आषाढ़ में पहाड़-4

लोहाखाम का मंदिर

सामने लोहाखाम का मंदिर आ गया। चारों ओर चीड़ के ऊंचे-ऊंचे पेड़ और उनके बीच में धार पर बांज के पेड़ के पास सलेटी पत्थरों का ऊंचा चबूतरा जो कभी हमारे बुजुर्गों ने बनाया होगा, न जाने कितनी पीढ़ियां पहले। चबूतरे के ठीक सामने अब सुरई का बहुत ऊंचा पेड़ है जिसे वहां शायद बीस-पच्चीस साल पहले किसी ने रोपा होगा। और, यह बड़ा-सा मंड़यौ? यह भी चालीस-पचास साल पहले नहीं था। बाद में बनाया गया होगा। चीड़ के उस वीरान वन में वह मेहराबदार मंड़्यौ सुंदर लग रहा था। उसके भीतर तमाम बड़े-बड़े भांडे-बर्तन भरे थे जो परसों पूजा के दिन खाना बनाने के काम आएंगे। कुछ लोग नए खंबे गाढ़ रहे थे। बाकी लोग वर्षा को ध्यान में रख कर आसपास से पिरोल जमा करके छानियों की छतों पर डाल रहे थे।

जैंतुवा और दो-चार आदमी पाइप लेकर ऊपर धार पर चढ़े। कुछ देर बाद लौटे तो जैंतुवा ने इशारा करके बताया, “उ द्यखा (देखो) ददा,  सीर पर से पाइप जोड़ कर वहां तक पानी आ गया है।”

मैंने देखा, चीड़ के पेड़ों के बीच पाइप से खत-खत, खत-खत पानी गिर रहा था। जैंतुवा कह रहा था,  कुछ लोग और पाइप ला रहे हैं। तीन पाइपों से काम चल जाएगा। फिर छानी के नीचे तक पानी पहुंच जाएगा। अब तो बात तब है जब बिद हो जाए (वर्षा न हो)।

सामूहिक रूप से काम करने आए लोग बैठ कर सुस्ता रहे थे। जैंतुवा ने कहा, “देवता ने हमारी परसों की बिनती तो सुन ली। पानी की समस्या हल हो गई है। अब एक बार फिर सिलाम करके (हाथ जोड़ कर) बिनती करते हैं कि हे देवता, अब बिद दि दिया। दूर-दूर गांवों से लोगों को आना है। पूजा करनी है। देवता दैन (दाहिने) हो जाना।”

होई, अब हमसे तो इतना ही होने वाला ठैरा। बाकी तो बिनती ही कर सकते हैं।”

सब काज (काम) सुफल है जाओ,” किसी ने कहा और हम लोग गांव की ओर लौटने लगे। मैंने जैंतुवा ने पूछा, “भया, लोपचुली-लोहाखाम कहां बता रहे थे? ”

उ द्यखा वां” (वह देखो वहां) , उसने हाथ के इशारे से दिखाया।

सामने दांई ओर नीली पर्वतमालाओं के बीच अपना मस्तक तान कर लोहाखाम-लोपचुली पहाड़ खड़ा था। मैं बचपन में उसके दूसरी ओर बसे अपने माल-भाबर के गांव ककोड़ से

उसे देखा करता था।

जिस पगडंडी पर हम वापस चल रहे थे, उससे कुछ दूर नीचे तिरछे रास्ते से पांच-सात लोग पीठ पर बड़े-ब़ड़े गट्ठर लेकर चले आ रहे थे।

लो, ये भी आ गए,” जैंतुवा ने कहा, “पातों (पत्तियों) की समस्या भी हल हो गई।”

तबत कौछ (तब तो कहा) , सब काम ठीक होते जा रहे हैं। अब बिद भी हो जाएगा। वर्षा रुक जाएगी, ” किसी ने कहा।

मैंने पूछा, “क्या मालू के पत्ते ला रहे हैं? कहां से? ”

किलै होई। तली (नीचे) दुमाल और आसपास के चांठों (चट्टानों) से। हजारों लोगों को खाना खिलाना पड़ेगा। उसके लिए पत्तल चाहिए, दूनियां (दोने) और पत्ते भी चाहिए।”

पत्तियां लाने वाले लोग ऊपर मंदिर की ओर चले आ रहे थे। लौटते समय हमारे सामने ठींगे के धूरे का ऊंचा पहाड़ दिखाई दे रहा था। और, उस पर बांज का वह विशाल वृक्ष भी जिसकी छांव में सिद्ध देवता का मंदिर है।

रास्ते में यहां-वहां छोटे-छोटे चटख लाल रंग के फलों से घिंघारु लदे हुए थे। धूरे से उतरते समय टीन की छत वाला वह बड़ा-सा बंग्याल (बंगला) भी दिखाई दिया जिसे कभी हमारे गांव के ही जोध्यदा, धरम्यदा, ज्ञान्यदा और जैराम दा, चार भाइयों ने बड़े मन से बनाया था जिसकी खिड़कियों के कांचों के पार हरा-भरा जंगल, जंगल साफ करके सामने कानला में बनाया गया बगीचा, कूंड़ के चौरस खेत और दूर नीले पहाड़ों के पार हिमालय दिखाई देता था। जोध्यदा शिकारी थे। अपनी बंदूक लेकर उस कमरे से चारों ओर का नजारा देखते थे। उनका बड़ा नाम था। कई लोग उन्हें गांव का राजा कहते थे। सरकारी मुलाजिम नीचे दूकान में उन्हीं के पास आकर टिका करते थे। लोग कहा करते थे, ‘जैरामदा ने भाइयों से कहा, मैं बंगले में क्या करूंगा? सदा गोरु-बाछों के साथ रहा हूं, उन्हीं के साथ रहूंगा। मेरे लिए गोशाला बना दो।’ उनके लिए भाइयों ने बंगले से थोड़ा नीचे गोशाला बना दी।

लेकिन, अब बंगले से नीचे कई सीढ़ीदार खेतों में निर्माण कार्य चल रहा था। मैंने पूछा, “बंगले के आसपास यह क्या चल रहा है जैंतुवा?”

