विज्ञान कथाओं का एक सुनहरा भविष्य हमारे सामने है: मेवाड़ी

विज्ञान कथा साहित्य पर विज्ञान कथाकार देवेंद्र मेवाड़ी से युवा विज्ञान कथाकार मनीष मोहन गोरे की बातचीत

विज्ञान का संचार विज्ञान के अध्ययन और शोध को नए आयाम तो देता ही है, इसके अलावा लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (सूझबूझ भरा या तर्कसंगत नजरिया) का बीज भी डालता है। विज्ञान कथा दरअसल विज्ञान संचार का एक आकर्षक और प्रभावशाली उपकरण होती है। इसमें रचनाकार भविष्य की विज्ञानसम्मत कल्पना करता है। दुनिया के अनेक विज्ञान कथाकारों की अनेक ऐसी कल्पनाएँ आगे चलकर सच साबित हुईं। इस विधा के लेखन के लिए लेखक में वैज्ञानिक ज्ञान और साहित्यिकता का एक संतुलित समन्वय अपेक्षित होता है। इसके महत्व को ध्यान में रखकर दुनिया के कई विकसित देशों में विज्ञान कथाओं को प्राथमिक से लेकर उच्चतम शिक्षा पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है। विद्यार्थी इसमें शोध कार्य भी कर रहे हैं। भारत में भी विज्ञान कथाओं का एक समृद्ध अतीत रहा है और वर्तमान में भी इस ओर सराहनीय कार्य हो रहा है। विज्ञान लेखकों के अलावा साहित्यकारों ने भी इस विधा के विकास के लिए अपनी कलम चलाई है. डॉ. संपूर्णानंद और आचार्य चतुरसेन ऐसे ही नाम हैं। वर्तमान समय में भी रमेश उपाध्याय, संजीव, महुआ माझी, आशीष सिंहा और नरेंद्र नागदेव जैसे हिंदी साहित्यकार विज्ञान कथा साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। अन्य भारतीय भाषाओं में भी उल्लेखनीय कार्य हो रहे हैं। विश्व और भारत के मानचित्र पर विज्ञान कथाओं से जुड़े ऐसे ही कुछ सरोकारों पर ‘इलेक्ट्रानिकी आपके लिए’ के पाठकों हेतु वरिष्ठ हिंदी विज्ञान कथाकार श्री देवेंद्र मेवाड़ी से हुई सार्थक बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं। साक्षात्कार लेने वाले डॉ. मनीष मोहन गोरे स्वयं विज्ञान कथाकार हैं।

मनीष मोहन गोरेः आप एक विज्ञान लेखक-विज्ञान कथाकार होने के साथ साहित्य के भी अध्येता हैं। विज्ञान को लेकर लेखन की ललित विधाओं की समाज के लिए क्या उपादेयता आप महसूस करते हैं?

देवेंद्र मेवाड़ीः मैं विज्ञान और साहित्य दोनों में बराबर रूचि रखता हूं मनीष जी। इस लिए इन दोनों ही विषयों की पुस्तकें पढ़ता रहता हूं। मैंने शुरू से ही साहित्य को जितना जीवन से जुड़ा हुआ पाया, उतना ही विज्ञान भी जीवन से जुड़ा है। अंतर है तो बस भावनाओं और संवेदना का। असल में हुआ यह है कि साहित्य को जहां सीधे मानव जीवन और उसके समाज से संवेदना और भावनाओं के स्तर पर जोड़ा गया, विज्ञान को केवल सपाट तथ्यों, समीकरणों और सिद्धांतों के रूप में सामने रख दिया गया। जबकि, होना यह चाहिए था कि विज्ञान की खोज-यात्रा के साथ-साथ मानव जीवन और उसके समाज पर इन खोजों के संभावित प्रभाव तथा परिणाम को भी उतनी ही शिद्दत से बताया जाता। तब आम आदमी के लिए विज्ञान की पुस्तकें भी काफी रोचक और पठनीय होतीं। इसलिए मैं समझता हूं कि विज्ञान लेखकों को विज्ञान और साहित्य के बीच की दूरी कम करनी चाहिए, उनके बीच एक सेतु का काम करना चाहिए। इस तरह विज्ञान रोचक और सरस होगा और उसे साहित्य से जुड़े लोग भी पढ़ना चाहेंगे। साथ ही, साहित्यिक सरसता के कारण वैज्ञानिकों को भी साहित्य से जुड़ने का मौका मिलेगा। ऐसा विज्ञान लेखन साहित्य की विविध विधाओं और शैलियों में किया जाना चाहिए।

साहित्य और विज्ञान के मानवीय संस्कार पर आपकी दृष्टि काबिले गौर है। विज्ञान की भावना के प्रसार के प्रयासों में एक – लोकप्रिय विज्ञान लेखन, विशेष तौर पर हिंदी में विज्ञान लेखन और इसके महत्व को आप किस प्रकार रेखांकित करना चाहेंगे?

Photo 6लोकप्रिय विज्ञान लेखन समाज के करोड़ों लोगों तक विज्ञान की जानकारी पहुंचाने का सशक्त जरिया है। विज्ञान सच का पता लगाता है और प्रयोगों और परीक्षणों से जो निष्कर्ष निकलता है, उसे बताता है। लेकिन, यह निष्कर्ष तकनीकी शब्दावली की गूढ़ भाषा में होता है जिसे केवल उस विषय के वैज्ञानिक ही आसानी से समझते हैं। जब विज्ञान के ऐसे निष्कर्षों की जानकारी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को पढ़ाई जाती है तो शिक्षक उसे विद्यार्थियों के समझने लायक भाषा में बदलते हैं। यही जानकारी जब करोड़ों-करोड़ आमजन तक पहुंचाई जाती है तो उसे सरल-सहज भाषा और रोचक शैली में लिखा जाता है। यही लोकप्रिय विज्ञान लेखन है। यदि कोई विज्ञान लेखक जटिल और अबूझ भाषा में ही उस जानकारी को लिखकर लोगों तक पहुंचाता है तो विज्ञान के प्रसार का लक्ष्य पूरा नहीं होता। उस तरह का अबूझ लेखन तो ‘खग ही जाने खग की भाषा’ का नमूना कहा जा सकता है। इसीलिए यह एक जिम्मेदारी भरा काम है और इसे समाज के हित में बहुत गंभीरता और समर्पण के साथ करना चाहिए। यहां यह भी बताना चाहूंगा कि जब यही जानकारी बच्चों के लिए लिखी जाती है तो उसे बच्चों के समझने लायक और भी सरल भाषा तथा रोचक शैली में प्रस्तुत किया जाता है। यहां पर सरलता और रोचकता का यह आशय कदापि नहीं है कि प्रामाणिक वैज्ञानिक जानकारी को तोड़-मरोड कर पेश किया जाए। एक बात और, लोकप्रिय विज्ञान लेखन एक कठिन काम है।

दूसरी तरफ हिंदी में विज्ञान लेखन, अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध विज्ञान के ज्ञान का महज हिंदी में शब्दानुवाद नहीं है। इस पूरे अभ्यास में उस ज्ञान का शब्दकोश देखकर हिंदी में मात्र तर्जुमा नहीं किया जाता बल्कि विज्ञान की उस जानकारी को हिंदी भाषा की प्रकृति और मुहावरे में रोचक तरीके से लिखा जाता है ताकि पाठक रूचि लेकर उसे पढ़े और समझे।

ये तो रहा हिंदी में विज्ञान लेखन के स्वभाव के बारे में। विज्ञान को लेकर रचनात्मक लेखन का विश्व में क्या अतीत रहा है? उसी के सापेक्ष हमारे देश में इसके अतीत और वर्तमान पर आपकी राय।

वैज्ञानिक सोच की शुरूआत सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में हुई। उससे पहले प्रकृति के रहस्यों का अनुमान लगाने वाले विद्वान दार्शनिक कहलाते थे। इनमें यूनान के प्लेटो और अरस्तू प्रसिद्ध दार्शनिक थे। उस दौर में भी प्रकृति के बारे में लिखा गया। लेकिन, वह विद्वतापूर्ण लेखन था। सत्रहवीं शताब्दी में बल्कि यों कहें कि 5 जुलाई 1687 को प्रकाशित आइजक न्यूटन के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘फिलोसाफी नेचुरेलिस प्रिंसिपिया मैथमेटिका’ उस दौर में विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ था। वह लैटिन भाषा में लिखा गया था। इसलिए ‘खग ही जाने खग की भाषा’ बना रहा। लंबे समय तक उसमें दिए गए गूढ़ वैज्ञानिक निष्कर्षों और सिद्धांतों की जानकारी आम नहीं हो सकी। इसका कारण वही था – एक गूढ़ भाषा में वैज्ञानिक शब्दावली के साथ विज्ञान का वर्णन।

इसी के विपरीत जब निकोलस कोपर्निकस के सूर्य केंद्रित सिद्धांत (भ्मसपवबमदजतपबजीमवतल) पर सन् 1543 में ‘डी रिवोल्यूशनिबस ओर्बियम कोलेस्टियम’ प्रकाशित हुआ तो वह भी अधिक ध्यान आकर्षित न कर सका। लेकिन, जब उसे इटली के गैलीलियो गैललेई ने सन् 1634 में इतावली भाषा में अनुवाद करके प्रकाशित किया तो तहलका मच गया। इसका कारण उस ग्रंथ का आम लोगों की भाषा में प्रकाशित होना था। उस भाषा को चर्च के धर्माधिकारियों से लेकर आमजन तक सभी समझते थे। इसीलिए धर्माधिकारियों की भृकुटियां तन गईं और उन्होंने धर्म के खिलाफ कोपर्निकस के सूर्य केंद्रित सिद्धांत का समर्थन करने के लिए गैलीलियो पर मुकदमा चलाया और उसे नजरबंद कर दिया। यह आम लोगों की भाषा में आम लोगों तक विज्ञान के पहुंचने का ज्वलंत उदाहरण है।

इसी तरह जोसेफ प्रिस्टले ने सन् 1768 में विद्युत के इतिहास और उसकी तत्कालीन स्थिति पर वहां के आम लोगों के लिए, आम बोलचाल की लोकप्रिय अंग्रेजी भाषा में पुस्तक लिखी। विज्ञान की यह जानकारी भी तेजी से समाज में फैल गई।

सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही प्रसिद्ध वैज्ञानिक राबर्ट बोयल ने लंदन की रायल सोसायटी में कहा था कि विज्ञान को नीरस और सपाट भाषा में नहीं लिखा जाना चाहिए। कई लोग तो विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में जूल्स वर्न और एच. जी. वेल्स जैसे प्रारंभिक विज्ञान कथाकारों का भी बहुत बड़ा योगदान मानते हैं। उन्होंने  आम लोगों को वैज्ञानिक कल्पना के पंख दिए।

मैं तो यह भी कहना चाहता हूं कि अगर आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, बोधायन आदि प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों तथा गणितज्ञों का काम पोथियों से आम लोगों की भाषा में उतार लिया गया होता तो हम सदियों पहले से ही यह समझ रहे होते कि सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण सूर्य, पृथ्वी तथा चंद्रमा की छाया का खेल है।

वैश्विक विज्ञान के संचार पर आपने सही फरमाया। विज्ञान संचारध्लेखन की सबसे सरस और प्रभावशाली विधाओं में आप किन धाराओं को वरीयता देंगे?

साहित्य की हर विधा में विज्ञान लेखन किया जा सकता है। इनमें से सबसे पहले प्रचलित विधा है- फीचर और लेख। आमतौर पर विज्ञान लेखक इसी विधा में विज्ञान लिखते हैं। इसके अलावा कहानी, नाटक, कविता, जीवनी, संस्मरण, साक्षात्कार तथा पत्र शैली में भी विज्ञान को बहुत सरस और रोचक रूप में लिखा जा सकता है। हिंदी में भी कई विज्ञान लेखकों ने विज्ञान कथाएं और विज्ञान नाटक लिखे हैं। विज्ञान कथाओं के भी कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अन्य विधाओं में बहुत कम लिखा गया है। नई पीढ़ी के विज्ञान लेखकों के लिए इन विधाओं में लिखने की बहुत गुंजाइश है। रंगमंच पर खेले जाने लायक विज्ञान नाटक हिंदी में बहुत ही कम लिखे गए हैं। हम नाटककार प्रताप सहगल के आभारी Photo 4हैं कि उन्होंने प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक आर्यभट पर ‘अन्वेषक’ नामक नाटक लिखा है जिसका कई बार मंचन किया जा चुका है। इस विधा में भी लिखने की बहुत संभावनाएं हैं। विज्ञान कविताएं लिखी गई हैं लेकिन विज्ञान के प्रभावों पर गंभीर कविताएं लिखने की बहुत जरूरत है। विज्ञान स्वयं इतना रोचक है कि उसे ललित निबंध के रूप में भी बखूबी लिखा जा सकता है लेकिन इसके लिए लेखक का साहित्य से अनुराग और भाव प्रवण होना आवश्यक है। विज्ञान जिस विधा में काफी लिखा गया है, वह है ‘विज्ञान कथा’। इसे साइंस फिक्शन या विज्ञान गल्प भी कहा जाता है। विज्ञान गल्प इसलिए क्योंकि विज्ञान पर आधारित सभी विधाओं का समावेश विज्ञान गल्प में किया जा सकता है। विज्ञान की साहित्यिक पहचान विज्ञान कथा यानी विज्ञान गल्प से ही संभव हुई है। यह विज्ञान लेखन की एक श्रेष्ठ और प्रमुख विधा है।

जैसा कि आपने विज्ञान कथा को विज्ञान लेखन की एक श्रेष्ठ विधा के रूप में बताया। ‘इलेक्ट्रानिकी आपके लिए’ के पाठक विज्ञान कथा के मायने जानना चाहेंगे। यह विधा साहित्य की कहानी और उपन्यास विधाओं से किस तरह अलग होती है?

मेरे लिए विज्ञान कथा यानी विज्ञान गल्प अथवा साइंस फिक्शन आधुनिक साहित्य की वह विधा है जिसके माध्यम से विज्ञान कथाकार मानव जीवन पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रभाव, विज्ञान से उपजे सामाजिक परिवर्तनों, बदलते मानव मूल्यों और आसन्न संकटों तथा संभावनाओं के ताने-बाने से कहानी बुनता है। जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं, विज्ञान गल्प जिस विधा या शैली में लिखा जाए, वह उसकी परिभाषा के भीतर आना चाहिए। यानी, अगर वह कहानी है तो उसे मुक्कमल कहानी होना चाहिए और अगर नाटक है तो वह एक संपूर्ण नाटक होना चाहिए। विज्ञान गल्प अगर उपन्यास की विधा में लिखा गया है तो उसे साहित्यिक परिभाषा के अनुरूप उपन्यास होना चाहिए।

यहां एक बात और बताना चाहूंगा, विज्ञान गल्प की साहित्यिक विधा को अंग्रेजी में संक्षेप रूप में ‘एस एफ’ कहा जाता है जबकि  इसकी सिनेमाई प्रस्तुति ‘साइफी’ कहलाती है।

विज्ञान कथा का प्रचलित वर्गीकरण शब्द संख्या के आधार पर किया जाता हैः विज्ञान कथा-कहानी (7500 शब्द से कम), उपन्यासिका (7500 से 17500 शब्द), लघु उपन्यास (17500 से 40000 शब्द) और उपन्यास (40000 से अधिक शब्द)। विज्ञान गल्प के प्रसिद्ध ‘ह्यूगो’ तथा ‘नेबुला’ पुरस्कारों के लिए कृतियों का चयन इसी आधार पर किया जाता है।

विज्ञान कथाओं को भविष्यदर्शी कथा की संज्ञा दी जाती है। अनेक विज्ञान कथाकारों की रचनाओं में दी गई कल्पनाएं आगे चलकर सच साबित हुई हैं। अंतरिक्ष उपग्रह, कंप्यूटर, स्वचालित सीढियां आदि ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। इस विचार बिंदु पर आपका क्या मत है?

आप ठीक कह रहे हैं, विज्ञान कथाओं को भविष्य की तस्वीर प्रस्तुत करने वाली कहानियां कहा जाता है। यह इसलिए कि अतीत, वर्तमान या भविष्य में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के संभावित प्रभावों से जो तस्वीर उभरेगी, विज्ञान कथाकार अपनी कहानियों में उसे चित्रित्र करते हैं।

भविष्य की यह तस्वीर भयानक भी हो सकती है क्योंकि हम आज जो कुछ भी कर रहे हैं, उसका गहरा असर कल यानी भविष्य पर पड़ेगा। आज अगर हम जंगलों की हरियाली खत्म कर देंगे तो उससे पर्यावरण पर बहुत बुरा असर पड़ेगा, पहाड़ों से मिट्टी बह-बह कर नदियों में आएगी और गाद बनकर जमा होती जाएगी। इसलिए भविष्य में भयंकर बाढ़ आना अवश्यम्भावी हो जाएगा। इसी तरह हमारे ही बनाए हुए घातक परमाणु बम कल किसी अविवेकी व्यक्ति के निर्णय से फूट गए तो वह मनुष्य जाति को नेस्तनाबूद करने में मानव का एक और आत्मघाती कदम होगा। भविष्य की सटीक कल्पना कभी-कभी कितना अचंभित कर देती है, यह जूल्स वर्न के सन् 1865 में लिखे प्रसिद्ध उपन्यास ‘फ्राम द अर्थ टू द मून’ से पता चलता है। तब चांद के बारे में केवल कल्पना ही की जा सकती थी लेकिन जूल्स वर्न ने ऐसा वर्णन किया मानो वह एक सौ तीन वर्ष बाद अंतरिक्ष में भेजे गए अमेरिकी अपोलो-8 यान की यात्रा के बारे में लिख रहे हों। जूल्स वर्न की कल्पना का अंतरिक्ष यान अमेरिका में फ्लोरिडा से 1 दिसंबर को तोप से दागा गया। अपोलो-8 अंतरिक्ष यान फ्लोरिडा से 96 किलोमीटर दूर केप केनेडी से 21 दिसंबर को छोड़ा गया। जूल्स वर्न के यान की तरह अपोलो-8 यान की ऊंचाई भी 3.6 मीटर थी। जूल्स वर्न के यान का भार 5,540 किलोग्राम था और अपोलो-8 का भार था 5,568 किलोग्राम। जूल्स वर्न के यान ने पृथ्वी से चंद्रमा तक 3,82,000 किलोमीटर यात्रा पूरी की जबकि अपोलो-8 ने 3,60,000 किलोमीटर की यात्रा की। जूल्स वर्न ने उस उपन्यास में लिखा कि चांद पर न हवा है न जीवन। वहां चट्टानें और गड्ढे हैं। वैज्ञानिकों ने भी यही पता लगाया। जब नील आर्मस्ट्रांग ने 20 जुलाई 1969 को चांद पर कदम रखा तो उसने भी वहां यही देखा। अंतरिक्ष यान, कृत्रिम उपग्रह, कंप्यूटर, टेलीफोन, हवाई जहाज और परमाणु बम विज्ञान गल्प में इनके आविष्कार से पहले ही आ चुके थे। इसीलिए मैं मानता हूं कि विज्ञान कथाएं भविष्य की कहानियां हैं और यह भी की भविष्य विज्ञान कथाओं का है।

