आओ गौरेया, आओ

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12 मार्च 2010

घर कब बसाएंगी गौरेया

मेरी आगे की बालकनी में रोज सुबह गौरेयां चहचहाती हैं। सुना है इनका चहचहाना शुभ होता है। होगा ही,  क्योंकि गौरेया वहीं तो होंगीं, जहां पेड़-पौधे होंगे। हरियाली होगी।

लेकिन, अपनी पिछली बालकनी के लैंपशेड में गौरेया दंपति के आने का बहुत इंतजार है। सीपियों से बना यह लटकता लैंपशेड न जाने क्यों उन्हें इतना भा गया कि हर साल परिवार बढ़ाने के लिए वे यहां आ जाती हैं। लैंपशेड पर बैठती, झूलती, चिचियाती गौरेयां तिनका-तिनका चुन कर पहले पालना बुनती हैं। अंडे देती हैं। और,  नन्हे चूजे निकल  आने पर उन्हें चुग्गा चुगाती हैं। चारा-दाना, कीड़े-मकोड़े खोजने एक जाती है तो दूसरी पहरा देती रहती है। बच्चे बड़े हो जाने पर वे उन्हें बाहर लाती हैं। सामने तार  पर बैठाती हैं। पर तौल कर उड़ना सिखाती हैं। चहक-चहक कर बोलना सिखाती हैं। और, फिर एक दिन अपने-अपने दम पर दुनिया में जीने का सबक पढ़ा कर वे सभी यहां-वहां उड़ जाती हैं।

इस बार कब आएंगीं गौरेयां?  कहीं पास में ही अपने से बड़े कबूतरों का घर-परिवार पनपता देख कर नन्हीं गौरेयां डर तो नहीं गईं?

वैज्ञानिक कहते हैं, गौरेयां अपना इलाका तय कर लेती हैं। अच्छा तो उनके एक जोड़े ने मेरे फ्लैट की बालकनी में लटके लैंपशेड को अपना इलाका घोषित कर दिया है! जब वे यहां होती हैं,  हम खिड़की के कांच से चुपचाप उन्हें आते-जाते या बच्चों को चुग्गा चुगाते देखते हैं।

मुझे एक मजेदार चुटकुला याद आ रहा है। एक ‘पहुंचे हुए दार्शनिक’ ने देखा कि छोटी-सी गौरेया पंखों के बल पर उड़ रही हैं और भारी-भरकम गाय पेट भरने के लिए दूर-दूर तक भटक रही है। वे आसमान की ओर देख कर अफसोस के साथ बोले-‘या खुदा! तूने यह कैसा इंसाफ किया? नन्ही-सी जान गौरेया को तो पर बख्श दिए मगर इस भारी-भरकम जानवर को दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया?’ तभी, उनके माथे पर उड़ती गौरेया की बीट गिरी। वे हड़बड़ा कर बोले-‘रब्बा तू बहुत इंसाफ पसंद है। तूने ठीक ही गौरेया को पंख बख्शे।’

चलो, इस महानगर में कम से कम गौरेया तो हमारे साथ हैं जो हर सुबह अपनी चहचहाट से सुबह होने का अहसास करा देती हैं। आदमजात से कितना हिलमिल गई हैं ये। गौरेयां मिलनसार होती हैं, तभी तो सर्दियों में जब इनसे थोड़ा बड़ी प्रजाति की गौरेया प्रवास पर आ जाती हैं तो ये उनसे भी खूब घुल-मिल जाती हैं। ये मनुष्य के साथ मिल कर रहती हैं और गांवों से लेकर शोर भरे शहरों जैसे मुंबई,  चेन्नई तथा दूरस्थ रेगिस्तानी गांवों और पहाड़ों में सभी जगह पाई जाती हैं।

हमें इन्हें अपने लैंपशेड, किताबों की अलमारी के पीछे दीवार की दरार में या मुंडेर के किसी कोने पर घर बसाने देना चाहिए। यों, खबर है कि इनकी तादाद तेजी से घट रही है। शहर की जहरीली हवा, कानफोड़ू शोर, चारे-दाने व पानी की कमी और माइक्रोवेव टावरों से निकली अदृश्य, खतरनाक तरंगें इनकी जान ले रही हैं। इसलिए हमें हर संभव इन्हें परिवार बढ़ाने का मौका देना चाहिए। कंक्रीट के इस जंगल में अगर और वनपाखी न भी आएं तो कम से कम ये नन्हीं गौरेयां तो चहक-चहक कर हमें सुबह जगाती रहेंगी।