द, कौन जाने? बंगला तो अब बिक चुका है।”

मैंने चौंक कर कहा, “बिक चुका है? किसने खरीदा? ”

कोई बाहर का आदमी है बल।”

बेचा क्यों? ”

द, कु जानौ! ” (कौन जाने)

साथ चल रहे लोगों में से किसी ने कहा, “अट्ठाईस लाख हाथ आए बल। दस-बारह लाख दलालों की जेब में गए। अजमत की बात ये है बल कि असली खरीददार अभी तक यहां नहीं आया है। उसने देखा ही नहीं है बल हौ, पता नहीं क्या सांच्ची है क्या झूठ।”

होई, हमें क्या पता?” किसी ने उनकी बात में बात मिलाई।

मैं सकते में आ गया। तो, यहां हमारे गांव में भी खरीद-फरोख्त शुरू हो गई? कहां मैं धानाचूली-रामगढ़ की बात कर रहा था। गांव में मोटर रोड आई और उसके साथ ही अचल संपत्ति के शिकारी भी घात लगा कर घूमने लगे हैं।

भरे मन से उतार में उतरते रहे। ग्राम प्रधान हिम्मत के घर पर कुछ देर बैठे जहां गांव में स्वास्थ्य रक्षा की जागरूकता फैलाने का जज्बा लेकर एक एन जी ओ के दो कार्यकर्ता बैठे चर्चा कर रहे थे। वहां एक प्याली चाय पीकर हम घर की ओर चले आए। उस दिन यानी 4 जुलाई को भी ऊदा आसमान था। लगता था आषाढ़ के बादल किन्हीं और पहाड़ों की ओर पलायन कर गए हैं। अच्छा है, अगले दिन गांवों से जातुरियों के आने और श्योंरात जमाने के लिए मौसम साफ रहेगा।

लेकिन, नहीं। हमारा अनुमान गलत था। बादल लौट आए। सुबह पांच बजे के धुंधलके में बाहर झांका तो वे झमाझम बरस रहे थे। श्योंरात का दिन और ऐसी बरसात कि लगता ही नहीं था थमेगी। छाता लेकर खेतों की ओर निकला ही था कि वह बारिश और हवा के झौंकों से उलट गई।

घर के आगे जैंतुवा चौकी में उदास बैठा था। मुझे देख कर बोला, “आब कि हुंछ?” (अब क्या होता है)। लेकिन, उसने आस नहीं छोड़ी थी। बोला, “क्या पता अगास परीक्षा ले रहा हो। जम कर बरसेगा और फिर थम जाएगा। अभी बहुत टैम है। आटा, सूजी, चीनी, आलू, गेहूं सबकी बोरियां पार दूकान में ही रखी हैं। घी के कनिस्तर रखे हैं। वर्षा थमे तो मंदिर में भेजें। अभी लोग आ जाएंगें सामान ले जाने के लिए। जातुरि भी कैसे आएंगी? चलो, अब जो भी होगा, देखा जाएगा।” थोड़ी देर बाद बारिश कम हुई तो मिडार से पुनदा भी आ गया। आंगन की मेंड़ पर बैठ कर बोला, “देखो तो अब क्या होता है।” बारिश बढ़ने से पहले वह भी मंदिर के काम के लिए चला गया।

वर्षा फिर शुरु हो गई। राशन-पानी, गाड़ी से उतार कर क्वैराला रामी की दुकान में संभाला हुआ था। असेटा-बसेट बारिश में मंदिर तक सामान पहुंचाने वाली टीम के सदस्य नीचे रामी की दुकान में आते रहे। आते, बैठते, बारिश को देख कर उसके थमने का इंतजार करते। दोपहर के आसपास वर्षा कुछ हल्की हुई तो वालंटियरों ने सामान घोड़े पर लाद कर मंदिर तक भेजना शुरू कर दिया। 14 क्विंटल आटा, 2 क्विंटल सूजी, 14 कनिस्टर घी, ढाई क्विंटल चीनी, 28 कट्टा आलू और हर घर से ‘ताड़ मारने’ और जगरियों को भेंट देने के लिए ‘दुसेरी’यानी दो-दो माना (एक नाली) गेहूं। बरसती-थमती वर्षा के बीच तिरपाल से ढक-ढूक कर जैसे-तैसे सामान बाखली में भंडार तक पहुंचा दिया गया। वहां से उसे अगली सुबह जंगल में मंदिर तक पहुंचाने की व्यवस्था कर दी गई।

बारिश का खेल चलता रहा। अचानक एक छमक आती और फिर रुक जाती। मौसम की परवाह न करके दूर-दूर गांवों से आकर अतिथि बाखली में पहुंचते रहे। वहां से गांव के लोग आ-आ कर उन्हें अपने-अपने घरों में ले जाते रहे ताकि उन्हें खाना खिला कर शाम को समय पर श्योंरात के लिए बाखली में भेजा जा सके। कई अतिथि सीधे घरों में ही पहुंचे और वहां से खा-पी कर बाजे-गाजे बजाते बाखली में पहुंचते रहे। बहू-बेटियां बाल-बच्चों के साथ घरों में पहुंचीं।

(जारी है)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *