मैं कौन

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ऐसा एक बार होता तो चलो मैं मान भी लेता। लेकिन, बीते वर्षों में ऐसा कई बार हो चुका है, जब किसी ने मुझे कोई और समझा या वह नहीं समझा जो मैं हूं! ऐसी हर घटना के बाद जाहिर है, मैं सोचने के लिए विवश हुआ हूं कि हें, आखिर मैं हूं कौन?

हाल ही मैं फिर यह घटना घटी है। फेसबुक मित्र शशि कांडपाल ने अगल-बगल दो फोटो लगा कर हैरानी जाहिर की कि ‘अद्भुत साम्य’। कई मित्रों ने इसकी ताकीद भी कर दी। फोटो का दूसरा सैट देख कर तो उन्होंने हतप्रभ होकर कह दिया- हे भगवान, टी-शर्ट का कलर भी एक जैसा!

हमशक्ल की यह कहानी शुरू हुई थी, तिरेपन-चौवन वर्ष पहले सन् 1965-66 में, जब मैं वन सेवा की परीक्षा देने इलाहाबाद गया था और अब लौट रहा था। ट्रेन आने में समय था, इसलिए मैं काफी पीने रेलवे कैंटीन में चला गया। बैठा ही था कि बाहर से मेरा ही एक हमउम्र तेजी से आया और बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिला कर बोला, “देखा, कैसा गजब संयोग है? पिछली बार भी तुम और मैं यहीं मिले थे, याद है? इसी टेबल पर!”

मैं मुस्कराते हुए लेकिन हैरान होकर उसे देख रहा था। फिर भी मैंने पूछा, “चाय लोगे?”

“चाय? तुम तो काफी पीते हो। पिछली बार भी काफी पी थी तुमने, मुझे अच्छी तरह याद है,” यह कह कर वह उठा और दो काफी ले आया। फिर बोला, “चलो यार, अच्छी मुलाकात हो गई।”

“जा कहां रहे हो?” उसने काफी पीते हुए पूछा।

मुझे एक दिन लखनऊ रूककर नैनीताल लौटना था। इसलिए कहा, “लखनऊ।”

“पिछली बार भी लखनऊ ही जा रहे थे। वहीं रहते हो?”

कहानी को जल्दी खत्म करने की गरज से मैंने कहा, “हां,”

कुछ और बातें भी हुईं। इलाहाबाद आने का मकसद बताया। उसे भी किसी दूसरी ट्रेन से जाना था। मेरी ट्रेन सामने प्लेटफार्म पर आई तो वह मेरे साथ चला। डिब्बे के दरवाजे पर उसने हाथ मिला कर मुझे विदा किया और बोला, “दोस्त, फिर मिलेंगे, इसी तरह यहां कभी।”

मैंने कहा, “जरूर” और ट्रेन में सोचता रहा- आखिर वह कौन था? याद आने पर अब भी उसके बारे में सोचता हूं।

बाद में जब भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानी पूसा इंस्टिट्यूट में नौकरी लग गई तो दिल्ली आ गया। यहां जब भी समय मिलता कनाट प्लेस के टी-हाउस या काफी हाउस चला जाता। उन दिनों वे लेखक बिरादरी के अड्डे थे और लगभग सभी लेखक वहां पहुंचते थे, चर्चा-बहसों में भाग लेते थे। उनमें नवोदित लेखक भी होते और नामचीन साहित्यकार भी। टी-हाउस रीगल सिनेमा के पास नुक्कड़ पर था। हम लोग उसके सामने रेलिंग्स पर भी देर तक बैठ कर चारों ओर का नजारा देखते रहते। सामने हर समय खूब भीड़ होती थी। एक दिन उसी भीड़ में जा रहा था कि किसी ने पीठ पर धौल मार कर कहा, “हाई डेविड!”

डेविड? मैंने चैंक कर उसे देखा। एक स्मार्ट युवक था। उसने हाथ मिलाया और पूछा, “पहचान रहे हो?” मैं उसे अपरिचय से देख रहा था।

“मी वेंकट! मैन, भूल गए क्या? ग्राउंड इंजीनियर एट पठानकोट एयरपोर्ट।”

मैंने भी गर्मजोशी से हाथ मिलाया। मैं उसका भ्रम नहीं तोड़ना चाहता था। मैंने कहा, “चलो चाय पीते हैं और उसे टी-हाउस के भीतर ले गया। वह जल्दी में था और घर जा रहा था, दक्षिण भारत। चाय पीते-पीते उसने दो-एक और दोस्तों के बारे में पूछा कि वे इन दिनों कहां हैं? मैंने कहा, “इधर उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ। पता नहीं कहां हैं।”

“ओ.के. आई एम इन हरी डेविड। नाइस मीटिंग, सी यू नैक्स्ट टाइम” कह कर भीड़ में वह यह जा, वह जा। मैं फिर सोच में पड़ गया कि आखिर यह वेंकट कौन? और, मैं डेविड? कौन डेविड? इतना मिलता-जुलता भी भला कोई हो सकता है?

रीगल और टी-हाउस की उसी भीड़ में एक बार मेरे किसी परिचित साथी ने बताया, “अरे सुनो, बच के रहना जरा।”

मैंने पूछा, “क्यों क्या हुआ?”

“मैंने शायद ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ या ‘ब्लिट्ज़’ में एक फोटो देखा, हू-ब-हू तुम्हारी शक्ल थी। दाढ़ी भी ऐसी ही। श्रीलंका से भागा है मर्डर करके। पुलिस ढूंढ रही है उसे।”

हद हो गई। मेरा लेना, न देना लेकिन फोटो में हू-ब-हू मेरी शक्ल का आदमी। कहीं उनकी पुलिस ने मुझे देख ही लिया तो पूछताछ तो वे करेंगे ही। मेरे शरीर में एक ठंडी सिरहन-सी दौड़ गई। खुदा का लाख शुक्र कि पूछताछ के लिए मेरे पास कोई नहीं पहुंचा। यों भी, दिन भर तो मक्का के खेतों में शोध कार्य करता रहता था। देर शाम को लौटता। बस, छुट्टी के दिन ही कनाट प्लेस की ओर निकलता था।

उन्हीं दिनों पत्रकार कैलाश साह के यहां गया। वे राजेन्द्र नगर में रहते थे और नैनीताल के ‘पर्वतीय’ के बाद ‘नेशनल हेरल्ड’ के कानपुर संवाददाता का अनुभव लेकर अब दिल्ली की ‘समाचार भारती’ न्यूज एजेंसी में काम कर रहे थे। राजेन्द्र नगर में पहली बार उनके घर गया तो भाभी जी यानी श्रीमती साह ने देखते ही कहा, “ओ ईजा देखो तो, देवेन बिल्कुल पंकज जैसे लग रहे हैं!” साह जी ने कहा, “हां, बात तो सही है। किसी दिन इन दोनों को एक साथ देखेंगे।”

मुझसे बोले, “पंकज यहां आता रहता है। तुम्हीं जैसा दिखाई देता है। किसी दिन वह आया हो और तुम भी आ जाओ, तब एक-दूसरे को देखना।”     

मैं कई बार बल्कि अक्सर उनके घर जाता था लेकिन पंकज से वहां भेंट नहीं हुई। हां, एक दिन साह जी ने अपने किसी दोस्त के बारे में जरूर बताया कि वह पंकज से नाराज था। कह रहा था, आज बस में पंकज ने उसे देखा लेकिन बात तक नहीं की। मुंह फेर कर बैठा रहा। तब मैंने भी कुछ नहीं कहा।

“मैं समझ गया”, साह जी ने कहा, “आपने जिसे देखा, वह पंकज नहीं, देवेन होगा और देवेन आपको पहचानता नहीं।” सुन कर वे असमंजस में पड़ गए। मुझे पंकज और पंकज को मुझे समझ लेने की गलतफहमी के दो-एक किस्से और भी सुने गए। बहरहाल, जब पंकज से भेंट हुई तो उसे देखना खुद को देखने जैसा ही अनुभव हुआ था। तब मैं भी लंबा, पतला था और दाढ़ी रखता था। मेरा हमशक्ल भाई कहलाने वाला वह पंकज था- पंकज बिष्ट, आज के जाने-माने कथाकार-उपन्यासकार।

बाद में जब मैं पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में चला गया तो वहां एक बार पंकज आए और घर पर रूके। मैं आफिस जाते समय पत्नी लक्ष्मी को बता गया था कि आज पंकज को आना है। वे मेरे हमशक्ल भाई कहलाते हैं। तुम देखते ही पहचान जावोगी। वे आए और पत्नी ने उन्हें पहचान लिया। इसके बाद भी यदा-कदा दोस्त कहा करते कि अमुक जगह तुम्हीं जैसा कोई देखा। सत्तर के दशक में तो जब मैं युवा था, कुछ लोगों ने राजेश खन्ना का हमशक्ल भी बता डाला जिससे मुझे कोई विशेष खुशी नहीं हुई क्योंकि मुझे भीष्म साहनी जी की वह बात याद थी कि “तुम्हें अपने जीवन में देवेन मेवाड़ी बनना है, कोई और नहीं।” असल में मैंने ‘नई कहानियां’ में प्रकाशित हो रही अपनी कहानी ‘सांड़’ में पत्र लिख कर अपना नाम अमोघवर्ष करवा लिया था। इसका पता उन्हें छपने के बाद लगा। यह अजब प्रयोग मैं पहले भी कर चुका था। कभी देवेन मेवाड़ी बना, कभी देवेन एकाकी, तो कभी देवेंद्र मेवाड़ी। जब देवेन मेवाड़ी बना तो नैनीताल में मेरा दोस्त वीरेद्र डंगवाल भी वीरेन डंगवाल हो गया। वही, जो आगे चल कर साहित्य अकादमी के सम्मान से नवाजा गया।

उम्र बढ़ने के साथ लगा कि अब शायद हमशक्ल की समस्या सामने नहीं आएगी। लेकिन नहीं, मैं गलत सोच रहा था। दिल्ली के सफरदरजंग इलाके से हम नोएडा के हिमगिरि अपार्टमेंट्स में रहने चले गए थे। वहां से चार्टेड बस से आफिस आता-जाता था। एक दिन सुबह अपनी चार्टेड बस का इंतजार कर रहा था कि कुछ दूर खड़े एक सज्जन तेजी से आए और हाथ बढ़ा कर बोले, “नमस्कार! आप कब आए इलाहाबाद से?”

मैं कुछ कहता, उससे पहले ही वे बोल पड़े, “आपका ठीक है, अपना होटल है। कोई फिक्र नहीं। हमें तो रोज यही आफिस की दौड़ लगानी पड़ती है।”

मैंने कहा, “आप….”

वे झट से बोले, “यहीं, उदयगिरि सोसायटी में रहता हूं। लीजिए, मेरी बस आ गई। फिर मिलते हैं। दो-तीन दिन तो होंगे ही यहां?”

मैंने उन्हें हाथ हिलाया और सोचता रह गया कि वे सज्जन आखिर कौन हैं? आफिस जाने की हड़बड़ी में ही वे दो-एक बार और मिले। फिर मैं उन्हें दूर से ही देख कर किनारा करने लगा क्योंकि नज़र पड़ जाने पर वे तेजी से मिलने आ ही जाते थे, भले ही बात केवल खैरियत पूछने तक ही सीमित रहती थी। उन्हीं दिनों साइनस बिगड़ने के कारण अपोलो अस्पताल में माइक्रो सर्जरी करानी पड़ी। बीच-बीच में डाक्टर के पास चैकिंग के लिए जाना पड़ता था।

एक दिन डाक्टर से मिल कर मैं और मेरी पत्नी लक्ष्मी बाहर सड़क पर आए और आटो का इंतजार करने लगे। तभी मैंने कुछ दूर खड़े उन्हीं सज्जन को देखा। वे बस का इंतजार कर रहे थे। मैंने श्रीमती जी से कहा, “चलिए, थोड़ा पीछे चलते हैं। नोएडा में जो अपरिचित सज्जन मिलते हैं, वे सामने खड़े हैं। अभी क्या बात करेंगे हम।”

हम पीछे को मुड़े। थोड़ा ही चले थे कि पीछे से आवाज आई, “सुनिए! रूकिए। आप कब आए?”

रूकना पड़ा। नमस्कार किया। वे बोले, “तो, इस बार आप दोनों जने आए हैं।” मैंने हें-हें करते हुए कहा, “जी हां। आप कैसे हैं?”

“ठीक हूं। बस वही नौकरी की दौड़-भाग है, और क्या। आप लोग ठीक हैं बिजनेस में।”

हम हें-हें करते रहे। वे विनम्रता से नमस्कार करके चले गए। मैंने इस बार भी उनका भ्रम नहीं तोड़ा। वे भ्रम में ही सही, किसी अपने से बात कर लेते थे।

इसके बाद पहचान की एक और समस्या सामने आने लगी जिसका पता पहली बार शोर टैम्पल, महाबलीपुरम में लगा। हम पांडव-रथ मंदिर, बास रिलीफ और महिषासुर मर्दिनी दुर्गा का शिल्प सौंदर्य देखने के बाद समुद्र तट पर शोर टैम्पल देखने गए। परिवार के छह सदस्यों के लिए 10 रूपए प्रति टिकट की दर से 60 रूपए खिड़की पर टिकट के लिए दिए।

बाहर खड़े लुंगीधारी सज्जन ने पैनी नज़र से मुझे देख कर कहा, “ह्वट इज दिस?”

मैंने कहा, “टिकिट चार्जेज।”

“यू हैव टु पे फिफ्टीन हंड्रेड रुपीज़, टू हंड्रेड फिफ्टी पर हेड।”

मैंने कहा, “क्यों, रेट तो 10 रू. प्रति टिकट है?”

“दैट इज फार इंडियंस”

“आइ एम इंडियन”

“नो, यू आर नाट इंडियन। यू आर फारेनर।”

मैंने अपने बैंक का आई कार्ड दिखाया। लेकिन, वह नहीं माना। कहने लगा, यह तो किसी के भी पास हो सकता है। मैं परेशान हो गया। सोचा, यह फारेनर वाली नई मुसीबत कहां से आ खड़ी हो गई? तभी कुछ दूर खड़े बंदूकधारी गार्ड पर नज़र पड़ी। मैंने उससे कहा, “प्लीज, हेल्प मी। इसे समझाओ। यह मुझे और मेरे परिवार को विदेशी बता रहा है।”

वह देखने में डैनी डेंगजोंम्पा जैसा लग रहा था। मेरी बात सुन कर बोला, “मैं सिक्किम से हूं, दो साल से यहां हूं। अभी भी ये मुझे इंडियन नहीं मानते।”

अब मुझे गुस्सा आ गया। मैंने उनसे शिकायत रजिस्टर मांगा और कहा कि तमिलनाडु पर्यटन के डायरेक्टर से भी शिकायत करूंगा। तब भीतर बैठे दूसरे आदमी ने उससे तमिल में कुछ कहा और उसने मन मार कर हमें 10 रू. के टिकट पर भीतर जाने दिया। इंतिहा तो तब हो गई, जब वापसी यात्रा में इंडियन एयर लाइंस की एक परिचारिका ने पूछ लिया, “हाउ डू यू लाइक अवर कंट्री सर?”

ऐसा ही कुछ सन् 2015 में कौसानी से लौटते समय काठगोदाम में हुआ। जून की तपती गर्मी थी। टैक्सी से उतर कर आइ आर सी टी सी के रेस्त्रां में गया। पीठ पर से रकसैक उतारा और बैरे से पानी मंगाया। वह मुस्कराता खड़ा रहा। मैंने कहा, “एक दोसा और एक काफी।”

वह गया और दोनों चीज ले आया। मुस्कराते हुए ही उसने पूछा, “सर, आप कौसानी से आ रहे हैं?”

मैंने कहा, “हां, लेकिन तुम्हें कैसे पता?”

वह बोला, “मैं वहां रहा हूं। आपकी तरह के लोग वहां रहते हैं।”

“मेरी तरह के? क्या मतलब?”

“मतलब विदेशी। मैं बताऊं सर, आप कहां से हैं?”

“कहां से?”

“फ्रांस या इंग्लैंड से।”

मैंने कहा, “मैं यहीं का हूं। यहां से करीब सौ किलोमीटर दूर मेरा गांव है, कालाआगर।” फिर उसे विश्वास दिलाने के लिए कुमाउनी में बोला, “मैं वांई पैद भछौं और मैंलि नैनताल में पढ़ौ।”

लेकिन, वह नहीं माना। पैसे चुका कर मैं रेलवे स्टेशन चला गया।

कुछ ऐसा ही किस्सा अपने गांव जाते समय धानाचूली बैंड पर हो गया। मैं, श्रीमती जी, भतीजा मोहन और उसका बेटा ऋत्विक मोहन की गाड़ी में गए थे। वहां गाड़ी रोक कर कुछ खाने के लिए रुके। मैं कैमरा लेकर, थोड़ा ऊपर जाकर हिमालय की तस्वीरें खींचने लगा। लौटा तो भतीजा, ऋत्विक और मेरी श्रीमती जी बिष्ट रेस्टोरेंट में दाल-चावल खा रहे थे। मैं पहुंचा तो मैंने दूकानदार से कहा, “मुझे क्या खिलाएंगे आप?”

“आइए सर। आपको आमलेट, ब्रेड या राइस खिला देंगे।”

“नहीं, मैं राइस वगैरह नहीं खाता। एक चाय पिला दीजिए, उसके बाद एक कटोरी दाल दे दीजिए।”

यह कह कर मैं पत्नी से कुमाउनी में बातें करने लगा। दूकानदार ध्यान से सुन रहा था। हंसते हुए बोला, “आपने दीदी के साथ पहाड़ी भाषा भी अच्छी सीख ली है।”

मैंने चैंक कर कहा, “क्या मतलब? मैं तो यहीं का हूं। यहां ओखलकांडा इंटरकालेज में पढ़ा मैंने। मेरी ससुराल यहीं नाई गांव में है।”

“वह तो ठीक है शाब, लेकिन हमारी दीदी से शादी करके आप यहीं के जो क्या हो गए? मैं बता देता हूं, आप जर्मन हैं।”

मोहन, ऋत्विक और पत्नी लक्ष्मी का हंसते-हंसते बुरा हाल। पोता ऋत्विक हंसते हुए बोला, “दादा जी, हमें अब तक पता ही नहीं था, आप जर्मन हैं!” पत्नी ने दूकानदार को समझाने की कोशिश की, “नैं, नैं, इन यां कै छैं!” यहीं के हैं ये।

दूकानदार बिष्ट जी ने मुझे दाल की कटोरी पकड़ाते हुए कहा, “नहीं दीदी, तुम्हारे कहने से जो क्या होता है। आपने इनसे शादी कर रखी है, आप तो इन्हें यहीं का बताएंगी ही।”

हम लोग इस नए रहस्य पर हंसते हुए वहां से चले आए।

इन तमाम घटनाओं से मैं खुद भी हैरान था कि आखिर मैं हूं कौन? कि, तभी एक अंतर्राष्ट्रीय जीनोग्राफिक परियोजना का पता लगा जिसमें वे डीएनए परीक्षण से पता लगा रहे थे कि किसके पुरखे कहां से कहां पहुंचे और उनके वंशज आज कहां-कहां हैं। मैंने भी उनसे डीएनए परीक्षण किट मंगा कर अमेरिका की एरिजोना लैब में अपने डीएनए की जांच करवाई। जांच से पता चला कि दस हजार वर्ष पहले मेरा पूर्वज मध्य-पूर्व से उत्तर की ओर गया था और आज उसके वंशज स्कैंडेनेवियाई देशों में फैले हुए हैं, नार्वे, उत्तरी साइबेरिया, स्वीडन, फिनलैंड आदि में। रेंडियरों के झुंडों के साथ रहने वाले सामी आदिवासियों में भी ऐसे मार्कर जीन पाए गए हैं। यानी, मुझमें वे जीन मौजूद हैं जो उन तमाम वंशजों में हैं।

तो साथियों, लब्बो-लुबाब यह कि मैं अफ्रीका से चले उस आदि-पिता की ही संतान हूं जो आज पूरी दुनिया में मौजूद सभी मनुष्यों का आदि-पिता था। यानी, हम सभी मनुष्य रिश्तेदार हैं, केवल मनुष्य हैं और कुछ नहीं। पूरी दुनिया वास्तव में हमारा कुटुंब है। वसुधैव कुटंबकम।

 

 

 

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