दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ-4

देवप्रयाग से पहले रास्ता बंद न होता तो हम केवल 108 कि.मी. की दूरी तय करके पहले ही श्रीनगर पहुंच गए होते। बहरहाल, रात में श्रीनगर ही रहने का निश्चय किया। संजय भी थक गया था। थकता भी क्यों नहीं, दिल्ली से यहां तक पहुंचने में अब तक वह लगभग 400 किमी. गाड़ी चला चुका था। उसे आराम की सख्त जरूरत थी हालांकि वह चाय-वाय पीकर कर्णप्रयाग तक चल पड़ने की बात कर रहा था।

‘‘बिलकुल नहीं,’’ प्रकाश ने जोर देकर कहा,  ‘‘यहां अब तुम आराम करो। खा-पी कर सो जाओगे। सुबह चलेंगे।’’ हम सबने हामी भरी। गढ़वाल मंडल विकास निगम के विश्राम-गृह में पहुंच कर 8-शैयाओं की डाॅरमेटरी ली। उसमें तीन शौचालय-स्नान घर देख कर मेरा चिरकालिक बाउल सिंड्रोम शांत हुआ। सोचा, तीन में से एक तो खाली मिल ही जाएगा ! सुबह ढाई बजे से जगे हुए थे, इसलिए अब खाना खाकर फटाफट सो जाना चाहते थे। सुबह भी जल्दी उठना था ताकि जैसे भी हो, निर्धारित इंटर कालेजों तक पहुंच कर बच्चों से बातें कर सकें। सोए और सोते ही कुछ साथियों को गहरी नींद आ गई। मैंने भी शायद एक झपकी ली थी कि रोशनी देख कर आंखें तरतरी हो गईं। आधी मुंदी आंखों से देखा- सामने अपने बिस्तर पर प्रकाश मेरी ओर पीठ किए कुछ पढ़ रहा था। बहुत रात तक बीच-बीच में अधमुंदी आंखों से देखता रहा मगर प्रकाश बिना हिले-डुले उसी मुद्रा में पढ़ते हुए दिखाई दिया। फिर न जाने कब आंख लगी, कब प्रकाश सोया। सुबह देखा, वह चारों ओर से कंबल लपेट कर कुकून बना हुआ था। इससे पहले कि मेरा बाउल सिंड्रोम दिमाग में खलबली मचाए, मैं पौने चार बजे धीरे से उठ कर बिल्ली की चाल से चल कर बाथरूम में घुस गया। नहा-धोकर निकला तो राहत की सांस ली। मेरे पास वक्त था और जाने से पहले एकाध बार और शौचालय में जाने का मौका मिल सकता था।

हम लोग तैयार होकर सुबह ठीक 5 बजे श्रीनगर से कर्णप्रयाग के लिए निकल पड़े।

श्रीनगर से 32 किमी. रुद्रप्रयाग, वहां से 12 किमी. नगरासू, 10 किमी. गोचर और फिर 10 किमी. कर्णप्रयाग। हमें चाय मिल गई थी लेकिन प्रकाश को चाय नहीं गर्म पानी चाहिए था। तय हुआ कि कहीं रास्ते में ले लेंगे।

श्रीनगर से निकलते समय सामने का दृश्य देख कर दिल धक्क से रह गया। छब्बीस वर्ष पहले मैंने यहां गले के हार की तरह घूम कर कल-कल बहती अलकनंदा देखी थी। मैं इन तमाम वर्षों में अपने बच्चों और संगी-साथियों को उसी अल्हड़ अलकनंदा के बारे में बताता आ रहा था। लेकिन, सामने का दृश्य देख कर मैं छला हुआ-सा महसूस करने लगा। यहां भी बांध? मैंने तब आसपास हरे-भरे पहाड़ देखे थे लेकिन अब उन्हें कमर तक छील दिया गया था। उनके सामने रोड़ियों और पत्थरों के पहाड़ खड़े कर दिए गए थे। और, अलकनंदा? उन अपरिचित रेत-रोड़ी के पहाड़ों के आसपास से दुबली-पतली और थकी-हारी-सी अलकनंदा जैसे आंचल में मुंह छिपाए बेमन से धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। श्रीनगर और अलकनंदा को यह क्या हो गया है? क्या नई जल-विद्युत योजनाओं के नाम पर हमें इस तरह निर्ममता से पर्वत और पर्वतपुत्रियों का गला घोंट देने का कोई हक है? क्या प्रकृति हमें इसके लिए माफ कर सकेगी? मन खराब हो गया। कुछ दूर तक चुपचाप आंखें बंद कर लीं।

आंखें खोलीं तो देखा प्रकृति सुबह-सुबह सामने के पहाड़ों पर अपनी अदृश्य कूंची से कोहरे की सफेदी पोत रही थी। देवलगढ़ गांव की छोटी-सी पुलिया के पास किसी झाड़ी की ओट से गहरे नीले रंग की कलचुड़िया (ह्विसलिंग थ्रस) निकल कर सामने आई। एक पत्थर पर पीले पंजे टिका कर उसने क्षण भर हमारी ओर देखा और फिर ऊपर की ओर उड़ गई।

श्रीनगर लगभग 10 किमी. पीछे छूट चुका था। हम कलियासौंड़ के बाद खांकरा गांव पार कर रहे थे। सामने पहाड़ों पर ऊपर से नीचे तक काले पर्णविहीन पेड़ खड़े थे। लगता था, खाली ठूंठ खड़े हैं। सोचा, बैसाख खत्म होने को है। क्या उन्हें ग्रीष्म ऋतु के आने का संदेश नहीं मिला? मिला तो अब भी क्यों मौन साधना में लीन हैं? प्रकाश की आवाज आ रही है, “इन पेड़ों को क्या हो गया है? पूरे पहाड़ में ऐसे खड़े हैं जैसे सूख गए हों।”

बांई ओर गांवों के पैताने अलकनंदा बह रही है। यहां उसकी धारा में कुछ तेजी दिखाई दे रही है। उसे क्या पता पंद्रह-बीस किलोमीटर बाद उसके पैरों में बांध की बेड़ियां पड़ने वाली हैं।

एक बोर्ड में अचानक गुलाबराई लिखा हुआ देख कर चौंक गया। जिम कार्बेट ने रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ गुलाबराई में ही तो मारा था! आज से ठीक 84 वर्ष पहले मई के ही महीने में। यहां वह रात भर आम के पेड़ पर मचान में बैठा था और वही से अंधेरे में तेंदुए पर अचूक निशाना साधा था।… शायद यहीं इस घटना का वह यादगार पत्थर भी होगा जिसमें लिखा गया-‘‘यहां मई, 1926 में जिम कार्बेट ने रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ मारा।’ गुलाबराई तब एक छोटा-सा गांव था। आज कंकरीट के इन मकानों और दूकानों को देख कर कौन उस गांव की कल्पना कर सकता है।

गुलाबराई से उतर कर हम रुद्रप्रयाग पहुंच गए हैं। ये तीर्थ स्थान माना जाता है। यहां मंदाकिनी नदी अलकनंदा से आकर मिलती है। मंदाकिनी पर सस्पेंशन ब्रिज है जिसके टावर पर कभी जिम कार्बेट ने आदमखोर की प्रतीक्षा में 20 रातें बिताई थीं।

कलचुड़िया
कलचुड़िया

यहां से कर्णप्रयाग अब मात्र 32 किमी. दूर है। हम इंटरकालेज के बच्चों से हर हालत में बात करना चाहते हैं। इसलिए कालेज पहुंचने का इरादा है। हमने रुद्रप्रयाग से आगे की राह पकड़ी। लो, यहां तो नीचे अलकनंदा उछल-कूद कर भाग रही है। इतनी दूर उसे बांध कर क्या पता! इस पार पहाड़, उस पार पहाड़। उनके पैताने बहती अलकनंदा। बीच में चौंड़ी घाटी। सात-आठ तोतों का झुंड कियांक्-कियांक् करता हुआ आया और आंखों से ओझल हो गया। कहीं से आकर चीड़ की शाख पर एक कलचुड़िया बैठी और ‘स्वी ई ई’ की मधुर सीटी बजा कर दूसरी ओर उड़ गई। हम रतूड़ा गांव पार करके गोचर की ओर बढ़ रहे हैं। अलकनंदा के ऊपर घाटी की खुली, भारी हवा में उड़ान भर कर दो कौवे उस पार से इस पार आ गए हैं। वे सामने सड़क किनारे खड़े ऊंचे डेंकण (मेलिया अजेदरख) के हरे-भरे पेड़ की शाख पर जाकर बैठ गए हैं।

हमने गोचर भी पार कर लिया है। सबका मन चाय पीने को है मगर निमित्त प्रकाश को बनाया जा रहा है,“प्रकाश को अभी तक चाय नहीं मिली, न गर्म पानी मिला।’’

 “कोई साफ-सूफ दुकान दिखाई दे तो संजय गाड़ी रोकना।’’ चटवापीपल में साफ-सूफ दूकान मिल गई। यह नाम कुछ सुना हुआ सा लगता है। संजय ने गाड़ी रोकी और हम लोग बाहर निकले। इधर-उधर ऊंचे पहाड़ थे। पहाड़ों की ढलान पर सुबह के सूरज की सुनहरी किरणें पड़ रही थीं। दूकान के आगे गुनगुनी धूप की चादर फैल चुकी थी। हमने वहां चाय पी। चंदन ने अपने संग्रह से बड़े आकार के कुरकुरे, स्वादिष्ट बिस्किट खिलाए। दूकान के आसपास जंगली गौरेयों का झुंड चहक रहा था। कुछ दूर एक लमपुछिया (ब्लू मैगपाई) ने पेड़ की ओर उड़ान भरी। गुनगुनी धूप में बुलबुलें भी गीत गुनगुना रही थीं।

लेकिन, चटवापीपल? याद आया, प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट ने रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए को मारने की शिकार कथा में इस गांव के बारे में भी तो लिखा है। सन् 1918 से 1926 के बीच इस पूरे इलाके में आदमखोर तेंदुए का भारी आतंक फैला हुआ था। इस गांव के नीचे अलकनंदा नदी पर तब भी सस्पेंशन ब्रिज था।

गाड़ी चलने लगी तो संजय ने नरेंद्र नेगी के गीतों की सी डी लगा दी। गीत सुनते-सुनते हम कर्णप्रयाग पहुंच गए।

(जारी है)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *