वह धातु इस धरती की नहीं

चिंगा घाटी का उल्कापिंड
                          चिंगा घाटी का उल्कापिंड

यह खबर पढ़ कर मैं हैरान रह गया था कि जर्मनी के वैज्ञानिक डा. एल्मर बुकनर और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों ने धातु की जिस मूर्ति की जांच की है, वह धातु इस धरती की नहीं है!

तिब्बत में मिली बौद्ध ‘लौह पुरूष’ की मूर्ति
तिब्बत में मिली बौद्ध ‘लौह पुरूष’ की मूर्ति

इस धरती की नहीं है तो फिर वह आई कहां से? क्या आसमान से टपकी? डा. बुकनर की मानें तो हां, आसमान से टपकी! शायद 15,000 वर्ष पहले साइबेरिया और मंगोलिया की सीमा पर चिंगा नदी घाटी में एक उल्का पिंड गिरा था। उसी उल्का पिंड की धातु से तिब्बत में करीब 1000 वर्ष पहले यह मूर्ति बनाई गई होगी। मूर्ति 24 सेंटिमीटर ऊंची और 10.6 किलोग्राम भारी है जिसके पेट के ऊपरी भाग में स्वस्तिक का निशान बना है। प्राचीनकाल से ही स्वस्तिक को शुभ और शक्ति का प्रतीक माना गया है। ग्यारहवीं सदी में जब वह मूर्ति गढ़ी गई होगी, तब तिब्बत में बान संस्कृति चल रही थी और लोग वज्रयान शाखा के अनुयायी थे। उन्होंने उत्तरी तिब्बत के बौद्ध देवता वैश्रवण की यह मूर्ति बनाई होगी जिसे ‘लौह पुरूष’ कहा गया। कुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह किसी देवता की नहीं बल्कि तलवारधारी यौद्धा की मूर्ति है। यों भी प्राचीन काल में कई सभ्यताओं के लोग उल्का पिंडों को देवताओं की देन मानते थे। उनकी पूजा करते थे और उल्का पिंड की धातु से आभूषण चाकू वगैरह बना लेते थे। ‘लौह पुरूष’ उल्का पिंड से गढ़ी गई विश्व की एकमात्र अनोखी और दुर्लभ मूर्ति है।

लेकिन, कहां तिब्बत और कहां जर्मनी। वहां कैसे पहुंच गई यह मूर्ति? पता लगा कि द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले हिटलर के सुरक्षा प्रमुख हेनरिख हिमलर के आदेश पर रक्षक दल ‘एस एस’ की एक टुकड़ी आर्य जाति की उत्पत्ति के प्रमाण खोजने के लिए प्राणि विज्ञानी अन्स्र्ट शेफर के नेतृत्व में तिब्बत भेजी गई थी। उन्होंने स्वस्तिक के निशान वाली इस मूर्ति को जब्त कर लिया। सन् 1938 में वे इसे जर्मनी ले आए। तब से लौह पुरूष की यह मूर्ति अतीत के गर्भ में पड़ी रही। जर्मनी में जिस व्यक्ति के पास यह मूर्ति थी, उसके निधन के बाद सन् 2007 में इसकी नीलामी हुई। डा. बुकनर और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों ने मूर्ति के नए मालिक से इसकी रासायनिक जांच की अनुमति ली और जांच से अब पता लग गया है कि यह तो सचमुच दुर्लभतम मूर्ति है जो इस धरती से परे, किसी अन्य लोक की धातु से बनी है। मूर्ति लोहे और निकिल से बनी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी पृथ्वी की किसी लौह मूर्ति में निकिल का इतना अंश नहीं पाया जाता।

सोच रहा हूं, यह सब तो ठीक, लेकिन ये उल्काएं आती कहां से हैं? वैज्ञानिक कहते हैं कि रात के निविड़ अंधकार में हमें आसमान में जो ‘टूटते हुए तारे’ दिखाई देते हैं, वे तारों के टुकड़े नहीं बल्कि क्षुद्रग्रहों या धूमकेतुओं से छूटे हुए छोटे-छोटे टुकड़े हैं। वे तेज गति से पृथ्वी की ओर आते हैं और वायुमंडल से रगड़ खाकर दहक उठते हैं। वे दहकते उल्का पिंड और उनके इर्द-गिर्द की धधकती हवा हमें रात के अंधेरे में तेज रोशनी की लकीर की तरह दिखाई देती है। ऐसे कई छोटे-मोटे टुकड़े तो वायुमंडल में ही जल कर खाक हो जाते हैं लेकिन कई टुकड़े धरती पर भी आ गिरते हैं। हमारे पुरखों ने भी उल्कापात देखा होगा। शायद तभी अथर्ववेद में उल्काओं से रक्षा के लिए उन्होंने यह प्रार्थना की होगीः ‘शन्नो भूमिर्वेपमाना शमुल्कानिर्हतंचयत् ।।18।। नक्षत्रमुल्काभिहतं शमस्तु ।।9।।’….(अथर्ववेद सं 19/9)

आसमान में कई बार तारों की बारात के बीच कहीं आतिशबाजी का अद्भुत नज़ारा भी दिखाई देता है। तब आसमान में रोशनी की दो-चार या दस-बीस नहीं बल्कि सैकड़ों लकीरें चमकती हुई दिखाई देती हैं। यह उल्काओं की देन है। इसे उल्का वृष्टि यानी मीटिओर शोवर कहते हैं। वह एक अनोखा दृश्य होता है और किसी का भी मन मोह लेता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि शायद प्रसिद्ध अंग्रेज कवि सेमुअल टेलर कोलरिज का मन भी सिंह राशि से आने वाली लियोनिड उल्का वृष्टि ने मोह लिया होगा, तभी उन्होंने अपनी सबसे लंबी कविता ‘राइम आफ द ओल्ड मेरीनर’ में ये पंक्तियां लिखी होंगी जिनका मैंने हिंदी में अनुवाद कर लिया हैः

जीवंत हो उठी ऊपर वहां हवा!

और, दिखने लगीं सैकड़ों अग्नि-पताकाएं,

यहां, वहां तेजी से गुजरती हुईं

 सैमुअल टेलर कोलरिज
सैमुअल टेलर कोलरिज

वहां, यहां और अंदर और बाहर

जिनके बीच नाचते थे धुंधले सितारे

और, जोर से गरजती थी आती हुई हवा

और, पालें सरसराती थीं दलदली घास की पत्तियों की तरह,

बरसती थी बारिश एक काले-कजरारे बादल से,

उधर ढल रहा था चांद क्षितिज पर…

सिंह तारामंडल की तरह ही पर्सेयूस तारामंडल की ओर से आने वाली उल्का वृष्टि पर्सेईड शोवर और जेमिनी (मिथुन राशि) की ओर से आने वाली उल्का वृष्टि जेमिनिड शोवर कहलाती है। उल्का वृष्टि के दौरान एक घंटे में 1,000 से लेकर 1,50,000 तक उल्कापात हो सकते हैं!

लियोनिंड उल्कावृष्टि
लियोनिंड उल्कावृष्टि

अधिकतर उल्का पिंड क्षुद्रग्रहों से छिटके हुए टुकड़े होते हैं लेकिन पृथ्वी पर चंद्रमा और मंगल ग्रह से आए हुए उल्का पिंड भी पाए गए हैं। पृथ्वी पर एकाध ग्राम से लेकर 60 टन तक भारी उल्का पिंड पाए गए हैं। कई मीटर लंबे- चौड़े आकार के उल्का पिंडों का वेग वायुमंडल में 5 से 25 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर कम होने लगता है और कई बार वे अनेक टुकड़ों में भी टूट जाते हैं। वे 100-200 मीटर प्रति सेकेंड की धीमी गति से चुपचाप धरती पर आ गिरते हैं। धरती तक आते-आते वे ठंडे पड़ जाते हैं।

भारी-भरकम यानी 100 मीटर या इससे बड़े आकार के उल्कापिंड पूरे वेग के साथ वायुमंडल को चीरते हुए धरती पर आ गिरते हैं। इनकी तेज टक्कर से परमाणु बम के विस्फोट की तरह विशाल क्रेटर बन जाते हैं। अमेरिका के एरिज़ोना में एक ऐसा ही क्रेटर है जिसकी चौड़ाई 1.2 किलोमीटर और गहराई 200 मीटर है। अनुमान है कि वहां करीब 50,000 वर्ष पहले 50 से 100 मीटर चौड़ा उल्का पिंड गिरा होगा।

कहते हैं, हमारे देश के महाराष्ट्र राज्य की लोणार झील भी इसी तरह किसी उल्का पिंड या धूमकेतु के अवशेष की टक्कर से बनी है। पश्चिमी साइबेरिया के निर्जन तुंगुस्का इलाके में 30 जून 1908 को 15 मेगाटन टी एन टी के बराबर का एक उल्का विस्फोट हुआ था जिससे 50 किलोमीटर क्षेत्र में पेड़-पौधे जमीन पर बिछ गए थे। लेकिन, धरती पर टकराने से पहले ही उस उल्का पिंड में विस्फोट हो गया था। विस्फोट से सूर्य की जैसी तेज चमक कौंध गई थी और विस्फोट की आवाज सुदूर लंदन शहर तक में सुनी गई। अनुमान है कि उस उल्का पिंड का व्यास करीब 60 मीटर था।

वैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं कि लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पहले एक विशाल यानी लगभग 10 किलोमीटर चौड़ा उल्का पिंड आकर पृथ्वी से टकराया था जिससे 180 किलोमीटर चौड़ा क्रेटर बना। उसके कारण हुई तबाही से डाइनोसार समाप्त हो गए और आगे चल कर उनकी जगह स्तनधारी प्राणी विकास की दौड़ में आगे बढ़ गए। उन्हीं में से बुद्धिमान मानव जाति का विकास हुआ।

और हां, अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एक किलोमीटर से बड़े आकार के कम से कम 1000 क्षुद्र ग्रह ऐसे हैं जो घूमते हुए पृथ्वी की कक्षा से गुजरते हैं। औसतन 10 लाख वर्षों की अवधि में कोई एक क्षुद्रग्रह पृथ्वी से टकराता है। कभी ऐसा भी हो सकता है कि इनसे बड़े आकार का क्षुद्रग्रह भटक कर हमारी धरती से आ टकराए। अगर ऐसा हुआ तो यह टक्कर बहुत विनाशकारी साबित होगी। वैसे, अंतरिक्ष वैज्ञानिक पृथ्वी की ओर आने वाले क्षुद्रग्रहों पर स्पेसगार्ड सर्वेक्षण के तहत कड़ी नजर रख रहे हैं ताकि पृथ्वी से टकराने से पहले ही उनका पता लग जाए और या तो उनका रास्ता बदल दिया जाए या विस्फोट करके उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाए।

वैज्ञानिकों का कहना है कि 15 फरवरी 2013 को लगभग 46 मीटर चौड़ा क्षुद्रग्रह ‘2012 डी ए-14’ पृथ्वी से करीब 27,000 किलोमीटर की दूरी से गुजरेगा। यानी, वह हमारे संचार उपग्रहों की कक्षा से भी भीतर आ जाएगा। इससे कुछ उपग्रहों को नुकसान पहुंचने की आशंका हो सकती है। पर यह भी हो सकता है कि अंतरिक्ष वैज्ञानिक उसका रास्ता बदल दें। रूसी अंतरिक्ष एजेंसी के वैज्ञानिक विताली देवीदोव का कहना है कि 140 किलोमीटर चौड़ा ‘एपोफिस’ नामक क्षुद्रग्रह 13 फरवरी 2036 को पृथ्वी से 30,000 किलोमीटर की दूरी से गुजरेगा। पृथ्वी से उसके टकराने की आशंका है, लेकिन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ के वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ऐसी आशंका बहुत ही कम है। पर हां, उन्होंने आगाह भी किया है कि हो सकता है सन् 2040 में क्षुद्रग्रह ‘2011 ए जी 5’ धरती से टकरा जाए।

पृथ्वी पर पाए गए छोटे-बड़े उल्का पिंडों में से नामीबिया में गिरा होबा उल्का पिंड सबसे बड़ा है। इसका भार 60 टन से भी अधिक आंका गया है। अनुमान है कि यह उल्का पिंड लगभग 80,000 वर्ष पहले गिरा होगा। इसे नामीबिया का राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया है। 7 नवंबर 1492 को अलशेस, फ्रांस में गेहूं के एक खेत में 127 किलोग्राम भारी इनसिशीम उल्का पिंड गिरा था। कवि और व्यंग्यकार सेबास्तियन ब्रैंत ने उस पर एक कविता लिखी- ‘लूज लीव्ज़ कंसर्निंग द फाल आफ द मीटिओराइट’। जर्मन चित्रकार तथा गणितज्ञ अल्ब्रेख्त ड्यूरर ने आसमान से अंगारे की तरह गिरते उस उल्का पिंड का चित्रांकन किया। उस उल्कापात को शुभ संकेत मान कर रोमन बादशाह फ्रेडरिक तृतीय के पुत्र मैक्समिलियन प्रथम को राजा घोषित कर दिया गया। 14 मई 1864 को दक्षिणी फ्रांस के एक गांव आर्गुईल में एक उल्का पिंड गिरा था। उस गांव के नाम पर उसे आर्गुईल उल्का पिंड कहा जाता है। उसके 20 टुकड़े जमा किए गए।

फरवरी 1969 में चिहुआहुआ, मैक्सिको के एक गांव में एक उल्का पिंड गिरा जो अलैंदे उल्का पिंड कहलाता है। धरती पर टकराने से पहले उसके कई टुकड़े हो गए थे। उसके 2 टन से भी अधिक अवशेष जमा किए गए। 28 सिंतबर 1969 को विक्टोरिया, आस्ट्रेलिया में आसमान से धधकता हुआ एक उल्का पिंड आया और आसमान में ही तीन टुकड़ों में टूट गया। वह मर्किसन उल्कापिंड कहलाता है। उसके 100 किलोग्राम से अधिक अवशेष जमा किए गए।

मोटे तौर पर उल्का पिंड तीन प्रकार के होते हैंः पथरीले, लौह और पथरीले-लौह। पृथ्वी पर जितने उल्का पिंड पाए गए हैं, उनमें से 94 प्रतिशत पथरीले, 5 प्रतिशत लौह और करीब 1 प्रतिशत पथरीले-लौह प्रकार के हैं।

उल्का पिंड सदियों से गिरते रहे हैं और आगे भी गिरते रहेंगे। लेकिन, कल वैज्ञानिक निशाना साध कर या तो इन्हें विस्फोट से उड़ा देंगे या अंतरिक्ष में ही इनकी राह बदल देंगे।

देवेंद्र मेवाड़ी

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