जाओ मल्या फिर आना

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ऋतु वसंत आ गई है। प्यूली के वसंती फूल खिल कर उसके आने की खबर दे रहे हैं। कहीं-कहीं सुर्ख बुरांश भी खिलने लगे हैं। शीत ऋतु जाते-जाते भी पलट कर ऊंचे पहाड़ों पर ह्यों-हिंवाल कर गई है। मन पाखी बैचेन है। पहाड़ों की नराई, उनकी खुद उसे बेचैन कर रही है। कानों में गीत के बोल गूंज रहे हैं: 

पड़ी गो बरफ भागी, पड़ी गो बरफ

पंछी हुनों उड़ी औनों, मैं तेरी तरफ!

मन पाखी का ही नहीं, मेहमान पाखियों का भी घर जाने के लिए मन बैचेन हो उठा है। गंगा, यमुना, अलकनंदा, पिंडर, भागीरथी, मंदाकिनी, नंदाकिनी….कितनी ही सदानीरा नदियों के तटों पर और बैराजों के आसपास शीत ऋतु के शुरू में आए प्रवासी पंछी अब सुदूर ठंडे इलाकों में अपने घरों को लौटने के लिए मचल रहे हैं। अब वहां, उन बर्फीले पहाड़ों पर मौसम गुनगुना होने लगेगा। यहां नदी घाटियों, झील-तालाबों और दलदलों में खूब घाम ताप लिया और भरपेट भोजन कर लिया है इन परिंदों ने। इनमें से कुछ परिदों ने प्रवास में यहां रहते बच्चों को भी जन्म दे दिया। अब वे बच्चे भी घर तक लंबी उड़ान भरने के लिए तैयार हैं। मौसम में एक-एक डिग्री बढ़ता तापमान घर लौटने की उनकी बेचैनी को बढ़ाता जा रहा हैं। और, वे सभी मेहमान पंछी अब किसी भी दिन दूर पहाड़ों में अपने घरों की तरफ उड़ान भर लेंगे। अपने घर घोंसलों की ओर उड़ान भरने में भला उन्हें क्यों दिक्कत होगी? वे तो पंछी हैं, उड़ सकते हैं। यह तो बस आदमी का मन है जो  नराई में गुनगुना उठता है कि पंछी होता तो मैं भी तुम्हारी ओर उड़ कर चला आता।

तो, अब नदी-घाटियों और झील-तालाबों में बसे ये प्रवासी परिंदे खूब खा-पी कर वापसी की लंबी उड़ान के लिए तैयार हैं। इन दिनों इन्होंने जमकर भोजन किया है ताकि शरीर में खूब चर्बी जमा हो जाए। वही चर्बी इन्हें सैकड़ों किलोमीटर लंबी उड़ानें भरने के लिए भरपूर ताकत देगी।

लेकिन, आपके आसपास कौन हैं ये हमारे प्रवासी मेहमान? क्या पहचानते हैं आप इन्हें? ये हैं:  राजहंस, बारहेडेड गीज़, चकवा-चकवी (ब्राह्मनी डक), सींखपर (पिंटेल), लाल सिर (रेड क्रेस्टेड पोचार्ड), मायला (गडवाल), दसारी (कूट), नीलसिर (मलार्ड), छोटा लालसिर (विजेयोन), तिदारी (शोवलर), छोटी मुर्गाबी (कामन टील), पनकौवा (इंडियन कोर्मोरेंट), अंजन (ग्रे हेरोन), लाल अंजन (पर्पल हेरोन), आदि। आजकल देहरादून के असान बैराज, रामनगर के कोसी बैराज, हरिद्वार के भीमगोडा बैराज, मिस्सरपुर गंगाघाट और गंगा, यमुना और दूसरी नदियों के तटों पर ये मेहमान लौटने की तैयारी में जुटे हैं। कई मेहमान परिंदे तो हो सकता है, सदल-बल लौट भी चुके हों।

ये प्रवासी पक्षी सर्दियों की शुरूआत में दूर-दूर से यहां आ गए थे- रूस, यूरोप, मध्य एशिया, तिब्बत, चीन, मंगोलिया जैसी जगहों से। यहां हमारे देश तक आने के लिए इन्हें सैकड़ों, हजारों किलोमीटर लंबी यात्राएं करनी पड़ती हैं। यहां आने के लिए ये पहले खूब खाना खाकर अपने शरीर में चर्बी जमा कर लेते हैं और फिर एक दिन आपस में तय करके हमारे देश में आने के लिए उड़ान भर लेते हैं। आसमान में आगे-आगे बच्चे और पीछे बड़े पक्षी। लेकिन, बच्चों को क्या पता कि प्रवास पर कहां जाना है? यही तो प्रकृति का वरदान मिला है इन्हें। ये जानते हैं कि प्रवास पर कहां जाना है। हमारे देश में आ रहे हैं तो कहां आना है, गंगा-यमुना तटों पर, पक्षी विहारों में या दलदली इलाकों में?

