क्यों विदा हो रही हैं जीव-जातियां

पिछले दिनों पहाड़ की यात्रा पर था। उत्तरकाशी के मार्ग में भवान गांव के पास से निकल रहे थे कि अचानक कानों में आवाज आई- तीन तोला तित्तरी! क्हीं कोई तीतर बोला था। इतने वर्षों बाद सुनी तीतर की आवाज मन की घाटियों में गूंजती चली गई और मुझे मेरे बचपन के अपने गांव में खींच ले गई।

images (2)कितने तीतर बोलते थे तब मेरे गांव में! लोग कहीं उठते होंगे सुबह मुर्गें की कूकड़ूं-कूं से, हम तो तीतरों की तीन-तोला तित्तरी की तेज आवाज और गौरेयों की घुघरूओं की-सी चहचहाहट से जागते थे। क्या मंजर था तब हमारे गांव का। चिड़ियों की चहचहाहट से सुबह होती और श्वेत जंगली गुलाब की बड़ी-बड़ी झाड़ियों में सैकड़ों मैनाओं के कलरव के साथ शाम ढलती। अंधेरा घिरते ही गांव के किसी कोने में, कोई सियार बोलता- हुआं, हुआं, हुआं! और, जैसे अपनी हाजरी दर्ज़ कराने के लिए गांव के सभी कोनों से उसकी बिरादरी के पचासों सियार बोल उठते- हुआं…हुआं…..हुआं! रात में घने जंगल से काकड़ की आवाज आती-कांक! कांक! गर्मियों की अगवानी कफुवा पक्षी करते थे- कुक्कू! कुक्कू! कुक्कू! और, जब वनों में रसीले काफल पक जाते तो काफल पाक्को चिड़िया खुशी का गीत गाने लगती थी- काफल पाक्को! काफल पाक्को!

खेतों में मक्का बोते समय आगे होते हल चला रहे पिताजी, उनके पीछे टोकरी में से एक-एक बीज गिराती मां, उसके पीछे पैर से कतार मिटाता मैं और मेरे पीछे मैनाएं और कव्वे बोआई की कतारों में से कीड़े-मकोड़ों को खोजते हुए। पंछी तब हमारे साथी थे। मिट्टी-पत्थरों से बने कच्चे मकानों की मुंडेर के नीचे खाली जगहों में गौरेयां रहा करती थीं और आंगन में बिखरे अनाज के दाने चुगा करती थीं। वे मां की लोक कथाओं में भी चहचहाती थीं। शरद ऋतु शुरू होते ही हिमालय की ओर से हजारों मल्या पक्षी आ जाते थे और हमारे खेतों में उतर कर अपनी लंबी उड़ान की थकान मिटाते थे। हिमपात होने से पहले हलकी पीली ह्यूं चड़ी आ जाती थीं।

तब कितनी चहल-पहल थी, उन चिड़ियों और वन्य जीवों से। लेकिन, यह क्या हुआ? पिछली बार वर्षों बाद गांव गया तो सोचता रह गया कि इतना सन्नाटा क्यों है गांव में? कहां गया पंछियों का वह मधुर कलरव? कहां गए वे सियार और दूसरे वन्य जीव? गांव का सिरमौर, वह मेरे बचपन का घना जंगल भी अब हरियाली खोता चला जा रहा है। ऋतुओं के बदलने की खबर देने वाले पंछी क्यों खामोश हो गए हैं? कहां गए वे पीऊ! पीऊ! पीऊ! बोलकर वर्षा ऋतु का संदेश देने वाले चातक?

imagesमां प्रकृति ने तो सभी छोटे, बड़े जीव-जंतुओं को अपनी गोद में समान रूप से शरण दी हुई है। रंग-बिरंगी तितलियों, नाना प्रकार के कीट पतंगों, प्राणियों और मां प्रकृति के आंचल में हरियाली भरने वाले पेड़-पौधों को। फिर क्यों धरती पर जीवन की धड़कन कम होती जा रही है? यह धरती तो सभी के लिए है, फिर क्यों हमारे कई हमसफर इसे अलविदा कह रहे हैं? शहरों में सुबह अपनी मीठी चहचहाहट से जगाने वाली गौरेयां गायब होती जा रही हैं। महानगर दिल्ली में स्वयं मेरे घर की बालकनी में कई वर्षों तक गौरेयां अपना घर बसा कर नई पीढ़ी को जन्म देती रहीं। लेकिन, पिछले तीन वर्षों से हम उनका बस इंतजार ही करते रह गए हैं। लोग कहते हैं, मोबाइल फोन के टावरों से निकलती सूक्ष्म तरंगों ने इन नन्हीं चिड़ियों का जीना दूभर कर दिया है। यानी, अब हम या तो मोबाइल फोन सुन लें, या फिर गौरेयों की चहचहाहट। साफ पता लग रहा है, कि ये आधुनिक गैजेट और हमारी रहन-सहन की शैली हमें प्रकृति और प्रकृति की संतानों से दूर कर रही है। शहरों, महानगरों के सीमेंट-कंक्रीट के जंगलों में तो न घोंसले बनाने की जगह रही, न उछलने-कूदने के लिए शाखें और न पेट भरने के लिए कंदमूल, फल-फूल और घास ही रही। गांवों में भी जब से सीमेंट-कंक्रीट के पक्के घर बनाने का चलन शुरू हुआ, तब से गौरेयां घर से बाहर हो गईं। न आंगन रहे, न आंगन में बिखरे अनाज के दाने। अपने पड़ोस में खिड़कियों के दर्पण जैसे कांच के बाहर बहुत दिनों तक एक बड़े बसंता को आधे-आधे घंटे तक कुटरू-कुटरू-कुटरू की प्यार भरी आवाज में अपनी सहचरी को बुलाते सुनता रहा था। शायद अपनी ही छवि देख कर उसे अपनी सहचरी का भ्रम होता था। कुछ दिन बाद मैंने उसे घर के सामने के पेड़ पर अपने बच्चे को पंख सुखाने, टहनियों पर फुदकने, उड़ान भरने के लिए पंख तौलने और पत्तियों के झुरमुट में छिपने की कला सिखाते हुए देखा। खिड़कियों पर आती चिड़ियों और यदा-कदा गश्त लगाते बंदरों की टोली को देख कर सदा लगता रहता है कि शायद कल यहां इनका घर रहा होगा। उजड़े घरों के भटकते बेघर बाशिंदे हैं ये सब।

जीवों के धीरे-धीरे गायब होने की सबसे अहम वजह भी यही बताई जाती है। जो जंगल इनके घर थे, वे कट गए। जो जंगल हैं भी तो उनमें हम मनुष्यों ने इतनी दखलंदाजी की है कि वन्य जीवों का चैन ही उड़ गया है। आदमी ने जानवरों से प्यार किया तो उनका बेरहमी से शिकार भी किया। किरन तिवारी की पंक्तियां याद आती हैं, “शोर यों ही न परिदों ने मचाया होगा/कोई जंगल की तरफ शहर से आया होगा।” वन्य जीवों के निर्मम आखेट का एक लंबा इतिहास है। आदमी ने शौक और मांस, खाल, बाल और यहां तक कि हड्डियों और दांतों तक के लिए जानवरों का शिकार किया। यहां तक कि आखेट के शौकीनों ने वन्य जीवों के सिर अपने दीवानखाने में बड़े शौक से सजाए। उनका यह शौक महंगा पड़ा और कई जीव प्रजातियों का अस्तित्व ही नेस्तनाबूद हो गया।

images (1)कहां गया वह सीधा-सरल डोडो पक्षी? विलुप्ति का प्रतीक आज सिर्फ अंग्रजी के मुहावरे में ही रह गया है वह- ‘डैड ऐज डोडो।’ और, हमारे देश के सूखे, घास के मैदानों में रहने वाला वह बेहद सुंदर प्राणी चीता कहां है? केवल किताबों में रह गया है वह। जिस तेजी से जीव-प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, कल वे भी किताबों में ही रह जाएंगी। संवेदनशील कवि राजेश जोशी के शब्दों में कहें तो “पेड़ों, पशुओं और परिंदों की न जाने कितनी प्रजातियां/विलुप्त हो गईं न जाने कब/अब तो उनकी कोई स्मृति भी/बाकी नहीं।” अफ्रीकी काले गेंडे, जेब्रा के बिरादर क्वागा, मोंक सील, तस्मानिया के बाघ, आइबैक्स और सुंदर पैसेंजर कबूतरों की भी यही करूण कथा रही है।