19 मार्च 2010

स्वागत है गौरेया

आज कई गौरेयाओं के चहचहाने के साथ सुबह हुई। मेरी बालकनी के चंद गमलों में लगे नीम के एक पतले पौधे, बोगनवेलिया, लिली, तुलसी, गुलदाउदी और गुलाब के गिने-चुने पौधों के गुलशन में उन्हें मिट्टी के कटोरों में दाना-पानी भी मिल जाता है। वे दिन में कई बार पत्थर की मुंडेर पर आकर चहचहाती रहती हैं। एक-दूसरे का पीछा करती हैं और पौधों,  गमलों व बालकनी में लगी लोहे की छड़ों के आगे-पीछे निकल कर आंखमिचैनी भी खेलती हैं।

काश मैं भी इनकी बातें समझ सकता! न जाने क्या-क्या बोलती रहती हैं – चिड़िक्…चिड़िक्…चीं! और भी न जाने क्या-क्या। दिन में जब मैं यह लिख रहा हूं, तब भी वे मुंडेर पर आ-आ कर बातें कर रही हैं। अगर मैं उनकी भाषा जानता तो उन्हें बताता कि कल 20 मार्च को उन्हें प्यार और दुलार देने के लिए विश्व गौरेया दिवस, मनाया जाएगा। आदमी के साथ रहते-रहते सदियां बीत गईं, मगर अब वे जरूर सोचती होंगी कि आखिर हो क्या गया है इस आदमी को? अच्छा-भला हरियाली में रहता था, शुद्ध हवा में सांस लेता था। ईंट-पत्थर या घास-फूस के घरों में रहता था। इसके घरों में हम भी अपने घोंसले बना लेती थीं। इसके घर-आंगन में अनाज के दाने चुग लेती थीं। आसपास बहता पानी पी लेती थीं।

लेकिन, धीरे-धीरे इसकी दुनिया ही बदल गई। कंक्रीट की ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने लगा यह। न उनमें कोई छेद, न दरार। घोंसला बनाएं भी तो कहां? यह खुद घोंसलों में रहने लगा है!

अगर गौरेयां ऐसा सोच रही होंगीं तो कुछ गलत नहीं सोच रही होंगीं। जिस बालकनी में वे चहचहा रही हैं वह मेरे ‘घोंसले’ की बालकनी है। सोसाइटी के इस अपार्टमेंट में साठ घोंसले हैं। उनमें से एक घोंसला मेरा भी है। यह तो इन पंछियों का प्यार है कि ये यहां भी हमें जगाने और अपने गीत सुनाने आ जाती हैं अन्यथा तो केवल घूमते पंखे की चूं-चूं या मिक्सी की घुर्र र्र र्र-घुर्र र्र र्र सुनाई देती रहे।

घोंसले की बात पर अपनी एक पुरानी कविता याद आ रही हैः

महानगर के महाकाय वृक्ष की

चौतरफा फैली हुई शाखों पर

सीमेंट और कंक्रीट और ईंट

और गारे और लोहे की सलाखों से

बया की तरह राज-मजदूरों की

अंगुलियों से बुने हुए

घोंसलों में,

यायावर परिंदों से रहते हैं हम।

कितना फर्क है उनकी और

हमारी दुनिया में।

उनके लिए घर होता है

एक समूचा जीता-जागता पेड़

चिचियाते चूजे और कूजते कुनबे के साथ

कलरव भरा भरपूर संसार!

मगर महानगर के महावृक्ष में

कंक्रीटी घोंसलों में घिरी

कर्कश  कोलाहल भरी

अकेली दुनिया है हमारी,

निपट अकेली।

यायावर पंछी उड़ जाते हैं

पहाड़ों और पहाड़ों और पहाड़ों

के पार।

मगर हम नहीं कर पाते हैं पार

अपने कंक्रीटी घोंसलों की

चारदीवार।

केवल सपनों के पंखों पर उड़ता है-

हमारा मन-पाखी,

इन दीवारों के पार

उन दीवारों के पार।

लो, इतनी देर में देखते ही देखते दो गौरेयां सूखी मिट्टी भरे गमले में धूल-स्नान के लिए भी गईं। चुपके से मुझे लिखते हुए देखा। देखा, मुझसे कोई खतरा नहीं है। गमले में उतरीं और बीच-बीच में सिर उठा कर देखते हुए जम कर धूल-स्नान कर गईं। जो पहले गमले में उतरी, वह हलके भूरे रंग की मादा थी। शायद उसी ने बताया हो, उसके बाद नर गौरेया आ गई। सिर,चौंच से लेकर छाती तक काली। भूरी पीठ पर काली लकीरें। उसने भी पहले चारों ओर देखा, भांपा, फिर गमले में उतर कर धूल-स्नान कर लिया।

धूप ढलने को है। हलकी पड़ती धूप उस पार इमारतों की ऊपरी मंजिलों पर चमक रही है। कुछ देर में सूरज अस्त हो जाएगा। अभी-अभी गौरेयां बालकनी से उड़ कर पहले अमलताश के गाछ में छिप कर चहचहाईं और फिर एक-दूसरे का पीछा करते हुए दूसरी ओर उड़ गईं। शायद अपने रैन बसेरे की ओर। सुबह आकर वे फिर चहचहाएंगी।

कल तो इन्हीं का दिन है- गौरेया दिवस।

 

20 मार्च 2010

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आज गौरेयाओं का दिन था। जिस तरह सदियों से हम इन नन्हीं चिड़ियों के साथ रहते आ रहे हैं, वैसे ही ये भी हमारा साथ निभा रही हैं। लेकिन, अब कई इलाकों और विशेष रूप से कई शहरों में इनकी मधुर चहचहाट कम सुनाई देने लगी है। इस नन्हीं जान की जिदगी संकट में पड़ गई है। शहरों के विषैले धुएं से भरी हवा में इनका दम घुटने लगा है। मोटरकारों के कर्कश शोर से इनका नन्हा कलेजा कांप रहा है। वैज्ञानिक हमें आगाह कर रहे हैं कि वक्त-बेवक्त बतियाने के लिए हम घंटों कान पर मोबाइल न चिपकाए रहें क्योंकि इससे निकलने वाली अदृश्य माइक्रो तरंगों से हमारे दिमाग को नुकसान पहुंच सकता है। जब इतनी बड़ी कद-काठी के आदमी को इन तरंगों से नुकसान पहुंच सकता है तो हमारे चारों ओर खड़े इन तमाम मोबाइल टावरों से निकलने वाली माइक्रो तरंगों से नन्हीं गौरेयाओं के दिल पर क्या गुजरती होगी? वैज्ञानिक कह रहे हैं कि इन अदृश्य तरंगों से गौरेयां गायब होती जा रही हैं।

एक बात और। बाजार से बंद थैलियों में आटा, चावल और दालें लाने वाले शहर के लोगों के घरों के आसपास क्या इन नन्हीं चिड़ियों के चुगने के लिए अन्न के दाने मिल सकते हैं? शहर में अब न गांव की तरह वैसे घर-आंगन रहे, न खेत-खलिहान, जहां से इन्हें पेट भरने के लिए अनाज के दाने मिल जाते थे। खेतों में पकी फसल हो या छत-आंगन में सूखने के लिए फैलाया अनाज, गौरेयां अपना हिस्सा लेने के लिए आ जाती थीं। बतियाती, चहचहाती, नटखट गौरेयां आंगन में सूख रहे अनाज में भी चोंच मार लेती थीं। उन पर नजर पड़ते ही गांव में मां या पिताजी हथेलियां फटफटा कर जोर से चिल्लाते-‘सहा!’ और, वे हंसती-खिलखिलाती एक साथ उड़ कर कभी छत की मुंडेर पर बैठ जातीं तो कभी घर के आसपास खड़े आड़ू, खुबानी या नींबू के पेड़-पौधों पर। थोड़ी देर चिड़िक्…चिड़िक्…चीं…चीं करके आपस में मंत्रणा करतीं और फिर एक साथ झुंड में धावा बोल कर अनाज चुगने लगतीं। फिर ‘सहा!’ सुन कर उड़तीं और थोड़ी देर में नटखट बच्चों की तरह ऊधम मचाने फिर आ धमकतीं। फसल की कटाई, मड़ाई और ओसाई के दिन गौरेयाओं के लिए त्योहार के दिन होते थे।