अगर पता भी है तो वे इतनी लंबी यात्रा करके सही जगह तक पहुंचते कैसे हैं? न घड़ी, न कुतुबनामा, न जीपीएस! तो फिर, उन्हें रास्ता कौन बताता है? वैज्ञानिकों का कहना है कि वे सूरज और चांद, तारों से अपनी मंजिल का पता लगा लेते हैं। दिन में सूरज को देख कर दिशा का अनुमान लगाते हैं तो रात को तारों और चंद्रमा के सहारे अपनी राह खोज लेते हैं। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि वे पृथ्वी के चंुबकीय क्षेत्र से भी अपना मार्ग खोजते हैं। दिन और रात में क्या ये उड़ते ही रहते हैं? हां, ये उड़ते ही रहते हैं। तभी तो पहले खूब खा कर शरीर में चर्बी जमा कर लेते हैं ताकि उड़ने की भरपूर ताकत बनी रहे।

और, उड़ते भी कहां से कहां तक हैं? अपने घरबार, अपने घोंसलों को छोड़ कर यहां आने के लिए ये प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर लंबी यात्रा करते हैं। आर्कटिक टर्न उत्तरी ध्र्रुव से करीब 17,700 किलोमीटर लंबी यात्रा करके दक्षिणी ध्रुव पहुंच जाते हैं। वसंत ऋतु में फिर 17,700 किलोमीटर की उड़ान भर कर वापस उत्तरी ध्रुव लौट जाते हैं। रूस और यूरोप के ठंडे इलाकों से रोजी पास्टर पक्षी सर्दियों में हमारे देश में बड़ौदा तक पहुंच जाते हैं।

कई पंछी तो हमारे देश के ही ठंडे इलाकों में रहते हैं लेकिन सारस और तमाम अन्य पक्षी सुदूर साइबेरिया, चीन, मंगोलिया, यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और मध्य एशिया से भारत आते हैं। सुंदर सिंदूरी पंखों वाले सुर्खाब यानी चकवा-चकवी सर्दियों में पूरे उत्तर भारत के झील-तालाबों की शोभा बढ़ाते हैं। ये पक्षी लद्दाख, नेपाल और तिब्बत से यहां सर्दियां बिताने आते हैं। कभी लोग सिर पर पगड़ी या टोपी में इनके सुंदर पंख पहनते थे। इसलिए ‘सुर्खाब के पर’ मुहावरा ही बन गया।

फ्लैमिंगो यानी हंसावर बहुत सुंदर पक्षी हैं। ये कच्छ के रन के निवासी हैं लेकिन सर्दियां बिताने के लिए इन्हें उड़ीसा की चिल्का झील, राजस्थान की सांभर झील और तमिलनाडु में प्वाइंट कालीमेरे काफी पसंद है। चिल्का झील तो यों भी प्रवासी पक्षियों की पसंदीदा जगह है। वहां सर्दियों में मध्य एशिया, साइबेरिया और भारत के विभिन्न भागों से लगभग एक सौ प्रजातियों के बीस लाख तक पक्षी पहुंच जाते हैं।

भरतपुर स्थित केवलादेव घना पक्षीविहार भी सर्दियों में हजारों पक्षियों के कलरव से गूंज उठता है। कभी यह पक्षीविहार सुंदर, सफेद साइबेरियाई सारसों को बेहद पंसद था। सन् 1964-65 तक तो वहां सर्दियां बिताने के लिए 200 तक सुंदर, सफेद साइबेरियाई सारस आ जाते थे। लेकिन, पर्यावरण बदलने और अन्य कारणों से अब वहां साइबेरियाई सारस नहीं आते। अगर कभी मौका मिले तो इन पक्षी विहारों की सैर जरूर करें और विदेशी मेहमान पक्षियों से मिलें। अगर आप नदी तटों, झीलों तालाबों और बैराजों के आसपास हैं तो इन प्रवासी मेहमानों से मिलना न भूलें।