विडंबना तो देखिए, अब तक वैज्ञानिकों द्वारा टटोले गए ब्रह्मांड में लाख कोशिशों के बाद भी केवल हमारे सौरमंडल के इस नन्हे, नीले ग्रह यानी हमारी पृथ्वी में ही जीवन का पता लग पाया है। यानी, ब्रह्मांड के विशाल रेगिस्तान में फिलहाल यही एक नखलिस्तान है जहां जीवन का दीया जगमगा रहा है। सृजनहार ने आकाशगंगा के एक छोटे-से तारे सूर्य की परिक्रमा कर रहे हमारे सौरमंडल के आठ ग्रहों, उनके लगभग 84 चंद्रमाओं और कई बौने ग्रहों में से केवल हमारी धरती मां की गोद में जीवन की सौगात सौंपी। इस अमूल्य जीवन का इस तरह काल-कलवित हो जाना बेहद चिंता का विषय है। यह चिंता तब और भी अधिक बढ़ जाती है जब वैज्ञानिक यह कहते हैं कि हमारी प्यारी पृथ्वी पर जीव-प्रजातियों का छठा महाविलोपन यानी विनाश शुरू हो चुका है। वे बता रहे हैं कि पिछले पांच विलोपन आकाश से गिरे विशाल उल्का पिंड और शीत युगों के आगमन से हुए लेकिन छठे महाविनाश के मूल में है, स्वयं को इस ग्रह का सबसे बुद्धिमान प्राणी समझने वाला मनुष्य। मनुष्य, जिसे प्रकृति ने विशाल उल्का पिंड की मार से धूल-धूसरित आसमान, सूर्य के प्रकाश के अभाव में उजड़ी वनस्पतियों और भोजन की कमी के कारण नष्ट हो गए विशाल डाइनोसारों की जगह जीव-जगत की अगवानी करने की जिम्मेदारी सौंपी थी, उसी ने प्रकृति से इतनी छेड़छाड़ की कि तमाम जीवों का जीवित रहना दूभर हो गया। विकास की अंधी दौड़ में वह प्रकृति को नष्ट करता चला गया। उसका लालच बढ़ता गया, बढ़ता ही गया और आज इसका दुष्परिणाम हमारे सामने है। मखौल यह है कि इस सब के बावजूद हम राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलन महासम्मेलन कर, माथे पर गहरे बल डालकर खुद ही पूछते हैं कि यह सब क्यों और कैसे हुआ? सब कुछ जानते हुए भी इसे रोकने के रास्ते तलाशने का बहाना करते हैं और उस पर पूरी ईमानदारी से अमल भी नहीं करते। यानी, ‘अपनी ही तलवार से कत्ल करते हैं वो/हमीं से पूछते हैं हुजूर धार कैसी थी!’

download (1)अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता, धरती की हरियाली को लीलता सीमेंट-कंक्रीट के जंगलों को बढ़ाता; धरती आसमान और समंदरों में जहर घोलता आदमी तथाकथित विकास के मार्ग पर निर्बाध गति से आगे बढ़ता चला जा रहा है और उसके पीछे जीव-जातियों की उजड़ी प्रजातियों के अवशेष छूटते जा रहे हैं। यह आखिर कैसा विकास है जिससे स्वयं जीवन नष्ट हो रहा है? हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि अगर लगभग साढ़े छह करोड़ वर्ष पहले वह विशाल उल्का पिंड हमारी धरती पर न गिरा होता तो शायद ही मानव जाति सभी जीवों में से अपने बुद्धि-चातुर्य से कभी आगे बढ़ पाती। हो सकता है, तब जैसे मानव ह्यूमेनोइड जीव के रूप में आगे बढ़ा, डाइनोसोर विकास क्रम में दो पैरों पर खड़े हो गए होते और आज धरती पर डाइनोसोराइड सभ्यता का राज होता!

यह एक स्वैर कल्पना है लेकिन जिस तरह पृथ्वी पर जीव जातियां विलुप्त होती जा रही हैं और आदमी स्वयं आदमी का दुश्मन बनता जा रहा है, कहीं कवि की यह कल्पना साकार न हो जाएः

“मैं जरा देर से इस दुनिया में पहुंचा

तब तक पूरी दुनिया सभ्य हो चुकी थी

सारे जंगल काटे जा चुके थे

सारे जानवर मारे जा चुके थे

……………..

दोनों तरफ लोहे और कंक्रीट के

बड़े-बड़े जंगल उग आए थे

जिनमें दिखाई दे रहे थे

अत्यंत विकसित तरीकों से आदमी का ही शिकार करते हुए आदमी।”          (कुंवर नारायण)

इस युग के प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी स्टीफन हाकिंग भी यों ही नहीं कह रहे हैं कि मनुष्य जाति को बचाने के लिए जल्दी ही किसी और दुनिया की खोज कर लेनी चाहिए क्योंकि कल यह दुनिया रहने लायक नहीं रह जाएगी। सच भी है, जीव-जातियां इसी तरह विदा होती रहीं तो कल बेशक मनुष्य जाति का भी यही हश्र हो सकता है।

(देवेंद्र मेवाड़ी)

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