मां मुझे गौरेयाओं की एक कहानी सुनाया करती थी।

20 मार्च 2010 (रात्रि)

मां कहती थी, एक बहू थी। वह बहुत दिनों से अपने मायके नहीं गई थी। जब भी अपनी सास से मायके जाने के लिए पूछती, सास उसे खूब अनाज देकर कहती, ‘पहले इसे बीन कर साफ करो। फिर जावोगी मायके।’….बेचारी सुबह से शाम तक अनाज को बीनती, सूप से फटकती और बांस की डालियों में भरती, लेकिन काम फिर भी पूरा नहीं होता। अगली सुबह सास फिर ढेर सारा अनाज आंगन में रख देती और कहती, ‘ले, बहू इसे बीन। इसके बाद जाएगी अपने ससुराल।’

बेचारी बहू क्या करती? रो-रो कर फिर अनाज बीनने में लग जाती। सूरज पूरे आकाश को पार करके पश्चिम में पहुंच जाता। फिर पहाड़ों के पार छिप जाता। अनाज बीनने का काम फिर भी पूरा नहीं होता। बहू रात भर मायके जाने का सपना देखती। लेकिन, सुबह होते ही सास फिर बीनने के लिए अनाज सौंप देती। दुखियारी बहू फिर दिन भर अनाज बीनती।

गौरेयाओं से बहू का दुःख देखा नहीं गया। एक दिन, सुबह-सुबह उन्होंने बहू से पूछ लिया, ‘दीदी, तुम रोती क्यों रहती हो?’ बहू ने पूरी बात बताई तो गौरेयां सास की चालाकी समझ गईं। वे बहू से बोलीं, ‘चिड़िक्…चिड़िक्! रोओ मत। हम सब तुम्हारी मदद करेंगी। शाम तक यह सारा अनाज बीन देंगीं। तब तो तुम्हारी सास तुम्हें मायके जाने देगी?’

बहू ने कहा, ‘हां तब तो जाने देंगी।’

गौरेयाओं ने आपस में बात की, ‘चिड़िक्-चिड़िक्! चीं-चीं!’ और, फिर बहू के साथ अनाज बीनने में जुट गईं। अनाज चुन-चुन कर एक ओर करने लगीं और कूड़ा-करकट दूसरी ओर।

सूरज ढलने से पहले ही अनाज बीनने का काम पूरा हो गया। गौरेयाओं ने चहक कर बहू से कहा, ‘चिड़िक्-चिड़िक्! देखो काम पूरा हो गया।’

बहू के मायूस मुंह पर मुस्कुराहट आ गई। उसने गौरेयाओं को प्यार से पुचकारा।  मदद करने के लिए धन्यवाद दिया।

सास आई। उसने देखा कि हें, बहू ने काम तो पूरा कर दिया है! उसने खुश होकर बहू को गले लगा लिया। बोली, ‘मैंने तुझे बहुत काम देकर परेशान किया। फिर भी तूने मन लगा कर काम पूरा कर दिया। दिन भर में पूरा अनाज बीन दिया। बहू, अब कल सुबह तू मायके चली जाना।’

सुबह हुई। बहू अपने मायके को चल पड़ी। उसे गौरेयाओं ने देखा। उसने गौरेयाओं को देखा। गौरेयां चहकती हुईं बड़ी दूर तक बहू के साथ गईं। फिर बहू ने प्यार से उनसे लौट जाने को कहा। तब गौरयां चहचहाते हुए लौट आईं।

मतलब यह कि रोजमर्रा की जिंदगी में ही नहीं, कथा-कहानियों में भी हमसे सदा जुड़ी हुई थीं गौरेयां। विश्व गौरेया दिवस (20 मार्च) को दिन भर आती-जाती गौरेयाओं को देख कर यही सब कुछ सोचता रहा मैं। हां, सुबह उनके आने से पहले अपनी बालकनी में मैंने गमलों के बीच उनके लिए पानी और बाजरे के बीजों की दावत सजा दी थी। वे दिन भर खाती, पीती और चहकती रहीं। मेरे कानों में अपना संगीत घोलती रहीं।

 

 

 

 

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