चहकने लगी हैं बुलबुलें

 

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मौसमे-बहार की खबर पाकर लौट आई हैं बुलबुलें। इन दिनों अलस्सुबह सन्नाटे में दो-एक बुलबुलों की चहक से नींद खुल जाती है। कुछ समय पहले तक जब सर्द हवाओं की सिरहन से बचने के लिए हम रजाइयों में मुंह ढांप कर लंबी नींद ले रहे थे तब प्रवासी बुलबुलें कहीं दूर गर्म इलाकों में सुबह के गीत गा रही होंगी।

घड़ी देखता हूं। चार-साढ़े चार बजे का समय यानी ब्राह्म मुहूर्त है और बाहर कहीं पेड़ पर बुलबुल ने चहकना शुरू कर दिया है- पी….क्विह…क्विह! नींद भाग चुकी है और जेहन में बुलबुल की चहक गूंज रही है। लगता है कहीं आलोक धन्वा भी गुनगुना रहे हैं:

‘एक नन्हीं बुलबुल

गा रही है

इन घने गोल पेड़ों में

कहीं छुप-छुप कर

गा रही है रह-रह कर।’ (आलोक धन्वा)

हैरान हूं, इन दिनों दो-एक बुलबुलें ही क्यों चहक रही हैं? कहां गईं बाकी बुलबुलें? कहीं गौरेयों के बाद अब हमारे मोबाइल टावरों और महानगर के लोगों की बेरूखी से हमारी प्यारी बुलबुलें भी तो गायब नहीं हो रही हैं?

लखनऊ के पुराने नामचीन शायर ख्वाजा हैदर अली ‘आतिस’ की जुबां  में मन कह रहा है:

‘ये आरजू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते

हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ्तगू करते

पयामबर न मयस्सर हुआ तो खूब हुआ

जु़बान-ए-गैर से क्या शह-ए-आरजू करते।’

बुलबुलों की क्या कहें! फारसी शायरी तो बुलबुलों के वर्णन से भरी पड़ी है। वहां शायरों ने बुलबुल को गुल-ए-बहार यानी वसंत का अग्रदूत कहा है। बात ईरान की है। बसंत आता है और खूब गाती हैं बुलबुलें। असल में बुलबुल प्रवासी पक्षी हैं। ये सर्दियों में प्रवास पर जाकर अप्रैल-जून में ईरान लौट आती हैं, जब वहां गुलाब खिलते हैं। फारसी के मशहूर शायर शेख सादी, जिन्हें ‘बुलबुले शीराज़’ की उपाधि से नवाजा गया था, कहते हैं: ‘ओ बुलबुल! हमारे लिए वसंत की खुशियों का पैगाम लाओ, बुरी खबरें उल्लू के लिए छोड़ आओ।’

इधर, मैं बेहतरीन गद्य की किताब ‘नवनीत सौरभ’ में मौलाना अबुल कलाम आजाद का लेख  ‘अहमद नगर के किले में’ पढ़ रहा था कि बुलबुल के जिक्र पर आंखें टिक गईं। वे लिखते हैं, “बुलबुल की नवाओं का जोश तो वाकई ईरान के हिस्से में आया है। मौसमे बहार में जंगल और बाग ही नहीं, बल्कि हर घर के सामने का बगीचा इनकी नवाओं से गूंज उठता है। बच्चे झूले में इनकी लोरियां सुनते-सुनते सो जाएंगे और माताएं इशारा करके बतलाएंगी कि देख यह बुलबुल है, जो तुझे अपनी कहानी सुना रही है।’

लेकिन, मन ने पूछ लिया- क्या वहां ईरान और यहां हमारे देश भारत की बुलबुल एक ही प्रजाति की है? तो, वैज्ञानिक कहते हैं- नहीं, हमारी बुलबुल से अलग है वह। उसका वंश ‘लुसिनिया’ है जबकि हमारी बुलबुल का वंश है- पिक्नोनोटस। लुसिनिया वंश में तो हमारे देश में ब्लू थ्रोट (नीलकंठी, हुसेनी पिद्दा), हिमालयन रूबी थ्रोट और इंडियन ब्लू रोबिन पाई जाती हैं। जबकि, पिक्नोनोटस वंश की कम से कम नौ प्रमुख प्रजातियां यहां मौजूद हैंः रेड वेंटेड बुलबुल, रेड ह्विस्कर्ड बुलबुल, ह्वाइट इयर्ड बुलबुल, ब्लैक हेडेड बुलबुल, ब्लैक क्रेस्टेड बुलबुल, यलो थ्रोटेड बुलबुल, ग्रे हेडेड बुलबुल और स्ट्रिएटेड बुलबुल।

मगर, कवियों की कल्पना के भी क्या कहने! फारसी कवियों ने बुलबुल के गीतों को विरह की दर्द भरी दास्तान मान लिया। इतना ही नहीं, यह भी मान लिया कि बुलबुलें तो सिर्फ नर होती हैं और जिन मादा बुलबुलों से वे बेइंतिहा प्यार करते हैं, वे तो गुलाब के खूबसूरत फूलों में तब्दील हो गईं हैं। इसलिए बहार आती है, गुलाब खिलते हैं और जार-जार आंसू बहाने और प्रेयसी के लिए दर्द भरे तराने गाने के लिए नर बुलबुलें लौट आती हैं। वे कहते हैं, वे बुलबुल के गीत नहीं उनकी नवाओं की सदाएं यानी उनकी दर्द भरी आवाजें हैं। शायद तभी मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भी लिखा है, “लिखने के लिए बैठूंगा, तो साथ-साथ इनकी नवाएं भी शुरू हो जाएंगीं। गोया इन्हें मालूम हो गया है कि यही वक्त है, जब एक हमसफीर (एक-सी आवाज वाला) अपने दिलो-ज़िगर के ज़ख्मों की पट्टियां खोलता है।”

मगर शायर मीर तकी मीर बड़े फ़ख्र से कहते हैं:

जिस चमन ज़ार का है तू गुल-ए-तार

बुलबुल उस गुलिस्तां के हम भी हैं !

फारसी शायरों का कहना है, उनकी बुलबुल तो गज़लों के बागीचों में पाई जाती है। वे सच ही कहते हैं क्योंकि जिन बुलबुलों का जिक्र वे करते हैं वे केवल किताबों के आसमान में उड़ा करती हैं! लेकिन, वैज्ञानिकों की बात मानें तो दुनिया में कम से कम 140 तरह की बुलबुलें पाई जाती हैं। एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में ये खूब पाई जाती हैं। फारसी जुबान में इन्हें ‘बोलबोल’ कहा जाता है। हो सकता है, शायद तभी इनका नाम ‘बुलबुल’ पड़ा हो। रात को गाने वाली चिड़िया मान कर अंग्रेजों ने इसका नाम ‘नाइटिंगेल’ रख दिया। यूं, हमारे देश की अंग्रेजी की सुप्रसिद्ध कवियित्री सरोजनी नायडू को भी उनके मधुर गीतों के लिए नाइटिंगेल कहा जाता था।

उधर ईरान में लुसिनिया वंश की इन तीन प्रजातियों को ‘बोलबोल’ कहा जाता है: लुसिनिया मैगाराइंकोस, लुसिनिया लुसिनिया और लुसिनिया स्वेसिका। गौरेया के आकार की लुसिनिया स्वेसिका हमारे देश में भी पाई जाती है। यही नीलकंठी या हुसेनी पिद्दा है। अंग्रेजी में इसे ब्लू थ्रोट कहते हैं क्योंकि इसके नर पक्षी का गला चमकदार नीले रंग का होता है। उसके बीच में सफेद या गहरे भूरे रंग का धब्बा होता है। और हां, आंखों के ऊपर सफेद भौंह की रेखा भी इसकी खास पहचान है।

हमारे देश की बुलबुलों में से गुलदुम यानी रेड वेंटेड बुलबुल बहुत आम है और देश भर में पाई जाती है। उसका सिर काला होता है। पूंछ की जड़ में एक लाल धब्बा इसकी पहचान है। लाल गलमुच्छे वाली पहाड़ी बुलबुल भी एकदम सूखे इलाकों को छोड़ कर देश भर में पाई जाती है। लेकिन, काले सिर और सफेद गालों वाली ह्वाइट इयर्ड बुलबुल पूरे हिमालय क्षेत्र और उसके पैताने के इलाकों में पाई जाती है। इसकी पूंछ की जड़ पर पीला धब्बा होता है। कुमाऊं से लेकर अरूणाचल प्रदेश तक पहाड़ों के ही पैताने काले सिर और काली शिखा वाली ज़र्द बुलबुल पाई जाती है। दक्षिण भारत में पीले गले और पीली भौंह वाली बुलबुल पाई जाती है।

imagesफारसी कवियों ने दर्द भरी हज़ार दास्तान सुनाने वाली बुलबुल का एक नाम ही ‘हज़ारदास्तान’ रख दिया। उन्होंने इसे ‘हज़ार आवाज़’ भी कहा है। उनकी जुबान में अल-स्सुबह बोलने वाली बुलबुल मुर्ग-ए-सहर या बुलबुल-ए-सहर कहलाई तो रात में गाने वाली बुलबुल को मुर्ग-ए-शब कहा गया है। यों, फारसी में शबख्वां और, अंदलीब भी बुलबुल के ही नाम हैं। जहां तक गाने की बात है, लुसिनिया लुसिनिया बुलबुल का सुर सबसे सुरीला माना गया है। वह गीत की शुरूआत कुक….कुक…कुक…से करती है और फिर उसके सुरों का आरोह कानों में दर्द भरी मिठास घोलने लगता है। लुसिनिया मैगाराइंकोस बुलबुल टिओ-टिओ का सुर उठा कर आरोह में टीयू-टीयू की मधुर तान छेड़ती है।

बुलबुल के सुरीले सुरों ने ईरान में एक किंवदंती को भी जन्म दे दिया। पहले तक वहां लोग कहते थे कि बुलबुल सात बच्चों को पालती है जिनमें से सिर्फ एक बच्चा बड़ा होकर सुरीले गले वाली बुलबुल बनता है। बाकी पिटपिटी या फुदकी बन जाते हैं! लेकिन, वैज्ञानिक इस बात को कतई नहीं मानते। वे कहते हैं, वहां जो लुसिनिया वंश की बुलबुलें होती हैं, वे ज्यादा से ज्यादा चार अंडे देती हैं। और, यहां भारत में तो हमारी बुलबुलें बस दो या तीन अंडे देती हैं। इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि बुलबुल केवल सुबह या रात में ही गाती हैं, बल्कि प्रजनन की ऋतु में तो नर बुलबुलें जोड़ा बनने तक दिन-रात कभी भी चहकती रहती हैं।

सुरीले सुरों की बात चली है तो यह भी बता दें कि जब मशहूर पक्षी विज्ञानी सालिम अली से पूछा गया कि सबसे सुरीला गीत कौन-सी चिड़िया गाती है, तो वे बोले- हिमालय क्षेत्र की ‘ग्रे विंग्ड ब्लैक बर्ड’ यानी टर्ड्स बोलबोल। यों, थ्रश परिवार के कई पक्षी जैसे मालाबार ह्विसलिंग थ्रश और ह्वाइट रम्पड शामा भी काफी सुरीला गाती हैं। सामान्य बुलबुल यानी लुसिनिया मैगाराइंकोस को भी पहले थ्रस चिड़ियों की श्रेणी में ही रखा जाता था लेकिन अब इसे गाने वाले फ्लाईकैचर पक्षियों की म्यूजिकेपिडी श्रेणी में रखा जाता है।

बहरहाल जो भी हो, बुलबुल के मधुर स्वर ने सदियों से कवियों के मन को खूब मोहा है। फारसी की शायरी तो बुलबुलों के वर्णन से भरी ही है, अंग्रेज कवियों ने भी इन पर बड़े मन से कविताएं लिखी हैं।  अंग्रेज कवि राबर्ट ब्रिजेज अपनी नाइटिंगेल कविता में कहते हैं कि “कितने खूबसूरत होंगे वे पहाड़, वे घाटियां और वे बहती सरिताएं जहां से तुम यह मधुर संगीत सीख कर आई हो।” जान कीट्स ने भी बुलबुल पर ‘ओड टू नाइटिंगेल’ कविता लिखी। और, प्रकृति के अप्रतिम अंग्रेज कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने अपनी कविता ‘द नाइटिंगेल’ में लिखा ही है:

और सुनो जरा! बुलबुल गीत गाने लगी है

‘सबसे अधिक सुरीला, सबसे अधिक विषाद से भरा’ पंछी!

एक और प्रसिद्ध अंग्रेज कवि सेमुअल टैलर कोलरिज की संवाद शैली में लिखी कविता ‘द नाइटिंगेल’ में विलियम वर्डसवर्थ, उसकी बहिन डोरोथी वर्डसवर्थ और स्वयं सेमुअल टैलर कोलरिज रात की निस्तब्धता में एक सरिता के किनारे बैठे हैं कि तभी बुलबुल गाने लगती है….। सुप्रसिद्ध लेखक आस्कर वाइल्ड ने भी ‘द नाइटिंगेल एंड द रोज़’ शीर्षक से प्रेम, त्याग और स्वार्थ पर आधारित एक रूपक कथा लिखी थी।

मुझे सुबह के शांत वातावरण में अभी केवल बुलबुल की आवाज सुनाई दे रही है। अपनी ‘पी…क्विह्..क्विह्’ की भाषा में मादा बुलबुल को वह न जाने क्या संदेश दे रही है। जानता हूं, थोड़ी देर में आसपास ही कहीं नन्हीं ओरिएंटल मैगपाई रोबिन और फिर दर्जिन भी चहकने लगेंगीं। दो-एक कव्वे भी गले का रियाज करेंगे और दोपहर भर ग्रीन बार्बेट यानी बड़ा वसंता कुटरू…कुटरू…कुटरू. की कूट भाषा में मादा से अपने प्यार का इजहार करता रहेगा। लेकिन, इस सबके बीच सुबह-सबेरे घुंघरूओं की खनक जैसी गौरयों की मीठी आवाज अब सुनाई नहीं देती। कहां गईं वे गौरेयां!

बुलबुलें समझ सकतीं तो शहर में आज के माहौल को देख कर हम उन्हें आगाह करने के लिए बीते दिनों के मशहूर शायर आनंद नारायण मुल्ला का यह शेर जरूर सुनाते:

बुलबुले नाद़ां! जरा रंगे-चमन से होशियार

फूल की सूरत बनाए सैकड़ों सैय्याद हैं!

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