पहाड़ में हमारे गांव में सर्दियां शुरू होते ही आसमान में सैकड़ों कबूतर जैसे पक्षी आ जाते थे। हमारे गेहूं बोए हुए खेतों में उनके झुंड उतरते और दाना चुगते। मैं मां से पूछा करता था, “ईजा ये कौन-सी चिड़ियां हैं? कहां से आती हैं ये?” मां बताती थी, “मल्या हैं पोथी, मल्या। दूर हिमांचलों से आती हैं। वहां बहुत ठंडा हो जाता है इन दिनों। ये घाम तापने यहां आ जाती हैं, जैसे हम जाड़ा बढ़ने पर घाम तापने माल-भाबर चले जाते हैं।”

तब हमारे गांव के सभी लोग पहाड़ से माल-भाबर चले जाते थे। यह तो मुझे बड़ा होने पर पता लगा कि वे ठंडे प्रदेशों में चट्टानी पहाड़ों पर रहते हैं और स्नो पिजन कहलाते हैं। कबूतरों के ही बिरादर हैं मल्या।

अब जब बुरांश खिलने लगे हैं तो वन-प्रांतर कुक्कू! कुक्कू! की आवाज से गूंजने लगेगा। वन-वन में कफुवा बासने लगेगा। लेकिन, अब तक कहां था कफुवा? वह भी पहाड़ों से नीचे उतर कर घाम तापने गया था। मौसम गर्म होते ही फिर पहाड़ों में आ गया है। कुछ समय बाद वनों में काफल पक जाएंगे। तब काफल पाक्को चिड़िया आ जाएगी और बासने लगेगी ‘काफल पाक्को! काफल पाक्को!’ वह भी घाम ताप कर काफल खाने और प्यार करने के लिए पहाड़ों की दिलकश वादियों में आ जाती हैं। पहाड़ों से बड़ी संख्या में गए सिटौले और दूसरे पक्षी भी लौट आएंगे। ज्यों-ज्यों मौसम गरमाएगा, नीचे घाटियों से भी कूजने के ये स्वर सुनाई देने लगेंगे, पियू-पियू-पी-पी-पियू-पियू! यह चातक की आवाज है। घाटियों से पहाड़ों तक एक सुर में पपीहा बासने लगेगा, पी-कहां! पी-कहां! उसकी यह आवाज हमें न्याहो! न्याहो! जैसी भी सुनाई देती है। पपीहा लगातार इतना बासता रहता है कि अंग्रेजों के सिर दर्द हो जाता था। इसलिए उन्होंने अंग्रेजी में इसका नाम ‘ब्रेन फीवर बर्ड’ रख दिया। ये सब पक्षी सर्दियों में कहां थे? ये भी घाम तापने के लिए पहाड़ों से नीचे उतर गए थे। लोग कहते हैं, कफुवा और कलचुड़िया की कभी भेंट नहीं होती। क्यों? क्योंकि मौसम गर्म होने लगता है तो कलचुड़िया पहाड़ों की ऊंचाई से नीचे नम और छायादार जगहों में उतर जाती है जबकि ऊपर पहाड़ में कफुवा आकर बासने लगता है, कुक्कू! कुक्कू!

यहां एक बात और बता दूं। कोयल, कफुवा यानी कुक्कू, काफल पाक्को, पपीहा और चातक सभी एक ही बिरादरी के पक्षी हैं। इन्हें प्रकृति ने घोंसला बनाना नहीं सिखाया। इसलिए ये बड़ी चालाकी से दूसरी चिड़ियों के घोंसलों में अंडे देते हैं। असल में जब ऋतु बदलती है तो ये प्रवासी पक्षी भी अपने डेरे बदल देते हैं। पहाड़ों में बसंत का गुनगुना मौसम शुरू होता है और हमारे देश में ही पहाड़ों से मैदानों तक की प्रवास यात्रा पर गए पंछी लौट आते हैं और प्यार के मधुर गीत गाने लगते हैं। फरवरी-मार्च से जुलाई-अगस्त तक इनके प्यार और बच्चों को पालने का मौसम होता है।

यह दूर देश से आए मेहमान पंछियों के लौटने का समय है और पहाड़ों से घाम तापने मैदानों में गए हमारे पहाड़ के पंछियों के भी लौट कर पहाड़ों में आने का मौसम है। हमें इन सभी चहचहाते मेहमान पछियों का स्वागत करना चाहिए और अपने देश को लौट रहे विदेशी पंछियों को अलविदा कह कर फिर आने का न्योता देना चाहिए। मल्या भी अब लौट रहे होंगे। जाओ मल्या, जाओ। फिर लौट कर आना, हां? हम तुम्हारी राह देखेंगे।

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(देवेंद्र मेवाड़ी)

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