पहरे पर टैडी

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बालकनी में बिटिया की बगिया का नौ-बजिया खतरे में है। और, खतरा भी किससे? सीधे-सादे कबूतर से! पहले पता नहीं था कि गमले में से आखिर नौबजिया गायब कैसे हो रहा है? उसके कटे टुकड़े दिखे तो लगा, यह कबूतर की कारस्तानी है। हम नौबजिया पर नजर रखने लगे। देखा, कबूतर दबे पांव गमलों की आड़ लेकर आता है और नौबजिया पर टूट पड़ता है। उसे जैसे जुनून सवार हो जाता है और चोंच की कैंची से कट-कट, कट-कट करता नौबजिया के पतले, मुलायम तनों को काटता चला जाता है। बाद में टुकड़ा-टुकड़ा चुन कर ले जाता रहता है। फूल उसके काम के नहीं, इसलिए उन्हें छोड़ जाता है।
दो-तीन बार नौबजिया लाकर फिर उगाया लेकिन कबूतर ने हर बार गमला वीरान कर दिया। हम सोचते रह गए कि आखिर इसके टुकड़ों का वह करता क्या है? गमले को वीरान देख कर वह लिली की मुलायम पत्तियां कतर कर ले जाने लगा। उसके सफेद फूल वहां छोड़ जाता। अब हमने प्रयोग शुरू किया। लिली को हटा लिया। कबूतर ने आकर नौबजिया के खाली गमले का जायजा लिया। लिली को भी न पाकर बेमन से नर्गिस की पत्तियों के ऊपरी हिस्से कतर कर ले जाने लगा।
हम नीचे जमीन में उगे नौबजिया के पौधों का गुच्छा ले आए। उन्हें गमले में लगा दिया। उन्होंने जड़ पकड़ ली और हर सुबह नौ बजे के आसपास खिल कर अपनी गुलाबी मुस्कराहट बिखेरने लगे। शायद कबूतर भी आस लगाए था। नौबजिया को देख कर बेसब्र हो गया। ऐन सामने आकर झपटने लगा। पांचेक फुट दूर बैठे हम उसे जैसे दिखाई ही नहीं देते थे। वह नौबजिया की ओर नशे में सा खिंचा चला आता। लेकिन, उस सीधे, सरल मूक पौधे को भी तो धरती पर पनपने-खिलने का पूरा अधिकार है। हम उसे बचाने का नया उपाय सोचते रहे।
साथ ही, यह भी सोचते रहे कि आखिर नीचे जमीन में उगे नौबजिया के पौधों को कबूतर क्यों नहीं काटता? जवाब जल्दी ही मिल गया। वहां आसपास बिल्लियां झपटने को तैयार बैठी रहती थीं। हो सकता है कभी वहां कोई कबूतर उनकी पकड़ में आ गया हो। इसलिए वे जमीन में उगे नौबजिया को दूर से भले ही ललचा कर देखते हों लेकिन उतर कर उनके पास जाते नहीं हैं।
इसी बीच एक फिक्र ने आ घेरा। मैंने कहा, “आखिर कबूतर करता क्या होगा, नौबजिया के इन टुकड़ों से? घोंसलों में बिछाता होगा क्या बच्चों के लिए?” पत्नी लक्ष्मी ने कहा, “नहीं, घोंसला बनाने की कला कहां आती है कबूतरों को? दो-चार सींकें, टहनियां रखते हैं और अंडे दे देते हैं।”
“तो, फिर ये नौबजिया को खाते होंगे।”
“हो सकता है, चबा कर गले में अपने गिज़र्ड में रख लेते हों और फिर मुंह से निकाल कर बच्चों को खिलाते हों,” लक्ष्मी ने कहा।
“यह तो फिक्र की बात है। कहीं हम कबूतर के बच्चों को भूखा तो नहीं रख रहे हैं?”
“यह तो हर रोज इसे काटने आ जाता है। बच्चे सदा जो क्या होते होंगे?”
मन में कसक-सी तो बैठ ही गई लेकिन कबूतर भी भूखा न रहे। गमले के पास आकर तो ऐसे टूट पड़ता है, जैसे जाने कब का भूखा है? लेकिन, नौबजिया का भी क्या दोष?“
तो अब क्या करें? उपाय सोच ही रहे थे कि मुझे एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुंबई जाना पड़ा। इस बीच लक्ष्मी और बेटी उपाय सोचते रहे, कबूतर पर नजर रख कर उसे डपट कर भगाते रहे। तभी लक्ष्मी को नया उपाय सूझा कि क्यों न बेटी के टैडी बियर को पहरे पर बैठा दिया जाए। और, उन्होंने यही किया। मैं मुंबई से लौटा तो देखा प्यारा टैडी मुश्तैदी से पहरेदारी कर रहा है। आठ-दस दिन हो चुके हैं। कबूतर पहचान नहीं पाया है कि यह कोई बच्चा नहीं बल्कि टैडी बियर है।
दूर देश से आया नौबजिया अब खुश है। सूरज आसमान में चढ़ने के साथ-साथ नौ बजे के आसपास फूलों की मुस्कराहट बिखेर देता है। टैडी दिन भर ड्यूटी देकर शाम को घर भीतर आता है और रात को विश्राम करता है। सुबह-सुबह पौधों की सिंचाई के समय पहरेदारी के लिए स्टूल पर बैठ जाता है।
दूर देश का नौबजिया? हां, नौबजिया की जन्मभूमि अर्जेंटाइना, दक्षिणी ब्राजील और उरुग्वे है। वहां से कभी कोई लाया होगा यहां इसे और यहां की आबोहवा इसे कुछ इतनी रास आई कि यह यहां खूब फल-फूल उठा। वनस्पति विज्ञानी इसे पोर्टुलाका ग्रैंडीफ्लोरा कहते हैं। अंग्रेजी में यह मास रोज, राक रोज या सन रोज कहलाता है। सुबह सही टाइम पर 8 बजे खिलता है, इसलिए बांग्लादेश में लोग इसे ‘टाइम फूल’ कहते हैं। हमारे देश में 9 बजे खिलने के कारण यह ‘नौबजिया’ या ‘नाइन-ओ-क्लाक’ कहलाता है। इसके पांच पंखुड़ियों वाले फूल डबल यानी पंखुड़ियों से गछे हुए भी होते हैं। इसके फूल गुलाबी, लाल, नारंगी, पीले और सफेद भी होते हैं। दुरंगे फूल भी दुर्लभ नहीं। सुना है गौरेयों को इसकी नर्म कलियां खूब पसंद हैं, लेकिन दिल्ली महानगर में अब वे भी तो दुर्लभ हो गई हैं।
तो, सुनो प्रिय कबूतर, रहम करो नौबजिया पर। उसे खिलने-पनपने दो भाई!

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