गंगा-यमुना घाटी में

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कोई पहाड़ जाए तो पावस ऋतु में जाए। इस बात का अहसास मुझे इस बार बड़ी शिद्दत से हुआ। कुदरत पहाड़ों का सच्चा श्रंगार तो सचमुच पावस ऋतु में ही करती है। हरियाली का आंचल ओढ़े पहाड़ और आर-पार किनारों तक डबाडब भरी नदियां। झर-झर बहते झरने और पहाड़ों से उतर कर नदियों में मिलते कल-कल करते, खिलखिलाते गाड़-गधेरे। हरियाली और हर ओर मौजूद पानी का उत्सव मनाते, कलरव करते रंग-बिरंगे पंछी। घाटियों से उठता कोहरा और पहाड़ों की चोटियों से ऊपर तैरते बादल।

अज़ीम प्रेम जी फाउंडेशन का आभार कि उन्होंने मुझे इस मौसम में गंगा और यमुना घाटी के शिक्षकों और विद्यार्थियों से बातें करने का न्योता दिया।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से 18 अगस्त की अलसुबह दून शताब्दी में देहरादून के लिए रवाना हुआ तो बारिश का कहीं कोई आसार नहीं था। ट्रेन की खिड़की से आसमान में यहां-वहां, कहीं कोई बादल टहलता हुआ दिख जाता। मन ने कहा मौसम साफ रहेगा। बरसात के मौसम में पहाड़ों में बस वर्षा का ही डर रहता है। ट्रेन चली तो समय पर ही थी लेकिन देहरादून पहुंचते-पहुंचते विलंबित हो गई। मेरी फिक्र यह थी कि मुझे समय पर देहरादून से उत्तरकाशी पहुंचना था। कैसे? प्रमोद पैन्यूली जी के संदेश के अनुसार देहरादून रेलवे स्टेशन पर मेरी भेंट कार चालक विपिन से होगी। वह मुझे सीधे उत्तरकाशी ले आएगा। संदेश के साथ चालक का फोन नंबर, ताजा फोटो और गाड़ी का नंबर भी भेजा था। मैंने उन्हें जवाब दिया, “ठीक है। पहुंचता हूं। और, यह विपिन तो शक्ल-सूरत में मेरा ही छोटा भाई लग रहा है। पहचान लूंगा उसे।” उन्होंने उत्तर में हंसता हुआ इमोजी भेज दिया।

DSCN5699स्टेशन से बाहर आकर फोन किया और बताया कि स्टेशन के सामने खड़ा हूं, सिर पर पी-कैप है और पीठ पर रकसैक। मेरे सामने ही एक युवक हाथ में पानी की बोतल लेकर मोबाइल पर बात करता किसी को खोज रहा था। मैंने कंधे पर हाथ रख कर पूछा, “मुझे तो नहीं खोज रहे हो?”

वह मेरा हुलिया पहचान गया। मुस्कराया और सामान मांगा। मैंने कहा, “नहीं, यह मेरा बोझा है। इसे मैं ही ढोता हूं।” कुछ दूर बोलेरो खड़ी थी। उसमें सामान रखा, बैठा और उत्तरकाशी की ओर चल पड़े। देहरादून पार कर मसूरी के नीचे हरे-भरे पेड़ों, जंगल और पहाड़ों को पार कर आगे बढ़ते रहे। विपिन मितभाषी था या अजीम प्रेम जी फाउंडेशन का मेहमान मान कर कम बोल रहा था।

मुझे पहाड़ों, सड़कों, पेड़ों, पक्षियों के बारे में पूछने की आदत है। इसलिए उसे बातों में लगा कर खोला और रास्ते में दिखी चंद चिड़ियों और पेड़ों के बारे में पूछा। मैं कहता, “इस चिड़िया को हमारे यहां मुश्याचड़ी कहते हैं। यहां क्या कहते हैं?” उसने दो-एक बार तो उत्तर दिया, फिर कहा, “मैं उत्तरकाशी में ही रहता हूं। वहां की चिड़ियों और पेड़ों को तो जानता हूं, लेकिन यहां दूसरी तरह के पेड़ हैं।” उसकी इस बात ने मुझे काफी देर तक चुप कर दिया। बीच-बीच में बस मौसम, बारिश और बादलों की बात करता रहा। चलते-चलते सुवाखोली आ गया। बीच में विपिन ने अपने मोबाइल पर किसी से बात की थी। उस बातचीत में मैंने सुवाखोली नाम सुना था। वहां पहुंचे तो उसने कहा, “सुवाखोली आ गया है। यहां से अब मेरा बड़ा भाई आपके साथ जाएगा।”

मैंने पूछा, “क्यों तुम नहीं चल रहे हो?”

