एक असाधारण अन्वेषक और विज्ञान लेखक की अपूर्व गाथा

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आज गूगल ने अपने डूडल से महान अन्वेषक और विज्ञान लेखक पंडित नैनसिंह की स्मृति को नमन किया है। आभार गूगल। लेकिन, कौन थे पंडित नैन सिंह? एक बार फिर ‘एशिया की पीठ पर- पंडित नैन सिंह रावत’ के पन्ने पलट रहा हूं।
असल में सन् 1864 में एक अनजाना, लेकिन असाधारण अंवेषक पंडित नैनसिंह रावत एक व्यापारी के नौकर के साथ लदाखी वेश में कांठमांडो से तिब्बत जाने की हर संभव कोशिश कर रहा था। माह भर बाद उसे इस कोशिश में सफलता मिल गई। अपने महत्वपूर्ण शोध ग्रंथ ‘एशिया की पीठ पर- पंडित नैनसिंह रावत’ में लेखक द्वय उमा भट्ट और शेखर पाठक ने हमें इस अनजाने अन्वेषक नैनसिंह के समय के साथ जोड़ दिया है। यह महत्वपूर्ण कृति हमारा परिचय एक ऐसे समर्पित और दुस्साहसी भौगोलिक अंवेषक से कराती है,, जो घोर गरीबी में पला-बढ़ा, विपत्तियों से लड़ा और अपने जीवन को दांव पर लगा कर हिमालय के उस पार एक ऐसे रहस्यमय और अज्ञात देश की पैदल यात्रा पर निकल पड़ा जिसकी सीमाओं में प्रवेश का दंड था- मृत्युदंड। लेकिन, वह इससे भयभीत नहीं हुआ और बार-बार वेश बदल कर रहस्यमय प्रदेश की उन राहों पर अपने कदमों की संख्या को गिनता हुआ, मनकों की जप माला से मीलों का हिसाब करता, सितारों से दिशाओं का अनुमान लगाता, पानी उबाल कर पहाड़ों की ऊंचाई मापता लगातार आगे बढ़ता रहा। उसने अपनी प्रखर वैज्ञानिक दृष्टि से, आश्चर्यजनक परिशुद्धता के साथ उस रहस्यमय प्रदेश के रहस्यों का अनावरण किया। स्वयं औपचारिक शिक्षा से वंचित नैनसिंह ने एक उच्च शिक्षित सिद्धहस्त अन्वेषक की तरह अपने खोज कार्य को पूरा किया और तब तक मुगलों, हिंदुस्तानियों, पठानों और फिरंगियों के लिए वर्जित ‘हूण देश’ यानि तिब्बत की सच्चाई दुनिया के सामने रख दी।

पुस्तक में वर्णित इन खतरनाक खोजी यात्राओं के वर्णन से जो चीज हमारा सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करती है- वह है पंडित नैनसिंह रावत की वैज्ञानिक दृष्टि जिसकी जद में जो कुछ भी आया, परिशुद्धता के साथ रिकार्ड हो गया।

फिर वे चाहे सैकड़ों मील लंबी सड़कें हों, गगनचुंबी पहाड़ हों या गहरी घाटियां, नदी-नाले, झील-तालाब अथवा जन-जीवन हो या पशु या वनस्पतियां। उस असाधारण अन्वेषक की पैनी दृष्टि से कुछ नहीं छूटा।

22540071_10207911280659131_4557402540420412518_n‘एशिया की पीठ पर’ पुस्तक के अनुसार नैन सिंह का चयन सन् 1860 में तत्कालीन भारतीय सर्वेक्षण विभाग के माण्टगोमरी की सूझ-बूझ का प्रतिफल था। नैन सिंह अपने गुप्त कोड नम्बर ‘ए’ या ‘एक’ के साथ 1865 में काठमाण्डू के रास्ते तिब्बत और अन्ततः जनवरी 1866 में ल्हासा पहुंचने वाला प्रथम ब्रिटिश भारतीय सर्वेक्षक बना। ब्रह्मपुत्र की उपरी घाटी होकर 18 माह बाद 2000 किमी. (1250 मील) की यात्रा अपने पच्चीस लाख नपे-तुले कदमों से पूरी कर वह भारत लौटा।

