाहर भीषण गर्मी पड़ती है। सुना है मौसम पहले इतना गर्म नहीं होता था लेकिन ग्लोबल वार्मिंग यानी वैश्विक तपन के बढ़ते-बढ़ते पूरी धरती में अथाह गर्मी पड़ने लगी है। टेलीविजन समाचारों से पता लगता है कि हमारी पृथ्वी के दोनों ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है। गर्मी के कारण ग्लेशियर भी पिघल रहे हैं। इसका फल यह हुआ है कि नदियों में भीषण बाढ़ आने लगी है और सागर तटों के इलाके काफी भीतर तक पानी में डूब गए हैं। मालदीव, बांग्लादेश और दुनिया के कई द्वीप समूह जलमग्न हो रहे हैं। वैश्विक तपन बढ़ने के कारण आई बाढ़ से दुनिया भर में फसलों को बहुत नुकसान पहुंच रहा है। इस कारण अनाज की कमी होती जा रही है। कई देशों में तो अकाल पड़ चुका है। लोग पलायन करने लगे हैं। विकासशील देशों से यूरोप और अमेरिका की ओर लोग बड़ी संख्या में जाने लगे हैं। इस कारण वहां राजनैतिक परेशानियां पैदा होने लगी हैं।

सुना है पहले तक लोग इलाज के लिए डाक्टरों के पास जाते थे लेकिन हमारे इस पूरे मिनी शहर में किसी को किसी डाक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ती है। हर घर में स्कैनर है। उससे हम पूरे शरीर की स्कैनिंग कर लेते हैं। स्कैनर का डाटा हेल्थ नेटवर्कं में चला जाता है जहां विशेषज्ञ डाक्टर उसे देखते हैं और नेटवर्क से ही इलाज सुझा देेते हैं। लेकिन, इस बात की बहुत चर्चा है कि अब कृत्रिम बुद्धि और आनुवंशिक हेर-फेर से वैज्ञानिक सुपर ह्यूमन यानी महामानव बना लेंगे। यह मनुष्यों की वैज्ञानिक तरीके से तैयार की गई उन्नत प्रजाति होगी जिस पर बीमारियों का असर कम होगा और ऐसे लोग प्रतिकूल वातावरण को भी काफी हद तक सह लेंगे। सुना है, बहुत पहले दुनिया में पहली बार चीन में जीन-एडिटिंग का सफल प्रयोग किया गया था। अब तो इस विधि का काफी उपयोग किया जा रहा है। जन्म से पहले ही भ्रूण में जीन एडिटिंग करके मनचाहे डिजायनर बच्चे पैदा किए जा रहे हैं। इस विधि से आनुवंशिक रोगों को भी गर्भ में ही दूर किया जा रहा है। प्राकृतिक विधि के बजाए अब कृत्रिम गर्भाधान और टेस्ट ट्यूब बेबी की तकनीक से बच्चे अधिक जन्म ले रहे हैं। वैज्ञानिकों के लिए शरीर के किसी भी अंग विशेष के जीनों में हेर-फेर करके उसे बेहतर बनाना भी संभव हो गया है। जैसे, इस विधि से बेहतर बनाए गए फेफड़े अब और अधिक आक्सीजन सोखते हैं। इसी तरह शरीर की कोशिकाएं भी अधिक सक्षम हो गई हैं। वे विकिरण को भी सह लेती हैं। मस्तिष्क के न्यूरान यानी तंत्रिका कोशिकाओं का आकार बढ़ा कर दिमागी कुशलता भी बढ़ाई जा रही है। इसके कारण शरीर पलक झपकते निर्णय लेने में सक्षम हो जाएगा, यहां तक की सामने से अगर गोली चल रही हो तो व्यक्ति गोली के पास आने से पहले ही उस जगह से हट जाएगा!

यह सब कुछ तो ठीक, लेकिन इससे एक समस्या भी बढ़ रही है। इलाज की बेहतरीन सुविधाएं होने के कारण सभी लोगों का जीवनकाल बढ़ रहा है। जो लोग दिमागी तौर पर कमजोर हैं, वे भी लंबी उम्र जी रहे हैं। डार्विन का सिद्धांत ‘सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट’ आज के समाज में गड़बड़ा गया है। जो लोग अधिक बुद्धिमान हैं और जिनमें जीव विज्ञान की दृष्टि से सद्गुण भी अधिक हैं, वे समझदारी के कारण कम संतानें पैदा कर रहे हैं। लेकिन, जो लोग दिमागी तौर पर कमजोर हैं, वे कई संतानों का जन्म दे रहे हैं। इस कारण धीरे-धीरे समाज में अवगुणों वाले जीन बढ़ सकते हैं जिससे कल मनुष्य प्रजाति कमजोर पड़ सकती है। लेकिन, एक राहत की बात भी है। दुनिया भर में लोग जाति, धर्म को भुला कर प्रेम विवाह भी अब खूब करने लगे हैं। इस तरह विभिन्न जाति, धर्मों के लोगों के जीन मिल कर बेहतर संतानों को जन्म दे रहे हैं। लगता है आने वाले समय में यह प्रवृत्ति बढ़ती जाएगी।

एक बात तो समझ में आती है कि मानव जाति में जीनों के हेर-फेर और कृत्रिम बुद्धि के मेल से सक्षम सुपर ह्यूमन तो तैयार हो जाएंगे लेकिन संस्कृति का क्या होगा? कुछ वैज्ञानिक कह रहे हैं कि अब मनुष्य जाति को रोग तथा महामारियों का इतना खतरा नहीं है जितना पुरानी सांस्कृतिक मान्यताओं का। विज्ञान जहां मनुष्य को लंबी उम्र दे रहा है वहीं धार्मिक कट्टरता आपस में वैमनस्य पैदा कर रही है। इसलिए धार्मिक टकराओं का खतरा बढ़ता जा रहा है। आंतक के बादल गहरा रहे हैं। समाज विज्ञानियों को इसका कोई समाधान जरूर खोजना चाहिए।

ग्लोबल वार्मिंग से भले ही नुकसान बहुत अधिक हो रहा है लेकिन इससे धीरे-धीरे एक विषमता भी दूर हो रही है। यह विषमता है काले, भूरे और गोरे रंग की। वैश्विक तपन बढ़ने के कारण मनुष्य का रंग गहरा रहा है और लोग अधिक काले होते जा रहे हैं। विषुवतरेखीय प्रदेशों की तरह गर्म मौसम में शरीर के बचाव के लिए प्रकृति चमड़ी को काला रंग देने वाले रंग द्रव्य मेलेनिन की मात्रा बढ़ा रही है। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि इस तपन के कारण मनुष्य शरीर भी पतला होता चला जाएगा। शरीर का क्षेत्रफल जितना ही कम होगा, धूप से उतना ही अधिक बचाव भी हो जाएगा! इतना ही क्यों, वे तो यह भी कह रहे हैं कि मनुष्य की कद-काठी भी धीरे-धीरे बदलती जाएगी। सिर बड़ा होता चला जाएगा और नाक भी सीधी हो जाएगी। कम रोशनी में रहने की आदत बढ़ेगी या कल अगर मनुष्य चंद्रमा तथा मंगल ग्रह में बस्तियां बना कर रहने लगेगा तो उसकी आंखें भी काफी बड़ी हो जाएंगी। एक अंदेशा यह भी है कि डीएनए में बदलाव के कारण आंखें लाल भी हो सकती हैं।

और हां, अब तो सैर-सपाटे के शौकीनों के लिए अंतरिक्ष की सैर का रास्ता भी खुल गया है। कई प्राइवेट अंतरिक्ष एजेंसियां ऐसे सैलानियों को अपने उपग्रह में बैठा कर पृथ्वी की कक्षा में घुमा रही हैं। लेकिन, यह तो केवल आज भी अमीरों के लिए ही संभव है क्योंकि अंतरिक्ष की सैर काफी महंगी है। कुछ विकसित देशों में अंतरिक्ष की सैर के लिए स्पेस एलिवेटर भी बनाए जा रहे हैं जिनसे आज की लिफ्ट की तरह सुरक्षित रूप से अंतरिक्ष में पहुंचा जा सकेगा। वहां अंतरिक्ष स्टेशन में कुछ दिन आराम करके पृथ्वी पर लौट सकेंगे। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि दुनिया भर की खबरें और प्रोग्राम देखने के लिए अब टेलीविजन की जरूरत नहीं रहेगी क्योंकि सिर में ही ऐसी युक्ति लगा दी जाएगी कि उसे आन करने पर दिमाग को स्क्रीन दिखने लगेगा! इसका बस एक खतरा है, जैसे चालीस-पचास साल पहले लोगों को टीवी देखने की लत पड़ जाती थी, वैसे ही इससे अधिकांश समय आभासी दुनिया में डूबे रहने की आदत पड़ जाएगी। वैज्ञानिक तो एक और बात भी बता रहे हैं। वे कह रहे हैं कि कल विचार तरंगों से आपस में बात करना भी मुमकिन हो जाएगा। किसी युक्ति से एक व्यक्ति के विचार पकड़ कर दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाए जा सकेंगे। – देवेंद्र मेवाड़ी

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