वह बोला, “नहीं। इस गाड़ी को अब वे चलाएंगे और जो गाड़ी वे लाए हैं, उसे मैं देहरादून ले जावूंगा।”

मैंने कहा, “ तुमने चाय भी नहीं पी, चाय पी लो। उसने कहा, “ नहीं, मैं यहां खाना खावूंगा।”

“ठीक है, मेरे लिए चाय बनवा दो,” कह कर मैं कैमरा लेकर सामने सड़क पर निकल गया और चारों ओर के पहाड़ों को देखने लगा। तभी पास से तीन स्कूली बच्चे निकले। मैंने उनसे बातें कीं। उनके सपनों के बारे में पूछा और कहा तुम जीवन में बहुत आगे जा सकते हो। तुम्हें सदा याद रखना है कि तुम्हें जीवन में कुछ बनना है। वे खिलखिलाते हुए चले गए।”

लौटा तो विपिन ने अपने भाई केदार से परिचय कराया। चाय पीकर मैंने केदार के साथ आगे की राह पकड़ी। हरे पहाड़ और हरियाली धरती मन को सुकून दे रही थी। केदार बातचीत में पूरा साथ दे रहा था। रौतू की बेली, अलमस और भवान गांव के खेतों में खरीफ की फसलें खड़ी थीं। अलमस गांव के सीढ़ीदार खेतों में लगता था हरी-पीली जमीन पर किसी ने करीने से गहरे भूरे-लाल रंग की कूंची फेर दी है। मैंने केदार से रूकने को कहा और खेतों को भरपूर नजर देखा। उनमें झंगोरा की फसल पक रही थी। उन्हीं की हरी-पीली पत्तियों और भूरी-लाल बालियां रंगे कैनवस का आभास करा रही थीं।

भवान गांव से निकल ही रहे थे कि ऊपर कहीं कोई तीतर बोला-तीन तोला तितरी! सड़क के किनारे गाएं और चितकबरी बकरियां सड़क किनारे-किनारे घर की ओर लौट रही थी। चलते जा रहे थे कि सामने, बाईं ओर विशाल, ऊंचे हरे पहाड़ों ने मन मोह लिया। लगता था जैसे उन्हें पन्ना के विशाल पत्थर तराश कर वहां सजा दिया गया हो। उन पर कोई पेड़ नहीं था। सिर्फ चट्टानों और मिट्टी-पत्थरों से बने, हरी घास से ढके पहाड़। मैं तो गाड़ी से बाहर आकर सम्मोहित-सा देखता, खड़ा ही रह गया। चारों ओर प्रकृति का अतुलनीय सौंदर्य बिखरा हुआ था।

सूरज पश्चिम दिशा में उतर रहा था। उन पहाड़ों पर तिरछी धूप पड़ रही थी। केदार से मैंने कहा, “यहीं बैठे रहने का मन कर रहा है केदार।”

केदार बोला, “मैं तो सर इसीलिए सदा पहाड़ में ही रहना चाहता हूं। कई लोग कहते भी हैं कि शहर चलो, वहां खूब पैसे कमा सकते हो, वहां ये है, वो है, लेकिन मन बस यहीं लगता है अपने उत्तरकाशी के गांव में। वहीं अपने घर का काम भी कर लेता हूं और गाड़ी भी चला लेता हूं। हमारा गुजारा हो जाता है। और क्या चाहिए? सच कहता हूं, मुझे तो पहाड़ ही प्यारा है।”

मुझे लगा, मेरे कानों में इसी गढ़वाल क्षेत्र के पहाड़ों में जन्मे, प्रकृति के अनोखे चितेरे कवि चंद्रकुंवर बरत्वाल की कविता गूंज रही हो:

प्यारे समुद्र मैदान जिन्हें

नित रहें उन्हें वही प्यारे

मुझको तो हिम से भरे हुए

अपने पहाड़ ही प्यारे हैं।

मैंने उससे कहा, “तुम्हारा विचार बहुत अच्छा है केदार। पहाड़ को आज ऐसे ही युवकों की जरूरत है।” केदार ने उन पलों की याद में मेरे कुछ फोटो खींचे ताकि शहर जाने पर भी उन पहाड़ों को याद करता रहूं।

हम साबली गांव पार करके मोर्याना टाप पहुंचे, जहां से हिमालय की चोटियां दिखने की संभावना थी लेकिन उन्हें बादलों ने घेरा हुआ था। सर-सर, सर-सर ठंडी हवा चल रही थी। सामने खड़ी पहाड़ी पर सीढ़ीदार खेतों में आलू और कहीं-कहीं मक्का की फसल दिखाई दे रही थी। स्टील के छोटे-से गिलास में गरमा-गरम चाय पी। भूख लग आई थी। दिल्ली से पत्नी लक्ष्मी का बनाया आलू पराठा रौल निकाल कर खाया जिसके भीतर लक्ष्मी का बनाया लहसुन की पत्तियों का अचार भरा हुआ था। केदार ने दूकान में ही खा लिया।

ठंड से मुझे कंपकपी छूट रही थी, इसलिए हम आगे बढ़ गए। यहां से अब उत्तरकाशी केवल 63 किलोमीटर दूर था। सूरज पहाड़ों के पार जा चुका था और हम मोर्याना टाप से नीचे गंगा घाटी की ओर उतर रहे थे। देवप्रयाग से अलकनंदा के साथ मिल कर गंगा कहलाने वाली भागीरथी नदी यहां ऊंचे पहाड़ों के बीच गंगाघाटी में बहती है। हम चिन्यालीसौड़ पहुंचे। शाम के धुंधलके में यहां हमारे दाहिनी ओर ठहरी हुई, शांत भागीरथी दिखाई दी। गोमुख से कल-कल करती, खिलखिला कर आती भागीरथी यहां ऊंचे पहाड़ों के पैताने टिहरी बांध के कारण विशाल झील के रूप में ठगी-सी खड़ी रह जाती है। डुंडा, मातली होते हुए वरूणावत पहाड़ के पैताने की सुरंग पार कर उत्तरकाशी नगर में पहुंचे। वहां गढ़वाल मंडल विकास निगम के पर्यटन आवास गृह में रहने की व्यवस्था की गई थी। दिल्ली से उत्तरकाशी की साढ़े चौदह घंटे लंबी यात्रा की थी, इसलिए रात को जल्दी ही सो गया।

सुबह चहक-चहक कर बुलबुलों ने उठाया। दरवाजा खोल कर देखा, बिल्कुल सामने मैग्नोलिया के हरे-भरे पेड़ पर बैठी बुलबुलों की जोड़ी अपनी धुन में प्रभाती गा रही थी। मुझे देख कर कुछ दूर तार पर जाकर बैठ गईं और वहां गाने लगीं। मैग्नोलिया पर आज एक सुंदर, सफेद फूल खिला था। दो कलियां लगता था, दो-एक दिन बाद खिलेंगी। मैग्नोलिया का पेड़ तो यों भी भव्य दिखाई देता है और फिर इसके शुभ्र फूल तो शुद्धता और पवित्रता के प्रतीक ही माने गए हैं। मैं उसके बारे में सोचने लगा….एक तरह से इसे फूलों का पुरखा भी माना जा सकता है क्योंकि कहते हैं यह मधुमक्खियों से भी पहले मैग्नोलिया इस दुनिया में आ गया था। वे फूल बाद में आए जिनमें मधुमक्खियों और कीट-पतंगे परागण करते हैं। इसीलिए मैग्नोलिया के सुंदर सफेद फूलों में तो आज भी बीटल ही पराग स्त्रीकेसर तक पहुंचाते हैं। और, यह अपनी खुशबू से उन्हें बुलाता है। मैंने मन ही मन इस लाखों वर्ष पुराने वृक्ष को प्रणाम किया। तय किया कि कल सुबह फिर इसके फूल को देखूंगा।

चहकती बुलबुलों के उस पार छलबल बहती भागीरथी दिखाई दे रही थी। वर्षा ऋतु में ऊपर पहाड़ों से अपनी छोटी-छोटी मगर कल-कल बहती सहायक नदियों का भी भरपूर पानी मिलने के कारण वह छलबल भरी हुई थी और बड़ी तेजी से बह रही थीं। छत पर जाकर देखने का मन था, लेकिन टीन-छाई छत होने के कारण यह संभव नहीं हुआ।

सुबह उठा। आज से हर रोज ‘शिक्षण में वैज्ञानिक चिंतन’ की मुहिम के तहत शिक्षकों और विद्यार्थियों से मिलने की शुरूआत हो रही थी। आज फिर मैग्नोलिया के फूल को देखा। आठ बजे चिन्यालीसौड़ के लिए निकल गए। चाय नाश्ता वहीं राह में किया और बडेथी गांव में प्राथमिक पाठशाला पहुंच कर बच्चों को विज्ञान की कहानियां और रोचक बातें सुनाईं। उनके सवालों के जवाब दिए।

chinyalisaurउसके बाद पहुंचे खंड विकास कार्यालय के सभागार में, जहां 110 शिक्षक और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथी हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके साथ बातचीत में मैंने अपने बचपन में प्रकृति की गोद में बिताए दिनों को याद करते हुए कहा कि प्रकृति मेरी पहली किताब थी और मां मेरी पहली शिक्षिका। उसी ने मुझे प्रकृति की किताब को पढ़ना सिखाया। वह मेरे तमाम प्रश्नों के उत्तर देती थी हालांकि खुद कभी स्कूल नहीं गई थी। उसके पास मेरे हर प्रश्न का उत्तर था- आकाश और तारों के बारे में, पेड़-पहाड़, नदी-नाले, पशु-पक्षियों और फूलों व तितलियों के बारे में। उसने मुझे बताया कि हम भी इन्हीं में से एक हैं। लंबे संबोधन के बाद शिक्षक साथियों के सवालों के जवाब दिए। विज्ञान, धर्म और आस्था का अंतर समझाया। वहां पास ही शांत मन से भागीरथी बह रही थी या शायद आगे टिहरी बांध के विपुल जल के कारण खिन्न मन से ठहरी हुई थी। सांझ ढले, हम उत्तरकाशी लौट आए।

अगली सुबह भी बुलबुलों ने ही जगाना था, जगाया, और मैंने आज फिर बरामदे में आकर देर तक मैग्नोलिया के एक नए अर्द्ध खिले शुभ्र फूल को देखा। कुछ देर तक उस पार बहती भागीरथी की जलराशि को भी भर नजर देखता रहा। आज उत्तरकाशी के नगरपालिका सभागार में 4 से 7 बजे सायं तक शिक्षकों के साथ विज्ञान की बातें करनी थीं। वहां पहुंचे तो देखा बातचीत में हिस्सा लेने सौ से अधिक शिक्षक मौजूद हैं। चालिस-पैंतालिस अन्य लोग भी थे। यहां विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बात शुरू की और मैंने अपनी जीवन यात्रा में विज्ञान के योगदान की चर्चा की। शिक्षकों के साथ अपने जीवन के अनुभवों को साझा किया। जीवन में विज्ञान और वैज्ञानिक सोच के महत्व पर प्रकाश डाला। उनके सवालों के जवाब दिए जिनमें विज्ञान के बरक्स धार्मिक आस्था और अंधविश्वासों पर जम कर चर्चा की।

DSCN5737अगली सुबह यानी सोमवार को आठ बजे मातली की ओर निकले। वहां अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के स्कूल में बच्चों से मिलना था। रास्ते में चाय-नाश्ता लिया। तब तक हल्की रिमझिम वर्षा शुरू हो गई। हम स्कूल पहुंचे और हमारे साथ ही झमाझम बारिश भी। कक्षा 6,7 और आठ के लगभग 60-65 बच्चे हमारा इंतजार कर रहे थे। उनसे अपने गांव में बिताए दिनों की चर्चा की, उन्हें अपनी जंगल की पाठशाला के बारे में बताया और यह भी बताया कि मैंने प्रकृति की किताब में क्या पढ़ा। वे सभी जिज्ञासु बच्चे थे। पूछने लगे, अंतरिक्ष कहां तक है? क्या सूर्य कभी बुझ जाएगा? तारे कितने हैं? हमारी पृथ्वी कैसे बनी? ये और ऐसे ही कई सवाल। उन्हें इनके जवाब दिए और पर्यावरण की कहानी सुनाई। फिर, मास्क पहन कर सीता, हनुमान, स्पाइडर मैन, हल्क और डोरा डौल की कहानी सुनाई।

ग्यारह बज चुका था। हमें गंगा घाटी के ऊंचे पहाड़ों को पार कर आज यमुना घाटी में जाकर विद्यार्थियों और शिक्षकों से मिलना था। इसलिए मातली से निकल कर, झमाझम बारिश का आनंद लेते, धरासू बैंड से पुरोला की राह पकड़ी। यमुना घाटी की यात्रा शुरू करते समय प्रमोद पैनूली जी और अन्य साथियों से विदा ली। प्रमोद जी ने मेरे हित में एक सलाह भी दी, “लंबी यात्रा है, आप कुछ खाना भी खाइएगा। दिन भर इतना सक्रिय रहते हैं, इसलिए शरीर को भी तो ऊर्जा मिलनी चाहिए। इसलिए सर जी, खाना जरूर खा लेना। अब इस यात्रा में आपके साथ चलेंगे हमारे यह साथी अनूप दुबे।” मैंने उन्हें धन्यवाद दिया। साथी अनूप के पास चंद केले और सेब रखे थे। मेरे लिए वह भोजन काफी था।

सारथी विपिन ने यमुना घाटी की राह पकड़ी। ऊंचे पहाड़ों के बीच से हम यहां-वहां बसे छोटे-छोटे गांवों और चीड़ वनों को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे। उस पार भी पर्वतमालाएं थीं। वहां भी कहीं-कहीं माचिस की डिबियों से मकान और हरे-भरे सीढ़ीदार खेत दिखाई दे जाते। बाईं ओर बहुत नीचे कोई नदी बह रही थी। तभी हम चीड़ वन के एक मोड़ पर पहुंचे जहां सड़क पहाड़ की ऊंचाई की ओर जा रही थी। साथी अनूप ने बताया, “यह गिन्योटी बैंड है।” सामने दोनों ओर कुछ कच्चे ढाबे थे।

DSCN5787“यहां तो चाय पी सकते हैं?” मैंने पूछा तो अनूप ने कहा, “जी हां, लक्ष्मी के ढाबे में पीते हैं। यहां खाना भी खा सकते हैं।”

मैंने कहा, “मैं तो यात्रा में कुछ भी नहीं खाता हूं। संन्यासियों का जैसा भोजन करता हूं। सादा अल्पाहार। यहां क्या मिलेगा?”

“दाल, चावल, रोटी, सब्जी सब कुछ।”

मैंने कहा, “विपिन और आप खाना खा लो। मैं देखता हूं, मेरे लायक क्या है।” बातचीत में पता लगा, वे सभी ढाबे वाले नेपाली मूल के हैं। पहले मजदूरी करते थे। पैसे बचा कर यहां ढाबे खोल लिए। दूर-दूर तक और कोई दूकान नहीं है। इसलिए आने-जाने वाले लोग यहां रूक कर चाय-पानी पीते हैं, खाना खाते हैं।

मैंने लक्ष्मी से पूछा, “साग-सब्जी वगैरह कहां से लाते हो?”

उसने कहा, “अपने ही खेतों का है सब कुछ।” मोड़ के पीछे उनका घर था और वहीं वे साग-सब्जियां उगाते हैं।

मैंने कहा, “राम्रो छ (बहुत अच्छा है)। आप लोगों ने बड़ा अच्छा किया है। गुजर-बसर के लिए खुद अपनी मेहनत से अपना छोटा-सा कारोबार शुरू किया है। ऐसा केवल मेहनती लोग ही कर सकते हैं।”

DSCN5784मैं सड़क किनारे खुली हवा में एक मेंड़ पर आकर बैठा तो देखा चारों ओर बड़ी शांति है। चीड़ के पेड़ों पर मैना के आकार की कई ‘ब्लैक हेडेड जे’ यानी बनसरियां या कहें करौल चिड़ियां एक-दूसरे का पीछा करते हुए खेल रही थीं। एक साथ इतनी बनसरियां मैंने पहली बार वहीं देखीं। उन्हें देख ही रहा था कि काले रंग का एक कुत्ता मेरे करीब आकर खड़ा हो गया।

मैंने उससे पूछा, “कैसे हो दोस्त? क्या नाम है तुम्हारा? कालू?”

वह चुपचाप मेरी ओर देखता रहा।

“टामी?” टामी है तुम्हारा नाम?”

वह फिर भी चुप रहा। मैंने उसकी आंखों में देख कर कहा, “यहां इस वीराने में अकेले बोर नहीं हो जाते? कोई दोस्त है तुम्हारा?”

वह चुपचाप दो कदम आगे आया और मेरे आगे सिर झुका कर खड़ा हो गया। मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा। अनूप ने कहा कि कहीं काट न ले। मैंने कहा, नहीं, दोस्त बन गया है, नहीं काटेगा। वह तो शायद खुश है कि उस वीराने में कोई उससे बात तो कर रहा है।

लक्ष्मी खाना बना रही थी। दो-एक लोग खाने का इंतजार कर रहे थे। सब कुछ सामने, ताजा बन रहा था। मुझे सलाद, घर की पत्तागोभी, बींस की सब्जी और एक कटोरी दाल मिल गई। बहुत स्वादिष्ट खाना था।

तभी स्कूल की ड्रैस में पीठ पर छोटा-सा बस्ता कसे एक छोटी, प्यारी-सी बच्ची ढाबे में आई। अनूप उसके साथ खेलने लगा। मेरा भी परिचय कराया और बोला, “यह पूजा है, लक्ष्मी की बेटी।” मुझे यह देख कर बहुत खुशी हुई कि उन मजदूर परिवारों ने न केवल रोजी-रोटी का पक्का इंतजाम किया है बल्कि छोटे बच्चों को भी स्कूल में पढ़ा रहे हैं।

मैंने लक्ष्मी से कहा, “बाहर उस काले कुत्ते का नाम क्या है? न कालू कहने पर सुन रहा है, न टामी कहने पर। नेपाली में कोई नाम रखा है क्या?”

उसने कहा, “नहीं। उसका नाम जैकी है।” मैंने जब जैकी कह कर नाम पुकारा तो उस काले कुत्ते की आंखों में चमक आ गई और वह प्यार से पूंछ हिलाने लगा। तभी पास में भौंकने की भारी आवाज गूंजी- ग्वांग…ग्वांग….ग्वांग! देखा तो काले रंग का एक उम्रदराज भोटिया कुत्ता था। लक्ष्मी ने कहा, “कालू इसका नाम है।” मैंने जैकी से कहा, “अच्छा चलते हैं दोस्त। तुम कालू से बातें करो। ठीक है?”

DSCN5790सड़क घूम कर उठान के साथ आगे जा रही थी। हमारी बोलेरो पेड़ों के बीच से आगे बढ़ती रही और उस पहाड़ के सबसे ऊंचे स्थान ‘राडी टाप’ पर पहुंची। राडी टाप के इस पार गंगा घाटी थी, उस पार यमुना घाटी शुरू हो गई। पहाड़ के टाप पर थे, इसलिए अब सड़क नीचे उतार में जा रही थी। एक जगह मैंने दूर सामने का दृश्य देख कर कहा, “विपिन एक मिनट गाड़ी रोको जरा।” विपिन ने जगह देख कर गाड़ी रोकी। हम बाहर निकले। सामने अद्भुत दृश्य था। लगता था, मानो पहाड़ के गले में नदी की मोटी माला पहना दी गई हो। दो ओर से दो नदियां आकर पहाड़ के पैताने मिल कर एक हो रही थीं। दाईं ओर यानी उत्तर दिशा से आने वाली नदी यमुना थी जो यमुनोत्री से निकल कर और राह में आ मिली छोटी सरिताओं का जल समेट कर वहां से और बड़ी यमुना बन कर कल-कल बहती आगे बढ़ रही थी। उन नदियों के संगम के इस पार खड़े पहाड़ पर एक खूबसूरत गांव बसा हुआ था और चारों ओर बस हरियाली का आंचल फैला हुआ था।

पहाड़ की ऊंचाई से उतर कर हम यमुना किनारे बसे सुंदर नगर बड़कोट पहुंचे गए। यहां से यमुनोत्री केवल 48 किलोमीटर की दूरी पर है। कहते हैं, यहां से हिमालय की बंदरपूंछ चोटी का भव्य दृश्य दिखता है लेकिन आज वह बादलों के आगोश में थी। कहते तो यह भी हैं कि पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की इस नगरी से करीब 12 किलोमीटर दूर गंगानी में कभी महर्षि जमदग्नि ने तपस्या की थी। वहां प्राचीन शिव मंदिर और कल्पवृ़क्ष भी है। कल्पवृक्ष? यानी एडेंसोनिया डिजिटाटा और अंग्रेजी में बाओबाब। और, हिंदी में गोरख इमली। क्या वह कल्पवृक्ष गोरख इमली ही है? देखने और जानने का बड़ा मन था लेकिन समय नहीं था। ‘आजतक’ के पत्रकार बहुगुणा जी को बाइट देनी थी और फिर 4 बजे तक पुरोला पहुंच कर शिक्षक समूह को संबोधित करना था। इसलिए हम बहुगुणा जी से मिल कर तुरंत पुरोला को निकले।

यमुना का पुल पार किया और स्वील तथा नौगांव होते हुए पुरोला की ओर बढ़ते गए। पुरोला एक छोटी नदी कमल गंगा के किनारे बसा नगर है। वहां होटल क्लासिक हिल व्यू में सामान रख कर टी एल सी पहुंचे जहां शिक्षक समूह हमारा ही इंतजार कर रहा था। उनसे विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर खूब बातें की। शिक्षा में विज्ञान के महत्व पर बात करते हुए यह भी चर्चा की कि विज्ञान को भी किस्से-कहानियों के साथ बहुत रोचक ढंग से पढ़ाया जा सकता है। विज्ञान और धर्म तथा आस्था पर पूछे गए सवालों के भी जवाब दिए।

सांझ ढले, होटल के कमरे में पहुंचा। रात्रि विश्राम आज यहीं करना था। कमरा यों तो ठीक लगता था लेकिन बंद-सा था। मन कर रहा था, कोई खिड़की हो जहां से बाहर आसमान देख सकूं और हवा भी आए। देखा, खिड़की तो है। पर्दें का कोना हटा कर धीरे से झांका तो लगा यह केवल मेरा ही नहीं, कुछ दूसरे साथियों का भी रैनबसेरा है! खिड़की की मुंडेर पर सात-आठ मैनाएं सट कर बैठी रात्रि विश्राम कर रही थीं। मैंने उसी तरह चुपचाप पर्दा बंद कर दिया ताकि उनकी नींद में खलल न पड़े और सोने की कोशिश करने लगा।

सुबह मैनाओं ने ही उठाया। वे तेज आवाज में चहक रही थीं- रोडियो, रोडियो, चुर्र-चुर्र!

नहा-धो कर तैयार हुआ। आज 4 बजे पहले उच्च प्राथमिक विद्यालय, चंदेली पहुंचना था और वहां से बड़कोट को प्रस्थान करना था। हम चंदेली पहुंचे। मोटर रोड से नीचे कच्ची पगडंडी में उतरे और चट्टानों के बीच से होकर उच्च माध्यमिक विद्यालय पहुंचे। वहां हवा में धान की फसल की खुशबू थी। आसपास धान के हरे-भरे खेत थे और नीचे कमल गंगा कल-कल बह रही थी। सामने एक ऊंचा पहाड़ था। वह दृश्य मुझे सम्मोहित करते हुए, सुदूर पेरू देश के दक्षिण-पूर्व के पहाड़ों में स्थित इंका सभ्यता के निवासियों की याद दिला रहा था। वहां एक ऊंचे पहाड़ पर सदियों पहले उन्होंने अपना शहर माचू-पिक्चू बसाया था। उसके सामने के पहाड़ को वे अपने पुरखों का पवित्र पहाड़ मानते थे। मैंने यह किस्सा शिक्षक बिजल्वाण जी और शाह जी को बताया और कहा, यह सामने का पहाड़ भी मुझे वैसा ही पुरखों का पहाड़ लग रहा है। आप लोग भी इसे पुरखों का पहाड़ मान लीजिए। इस पर हरा-भरा वन लगाइए।

बिजल्वांण जी ने कहा, “इस पहाड़ के पीछे खलाड़ी गांव है और जागमाता का मंदिर भी।”

मैंने कहा, “वाह। यहां के लोग भी इसे पुरखों का पहाड़ मान लेंगे तो इसका संरक्षण होगा। इसमें हरा-भरा वन पनपेगा।” तभी नीचे बह रही कमलगंगा के उस पार कहीं खेतों में से तीतर बोला-तीन तोला तित्तरी! मानो मेरी बात से सहमति जता रहा हो।

बच्चे कतार लगा कर बरामदे में बैठ गए। उनसे खूब बातें हुईं। हमने मिल कर तारों का गीत गाया। आसमान और तारों की बातें कीं। फिर जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की बातें कीं और जीवन का गीत गाया। वहीं भोजन-माता के हाथ का बनाया स्वादिष्ट भोजन किया। बच्चों ने  अपने कुछ सवाल भी सौंपे। उनसे विदा लेकर हम नौगांव को रवाना हुए। नौगांव में 100 शिक्षकों को संबोधित किया और विज्ञान, लोक विज्ञान और आस्था के बारे में उनके सवालों के जवाब दिए। आज लगातार यात्रा का पांचवां दिन था और वह अब भी जारी थी। दो-ढाई घंटे की विज्ञान चर्चा के बाद रात्रि विश्राम के लिए हमें बड़कोट जाना था। इसलिए बड़कोट के लिए रवाना हुए। वहां होटल देवभूमि में रुके। इस बीच राजकीय इंटरकालेज की ओर से फोन आते रहे कि सुबह उनके कालेज में विद्यार्थियों को जरूर संबोधित करना है। मैंने कहा जरूर, हालांकि हमें एकदम सुबह देहरादून को निकलना था और शताब्दी ट्रेन पकड़नी थी।

WhatsApp Image 2017-08-23 at 2.05.49 PM badkotसुबह बाहर देखा तो सूरज पूर्व दिशा के पहाड़ों से ऊपर निकल आया था उसकी किरणें पूरे बड़कोट नगर को धूप के सुनहरे रंग से रंगने लगी थीं। ठीक आठ बजे हम इंटरकालेज की ओर निकले। वहां पहुंचा तो देखकर चकित रह गया। सामने खुले प्रागंण में कतारें बना कर 900 से अधिक बच्चे बैठे थे और इधर चालीस-पचास अन्य लोग यानी प्रधानाचार्य, शिक्षक, स्टाफ आदि। माइक की भी व्यवस्था थी। मैंने बच्चों से बातें शुरू कीं और फिर बातों-बातों में उन्हें अमीर खुसरो की पहेली ‘एक थाल मोती भरा…’ सुना कर अंतरिक्ष यात्रा पर ले गया। तारों की छांव में तारों का गीत गाया और पूरे सौरमंडल की सैर कराने के बाद उन्हें सुरक्षित धरती पर उतार लाया। धरती पर आकर हम सबने मिल कर जीवन का गीत गाया।

उन सभी से विदा लेकर हमने बड़कोट से देहरादून की राह पकड़ी। अब मेरा साथ अज़ीम प्रेमजी फाडंडेशन के साथी कमलेश दे रहे थे। इस लंबी यात्रा में यमुना हमारे दाहिनी ओर ऊंचे पहाड़ के नीचे गहरी घाटी में बह रही थी। हम विकास नगर मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। वह भी पहाड़ के मध्य में था। हम काखों और नैनबाग से होकर आगे बढ़ रहे थे। दाहिनी ओर की ऊंची पर्वतमाला मुझे सम्मोहित कर रही थी। उसी को एकटक देख रहा था कि विपिन ने कहा, “वहां, उस ओर देखिए। वह लाखा मंडल है। वहां प्राचीन शिव मंदिर है।”

DSCN5801वहां लाखा मंडल गांव था। पढ़ा था, वहीं कहीं कौरवों ने पांडवों को भस्म करने के लिए लाक्षा गृह बनवाया था। वहां सुना है, एक धुंधी उड़यार यानी गुफा भी है जिसमें पाडवों ने शरण ली थी। यह सारा जौनसार-भाबर क्षेत्र है। यहां के निवासी अपने-आपको पांडवों का वंशज मानते हैं। मन ही मन सोचता रहा मैं कि कभी मौका मिला तो यहां इस जगह को करीब से देखने जरूर आवूंगा। विकास नगर की राह में हमें पहाड़ से गिरता एक खूबसूरत झरना भी दिखा जिसकी शीतल बूंदों से बहुत सुकून महसूस हुआ। दिखी तो एक खूबसूरत नीली तितली भी थी जो सड़क किनारे मेरे आसपास ही बार-बार आकर बैठ रही थी। उस पल न जाने क्यों ऐसा लगा कि जैसे उससे मेरा सदियों से कोई रिश्ता है। लगा जैसे वह मिलने ही आई है। उससे भी प्यार से विदा ली और हम कालसी, विकास नगर पार करते हुए समय पर देहरादून रेलवे स्टेशन पहुंच गए। दून शताब्दी दिल्ली जाने के लिए तैयार खड़ी थी। मैं और कमलेश अपनी कोच की ओर जा ही रहे थे कि वहां एक बैंच पर बैठे, अंग्रेजी में बातचीत कर रहे दो लोगों ने हमसे कहा, “वेट फार जस्ट टेन मिनिट्स।” मैं और कमलेश भी पास की एक बैंच पर बैठ गए। लेकिन, कोच का आगे का दरवाजा तो खुला था। हम उससे भीतर गए। कमलेश ने मेरा रकसैक सीट पर रखा और मुझे बिठा कर विदा ली।

मेरे पास एक लाल रंग का चपटा, चौकोर गिफ्ट पैकेट था जो उत्तरकाशी में मेरे कुछ स्नेही साथियों ने बहुत प्यार से मुझे दिया था। कुछ देर बाद वह याद आया। सोचा, रकसैक के साथ ही होगा। मैं चुपचाप बैठा विचारों में खोया था कि एक पुलिस वाले ने आकर पूछा, “क्या बाहर आपका पैकेट पड़ा है?”

मैंने बड़े इत्मीनान से कहा, “नहीं, मेरा सामान तो यहां ऊपर रखा है।”

वह कोच से बाहर गया। यह सोच कर कि आखिर माजरा क्या है, मैंने बाहर झांका। वहां पांच-सात पुलिस वालों की टोली चली आ रही है। अब मैंने बैंच की ओर देखा तो वहां एक लाल रंग का गिफ्ट पैक पड़ा था। पुलिस वाले उसे कुछ दूर से शंका की निगाह से घूर रहे थे।

मैं तेजी से उतरा और बैंच पर से अपना डिब्बा उठाया। पुलिस वालों ने तहकीकात के अंदाज में पूछा, “आपका है यह पैकेट?”

मैंने कहा, “जी हां, भूल गया था यहां पर।” उन्होंने राहत की सांस ली और मैंने भी। कोच के भीतर गया तो देखा, वही बैंच वाले दो यात्री वहां बैठे हैं। उन्होंने मुस्कराते हुए मुझसे पूछा, “मिल गया आपका सामान?” मैं चौंका, यानी इन्हें पता था कि वह पैकेट मेरा है।

मैंने कहा, “जी हां, मिल गया। ये है।”

वे फिर मुस्करा कर बोले, “वी रिपोर्टेड दिस मैटर टू द रेलवे पुलिस।”

मैं हैरान। ये क्या मुझे ही नहीं बता सकते थे कि आपका पैकेट बाहर छूट गया है? खैर, कोई बात नहीं। थका-मांदा अपनी सीट पर आकर बैठ गया। ठीक पांच बजे शताब्दी दिल्ली की ओर रवाना हो गई और मैं गंगा-यमुना घाटी की अपनी यात्रा के पलों को शिद्दत से याद करने लगा।

 

 

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