1863 में सर्वेक्षण मुख्यालय, देहरादून में पंडित नैनसिंह को सर्वेक्षण के तत्कालीन सामान्य उपकरणों के उपयोग का सामान्य प्रशिक्षण दिया गया जिसमें प्रमुख उपकरण थे सैक्सटेंट, जेबी क्रोमोमीटर, थर्मामीटर और घड़ी। पंडित नैनसिंह को इन उपकरणों के साथ काठमांडो होकर तिब्बत पहुंचना था। उन्हें मिलम से मानसरोवर और ल्हासा तक का नक्शा बनाने का उत्तरदायित्व सौंपा गया।

पं. नैनसिंह ने इन वैज्ञानिक उपकरणों से भी अधिक जिन चीजों का उपयोग किया- वे थे उसके पैर, उसकी जपमाला, धर्मचक्र और उसकी आंखें। नैनसिंह का एक कदम 31 इंच का था और एक मील में वह 2,000 कदम चलता था। लाखों कदमों का हिसाब रखना किसी मामूली व्यक्ति का काम नहीं है। लेकिन, नैनसिंह ने कदम-दर-कदम दूरियां नाप कर उनका सही-सही हिसाब लगा कर भौगोलिक नक्शा बनाने का दुष्कर कार्य पूरा किया। उसने 1812 में मूरक्राफ्ट द्वारा किए गए पश्चिमी तिब्बत के अन्वेषण को पूर्वी तिब्बत से जोड़कर पूरे तिब्बत का प्रथम एवं स्पष्ट मानचित्र बनाने की आधारशिला रखी। अपनी दूसरी और तीसरी यात्राओं में मध्य एशिया से लौटकर अन्तिम यात्रा में उसने लद्दाख से ल्हासा जाते हुए चांगथांग पठार एवं मध्य-दक्षिण एशिया की नदियों के उद्गम को पृथक करने वाले 7625 मीटर ऊंचे कुनलुन पहाड़ की एक अनजान आलिंग कांगरी पर्वतमाला को प्रथम बार देखा- खोजा। इसी को ‘नैन सिंह रैंज’ का नाम दिया गया। स्वेन हेडिन ने नैन सिंह द्वारा खोजी गयी इस पर्वतमाला एवं टेंग्री नूर (नाम्दो छिद्मो) झील की खोज को उसकी सर्वोत्तम उपलब्धि माना है। न सिर्फ तिब्बती धरती बल्कि ठोकज्यालुंग की स्वर्ण खदानों एवं यारकन्द- खेतान के समाजों पर कलम चलाने वाला यह व्यक्ति हिन्दी का प्रारम्भिक विज्ञान तथा यात्रा लेखक भी बना।

नैनसिंह का एक और महत्वपूर्ण उपकरण था धर्मचक्र। उसका उपयोग उसने धर्म के बजाय वैज्ञानिक उपकरण छिपाने के लिए किया। ताकि किसी को भी संदेह न हो सके। उसकी जपमाला भी वैज्ञानिक संगणक थी जिससे वह सही दूरी की गणना करता था। उसकी जपमाला में 108 नहीं केवल 100 मनके थे। उनमें से पं. नैनसिंह हर 100 कदम पर एक छोटा मनका और 1,000 कदम होने पर बड़ा मनका गिराते। इस तरह दूरी की बिल्कुल सही नाप लेते।

पंडित नैनसिंह ने वैज्ञानिक पर्यिुद्धता के साथ अपने प्रेक्षणों का रिकार्ड रखा। पंडित नैनसिंह की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी भी प्रेक्षण यानी देखी हुई वस्तु या दृश्य को याद रखते और उसे रोजनामचे में नोट कर लेते, जैसे तापमान, क्वथनांक, अक्षांश, देशांतर या समुद्रतल से ऊंचाई, आदि। उस जमाने में पुरानी विधियों और पुराने उपकरणों यह सब करना अत्यंत धैर्य और परिश्रम का काम था। लेकिन, पंडित नैनसिंह ने यह सब किया। अन्वेषण और वैज्ञानिक विवरण लिखने के इतिहास में यह एक नया प्रयोग था। उन्होंने सड़कों की दूरियां, दिशाओं, पहाड़ों की ऊंचाईयों आदि के आंकड़े नोट किए। यात्रा विवरण के लिए डायरियां यानि रोजनामचा लिखा जिसमें अपनी पैनी और खोजी नजर से देखी गई हर जरूरी चीज का वर्णन किया। पहाड़ों, सड़कों, नदियों, झील-तालाबों, दर्रों, बसासतों, जानवरों, पेड़-पौधों और खेती आदि के बारे में लिखा। उदाहरण के लिए ‘ठोक ज्यालुंग डायरी 1867’ में वे लिखते हैं, “यह थोलिंग गोनपा 31 अंश 30 कला उत्तर अक्षांश पर बसा है और समुद्र पृष्ठ से 10,800 फीट ऊंची है और साल भर में एक ही फसल उपजती है उवा अनाज अप्रैल में बोआ जाता सिपटम्बर में काट लेते और त्रकारी मूली के सिवाय कुछ नहीं होती ओर जंगल पहाड़ दर्खतों से खाली है परंतु गांव के पास कहीं-कहीं स्यान याने मगालपटा के पेड़ होते हैं लिये जावा भी कहते हैं ओर नदी कनारों में कहीं-कहीं ओंम्फू और एक प्रकार के कांटेदार पेड़ होते हैं जिसे सीया और दामकार्पो कहते हैं।”

पंडित नैनसिंह ने सोना, सोहागा और नमक की खानों को भी गौर से देखा। तिब्बती सोने ओर सोने की  खानों के बारे में तब तक कुछ भी मालूम नहीं था। वे सोने की खान का वर्णन इस तरह करते हैं, “सोना भारीपन के कारण पानी में नहीं वहता पतनाला के वीच जो गोल 2 पत्थर जताए हुए होते हैं उनके आसपास के गढ़ों में रह जाते हैं इसी तरह पतनाले में खानि की सोने की मिट्टी सारा दिन भर वहाते हैं तव सवेरे के वक्त उस पतनाले में जाकर देखते हैं कि उस पतनाले के वीच पत्थरों के गढ़ों में जो सोने के वड़े 2 ढेले वा कनें देखते चिमटा से उठा लेते हैं और जो सोने के वारीक कनें मिट्टी के साथ मिली रहती है उसे वरतन में रखकर छान लेते हैं।”

पंडित नैनसिंह जहां दिन में संभव न होता वहां रात में अक्षांश यानि लेटिट्यूड लेते। पानी के क्वथनांक यानि ब्यायलिंग प्वाइंट से उस जगह की ऊंचाई मालूम करते। प्रेक्षण और रिकार्ड रखने का काम वे कितनी जिम्मेदारी से करते थे, वह इस उदाहरण से स्पष्ट है, “आखीर नवेंवर सन 73 से 27 फेव्रवरी सन 74 तक हर रोज 9 बजे फजर से 9 बजे शाम तक हर तीसरे घंटे वारोमेटर ड्राइवेट वलव अन्यूरायल का आवजरवेशन लिया मीनीमम और मैक्सीमम को सवेरे के 9 बजे देखा किया ता. 28 फेव्रवरी से 25 तारीख मार्च तक 6 बजे फजर से 9 बजे शाम तक उपर कहे हुए वारोमेटर वगैरह का आवजरवेशन लिया और दिसम्वर जनवरी फर्वरी मार्च महीने हर 4 माह के 20 तारीख के 12 वजे से लेकर ता. 22 के 9 वजे शाम तक वारोमेटर वगैरह का घंटा 2 आवजरवेशन रात दिन वरावर लिया गया।”

