रेन ट्री

1517416140

ये ‘रेन ट्री’ हैं। इन्हें हिंदी, मराठी, बांगला भाषा में विलायती सिरिस कहा जाता है। मैंने रेन ट्री के खूबसूरत पेड़ कुछ वर्ष पहले होमी भाभा  विज्ञान शिक्षण केंद्र, मुंबई के हरे-भरे प्रांगण में देखे थे।  इनका वैज्ञानिक नाम ‘अलबिज़िया समान’ है। अंग्रेजी में यह ‘सिल्क ट्री’ भी कहलाता है।  इनके फूल गुलाबी-सफेद और रेशमी फुंदनें की तरह होते हैं और बेहद खूबसूरत लगते हैं। इसकी फलियां मीठी और  गूदेदार होती हैं जो गिलहरियों तथा बंदरों को बहुत पसंद हैं। इसलिए इस पेड़ को मंकी पौड भी कहा जाता है।

खास बात यह है कि भारत में इसे सौ साल से भी पहले अंग्रेज लाए। यह मूल रूप से मध्य अमेरिका और वेस्टइंडीज का निवासी है। हमारे यहां की आबोहवा इसे खूब पसंद आई और यह देश भर में पनप गया। एक और खासियत यह है कि रेन ट्री दूसरे बड़े छायादार पेड़ों के विपरीत एक दलहनी पेड़ है। इसे मटर का बिरादर कह सकते हैं। इसका मतलब यह है कि इस पेड़ की जड़ों में गांठें होती हैं जिनमें वे बैक्टीरिया रहते हैं जो हवा से नाइट्रोजन लेकर इसे भी देते हैं और जमीन को उपजाऊ भी बनाते हैं।

इस पेड़ का छत्र बहुत बड़ा होता है और इसकी बढ़वार बहुत तेजी से होती है। अंग्रेज इसकी इस विशेषता को जानते थे, इसलिए वे ब्राजील, पेरू, मैक्सिको आदि जगहों से इसे भारत ले आए ताकि इसे राजमार्गों और नगरों में सड़कों के किनारे लगा सकें। उन्हें मालूम था कि बटोहियों को इनकी छांव में सुकून मिलेगा। सड़क के दोनों और लगाने पर इसके पेड़ों के फैले हुए छत्र के कारण सड़क के भीतर ग्रीन टनल बन जाएगी और इस तरह भारत के गर्म मौसम में यात्रा करना और छांव में सुस्ताना आसान हो जाएगा। यही कारण है कि उन्होंने मुंबई, बंगलौर, दक्षिण भारत और पूर्वी भारत में इसके खूब पेड़ लगाए। भारत से बांग्लादेश जाने वाले मार्ग पर भी इसके पेड़ लगाए गए। वे शतायु पेड़  आज भी वहां खड़े हैं। रेन ट्री नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इन पेड़ों के नीचे काफी नमी रहती है। पहले वैज्ञानिक सोचते थे कि इन पेड़ों से वर्षा की हल्की फुहार होती है लेकिन फिर पता लगा कि नहीं यह फुहार तो इसकी पत्तियों पर पनपने वाले नन्हे सिकाडा कीट छोड़ रहे हैं।

मधुरस के समान ये बूदें इनके शरीर से निकलती हैं। इसे रेन ट्री कहने का एक और कारण भी है। बारिश के मौसम में इस पेड़ की पत्तियां बंद हो जाती हैं। यों वे शाम होने पर भी धीरे-धीरे बंद होकर सो जाती है, ठीक छुईमुई की तरह। एक बात और, रेन ट्री ऊपरिरोही यानी एपिफाइट्स की शरण स्थली भी है। इस पर अनेक ऊपरिरोही पौधे उगते हैं लेकिन वे रेन ट्री की शाखों से रस नहीं चूसते। उसकी शाखों पर अपनी जड़ें फैलाते हैं और वहां जमा होने वाली सड़ी-गली चीजों और हवा से भोजन प्राप्त करते हैं। वे पौधे परजीवी यानी पेरासाइट नहीं हैं।

मुंबई, बैगलोर और दक्षिण भारत के कई शहरों में पेड़ों के गिर्द सीमेंट-कंक्रीटीकरण की वजह से इन बुजुर्ग पेड़ों को न हवा मिलती है, न पानी। इस कारण रेन ट्री के पेड़ सूखते जा रहे हैं। मुंबई के सांताक्रुज क्षेत्र में रेन ट्री के कई पेड़ों के केवल ठूंठ रह गए हैं। इस तरह हमें सौ वर्षों से छांव देने वाले इन पेड़ों का जीवन संकट में पड़ता जा रहा है। कई इलाकों में सड़के चौड़ी करने के नाम पर उनके किनारे लगे इन शतवर्षी बुजुर्ग पेड़ों को बिना सोचे समझे, निर्ममता से काटा जा रहा है। जो छांव देने आए थे नासमझी में हम उनकी जान ले रहे हैं।

और हां, एक और बात याद आ गई इनका छत्र काफी बड़ा होने के कारण ये हवा में से काफी अधिक कार्बन डाइआक्साइड सोख लेते हैं और बदले में हमें जीवनदायिनी प्राणवायु आक्सीजन देते हैं।

जो लोग सड़क चौड़ी करने के नाम पर रेन ट्री के बुजुर्ग पेड़ों को काटने की मंशा रखते हैं, उन्हें हमारे देश के महान वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की नसीहत याद रखनी चाहिए। भारत में परमाणु अनुसंधान के जनक होमी भाभा के समय में जब भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र का निर्माण किया जा रहा था तो एक दिन सुबह आफिस आते समय उन्होंने निर्माण स्थल के निकट सड़क पर  निर्माण से जुड़े कुछ लोगों को खड़े देखा। पूछने पर उन लोगों ने कहा, “यह पेड़ सड़क के बीच में आ रहा है। इसलिए इसे काटना पड़ेगा।”

होमी भाभा ने कहा, “आप लोगों को पता है, पेड़ चल कर यहां से हट नहीं सकता। लेकिन, हम चल सकते हैं। इसलिए पेड़ को वहीं रहना चाहिए और हमें सड़क को उससे हट कर, घुमाकर ले जाना चाहिए। इस  तरह पेड़ की जान बच गई। आज रेन ट्री के बुजुर्ग पेड़ों की जान लेने वालों को इससे सबक लेना चाहिए।”

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *