मुंबई में विज्ञान और साहित्य

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विज्ञान और साहित्य विषय सुना तो मन प्रसन्न हो गया। फोन पर बिड़ला महाविद्यालय, मुंबई के डा. श्यामसुंदर पाण्डेय थे। कह रहे थे, वे इस विषय पर 12-13 जनवरी 2018 को दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित कर रहे हैं और चाहते हैं कि मैं उसमें विशेष अतिथि के रूप में अपना व्याख्यान दूं। मैंने कहा, आपने बहुत अच्छा और लीक से हट कर विषय चुना है, पहले तो इसके लिए बधाई और दूसरी बात यह कि मैं अवश्य आऊंगा। तो, मैं वहां गया, परिसंवाद में भाग लिया और सफल परिसंवाद की सुखद स्मृतियों के साथ वापस लौट आया हूं।
मैंने अपनी बात अंग्रेज भौतिक रसायन विज्ञानी और साहित्यकार सी.पी. स्नो के ‘टू कल्चर्स एंड द साइंटिफिक रिवोल्यूशन’ नामक उस रीड व्याख्यान से की जो उन्होंने 7 मई 1959 को सीनेट हाउस, कैम्ब्रिज में दिया था। उन्होंने विज्ञान और साहित्य के बीच बढ़ती खाई पर चिंता व्यक्त की थी और कहा था, वैज्ञानिकों और साहित्यकारों ने अपनी अलग-अलग दुनिया बना ली हैं। वैज्ञानिक शेक्सपियर के नाटक या डिकंस के उपन्यास तक नहीं पढ़ते और साहित्यकार विज्ञान का मामूली-सा नियम तक नहीं जानते हैं। ज्ञान के क्षेत्र में ये दो संस्कृतियां क्यों?
मैंने जर्मन दार्शनिक इमेनुअल कांट के उस कथन को भी याद किया कि ‘मैं आइजक न्यूटन को एक महान वैज्ञानिक तो मान सकता हूं लेकिन क्रिएटिव जीनियस नहीं।’ कारण, वैज्ञानिक एक निर्धारित परिपाटी यानी विज्ञान-विधि के अनुसार काम करते हैं जबकि साहित्यकार के पास केवल कल्पना का अनंत आकाश होता है। मैंने डा. जयंत विष्णु नार्लीकर की उस बात को भी याद किया कि न्यूटन भी कल्पनाशील ही रहे होंगे, तभी उन्होंने गिरते हुए सेब को देख कर सार्वभौमिक गुरूत्वाकर्षण के सिद्धांत की महान खोज की।
विज्ञान और साहित्य की बात करते हुए मैंने कहा कि अखिल ब्रह्मांड के बारे में प्रयोग और परीक्षण सें अर्जित तथ्यपरक और तर्कसंगत ज्ञान ही विज्ञान है। और, उत्तम विचारों की उत्कृष्ट लिखित अभिव्यक्ति है- साहित्य। शब्द और अर्थ की बात करते हुए मैंने काव्यशास्त्र के महान आचार्य भामह के शब्द भी याद किए कि ‘शब्दार्थो सहितौ काव्यम।’ फिर विज्ञान लेखन की कला के बारे में बात करते समय मुझे 170 पुस्तकों के लेखक, ‘यूरेका’ पत्रिका के वर्षों संपादक रहे रसायन विज्ञान के प्रोफेसर शिवादास के वे शब्द भी शिद्दत से याद आए कि विज्ञान अगर जटिल लगे तो उसे साहित्य में बदल दीजिए।
और, साहित्य में तो इतनी विधाएं हैं कि अगर हरेक में विज्ञान लिखा जाए तो वह रोचक और रसमय होगा ही। तब मुझे निराला याद आए जिन्होंने सन् 1932 में ‘सुधा’ में विज्ञान लेखन की बारीकियां समझाते हुए लिखा था कि “वैज्ञानिक विषयों के लिए भाषा का सरल होना प्राथमिक आवयकता है।” और, यह भी कि “शब्दों के सरल होने का यह अर्थ नहीं कि वे लालित्य या रोचकता से शून्य रक्खे जाएं।”
मैंने विज्ञान की विश्व प्रसिद्ध पत्रिका ‘नेचर’ में सन् 2005 में प्रकाशित ‘मेंडल्स ड्वार्फ’ उपन्यास के लेखक और जीव विज्ञान के शिक्षक सिमोन मावेर का भी जिक्र किया। कहा कि उन्होंने किस तरह विज्ञान और साहित्य के बीच की दूरी पर चिंता व्यक्त की कि क्यों वैज्ञानिकों को केवल तर्क और सिद्धांत तक तथा साहित्यकारों को कल्पना और फैंटेसी तक ही सीमित मान लिया जाता है? वैज्ञानिक भी कल्पना और साहित्यकार भी तर्क के सहारे आगे बढ़ते हैं।
नोबेल पुरस्कार विजेता पक्षी वैज्ञानिक निकोलस टिंबरजेन के इस कथन का भी जिक्र किया कि अगर मनुष्य के स्वभाव को गहराई से जानना है तो इथालाजिस्ट यानी मानव व्यवहार विज्ञानी से पूछने के बजाय दोस्तोएवस्की और टालस्टाय को पढ़ो।
सिमोन मावेर के हवाले से उस प्रसिद्ध कीटविज्ञानी के बारे में भी मैंने बताया जिसने तितलियों और पतंगों की करीब 20 प्रजातियों की खोज की, उनका नामकरण किया और बीसेक उच्च कोटि के शोधपत्र भी लिखे। वह कीट-विज्ञानी उपन्यासकार था ब्लादिमीर नबोकोव जिसे उसके उपन्यास ‘लोलिता’ और ‘पेल फायर’ ने विश्व के प्रतिष्ठित उपन्यासकारों की श्रेणी में स्थान दिलाया। यहां मैंने ‘चौरंगी’ के उपन्यासकार शंकर के ‘निवेदिता रिसर्च लेबोरेटरी’ उपन्यास के कीट विज्ञानी नायक प्रोफेसर जीमूतवाहन को भी याद किया। अंत में, अपनी बात सिमोन मावेर के इस कथन से समाप्त की कि विज्ञान और साहित्य का ‘क्रास फर्टिलाइजेशन’ होता रहा है और होता रहेगा।

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