लेखक द्वय ने ठीक ही कहा है कि नैनसिंह को शिक्षक-प्रशिक्षक, सर्वेक्षक तथा अंवेषक के साथ एक प्रारंभिक विज्ञान लेखक के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उनकी अन्वेषक शैली तो अनोखी थी ही, विज्ञान लेखन की शैली भी सुबोध थी। पं. नैनसिंह की डायरी और ‘अक्षांश दर्पण’ पुस्तिका उनके विज्ञान लेखन का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करती है। यारकंद-खोतान के रोजनामचे में उन्होंने “रेशम की पैदायश” का पूरा वर्णन किया है। वे लिखते हैं, “रेशम का बीज पोश्त के दाने के समान बारीक और सफेद होता है वे वीज विख(र)ते ही शहतूत के पत्तों पर चिपक जाते और आहिश्ता 2 वे जीव कीड़े वनकरषहतूत के पत्तों को खा जाते फिर षहतूत के नये ताजे पत्ते वरावर डालते जाते वे कीड़े खाते जाते रोज प्रति वे कीड़े वढ़कर वढ़े 2 होते जाते हैं।”

“अक्षांशदर्पण” पंडित नैनसिंह की एकमात्र प्रकाशित पुस्तिका है। यह पुस्तिका सन् 1871 में पहली बार प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तिका आज से 136 वर्ष पूर्व हिंदी में विज्ञान लेखन का अनूठा और अमूल्य उदाहरण है। इसमें उन्होंने बहुत सरल तरीके से यह समझाया है, “नगर वालों से गांव वालों तक हर मनुष्य को तिथिवार और तारीख अंग्रेजी जानने की हर समय बहुधा जरूरत पड़ती है।….पर बगैर तिथि पत्र देखे हर मनुष्य नहीं जान सकता कि आज चांद की कौनसी तारीख और हफ्ते का कौनसा वार और कौनसी तारीख अंग्रेजी है…. ” फिर उन्होंने यह सब जानने की रीति बताई है। जैसे माह 17 अप्रैल की तिथि लें। नैनसिंह के गणित से 2007 में 15 का भाग देकर शेष में 11 का गुणा किया। उसमें 17 तारीख और अप्रैल के लिए निर्धारित 1 जोड़ा तो 183 की संख्या आई। इसमें 3 का पूरा भाग लग जाता है। इसलिए यह अमावस्या थी।

नैनसिंह ने इस पुस्तिका में चांद की तारीख, अंग्रेजी तारीख, सप्ताह के दिन-वार जानने की विधियां समझाई हैं। सैक्सटेंट से दूरी और ऊंचाई मापने का तरीका बताया है। तारों के झुकाव से अक्षांश पता करना सिखाया है। थर्मामीटर से पहाड़ों की ऊंचाई मापने की विधि उदाहरणों के साथ समझाई हैं। इसके अलावा कोहरा, पाला, आले, बर्फ, वर्षा, बादलों, सूर्य के प्रकाश और विद्युत के बारे में भी जानकारी दी गई है।

इन विवरणों को पढ़ कर दावे के साथ पंडित नैनसिंह को हिंदी का प्रारंभिक विज्ञान लेखक घोषित किया जा सकता है। वास्तव में, लेखक द्वय उमा और शेखर ने एक अज्ञात अन्वेषक की ही नहीं बल्कि हिंदी के एक प्रारंभिक विज्ञान लेखक की भी खोज की है। वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न उस अज्ञात असाधारण और अन्वेषक विज्ञान लेखक को प्रकाश में लाकर लेखक द्वय ने एक ऐतिहासिक कार्य किया है।

 

 

 

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