विश्व विज्ञान कथा साहित्य की परम्परा काफी समृद्ध है। वर्तमान समय में भी विश्व के अनेक देशों में यह साहित्य अनवरत रचा जा रहा है और इस पर शोध कार्य किये जा रहे हैं। इस पर आपके विचार।

हां यह बात सही है कि विश्व विज्ञान कथा साहित्य की परंपरा बहुत समृद्ध है। इस विधा की एक विशेष बात यह है कि शुरू में जब ऐसी कहानियां लिखी जा रही थीं तो वे कथाकार यह नहीं जानते थे कि वे विज्ञान कथाएं लिख रहे हैं। कारण Photo 3यह कि तब तक इस विधा का नाम साइंस फिक्शन या विज्ञान कथा अथवा विज्ञान गल्प रखा ही नहीं गया था। यह नाम तो बहुत बाद में सन् 1930 में प्रचलित हुआ। आश्चर्यजनक बात यह भी है जिन्हें आज विज्ञान कथा साहित्य का जनक माना जाता है, वे कथाकार भी यह नहीं जानते थे कि वे विज्ञान कथाएं लिख रहे हैं। बहरहाल, मैं यह बताना चाहूंगा कि विज्ञान कथाएं लिखने की शुरूआत सत्रहवीं शताब्दी में हो चुकी थी। तब प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक जोहानीज केपलर ने सन् 1634 में सोम्नियम नामक उपन्यास लिखा। फ्रैंसिस बेकन का उपन्यास न्यू एटलांटिस भी तभी प्रकाशित हुआ।

लेकिन, साइंस फिक्शन की मुक्कमल शुरूआत सन् 1818 में प्रकाशित मेरी शैली के उपन्यास ‘फ्रैंकनस्टाइनः आर द माडर्न प्रोमेथियस’ से मानी जाती है। उन्होंने इस कथा को लिखने के लिए इतावली वैज्ञानिक लुइगी गेलवानी के प्रयोग का सहारा लिया जिसमें गेलवानी ने बिजली से मरे हुए मेढ़क की टांग में हरकत करा दी थी। इसके बाद उन्नीसवीं शताब्दी में तीन बड़े विज्ञान कथाकार सामने आए। ये थे – एडगर एलन पो, जूल्स वर्न और एच. जी. वेल्स। इन तीनों विज्ञान कथाकारों के उपन्यासों ने विश्व कथा साहित्य पर गहरा प्रभाव डाला। आज हम सभी जानते हैं कि फ्रांसीसी कथाकार जूल्स वर्न ने रोमांचक यात्राओं की अनोखी कहानियां लिखीं। उन यात्राओं में उन्होंने धरती, आकाश और गहरे समुद्रों की रोमांचक यात्राएं कराईं। लेकिन, उनके बाद अंग्रेज विज्ञान कथाकार एच. जी. वेल्स ने मानव जीवन और उसके समाज से जुड़ी समस्याओं पर विज्ञान कथाएं लिखीं। वर्न और वेल्स को आज विज्ञान कथा विधा यानी साइंस फिक्शन का जनक माना जाता है।

इनके बाद 20वीं सदी में आइजक असीमोव, आर्थर क्लार्क, ए. ई. वान वाट, राबर्ट हीनलीन और थियोडोर स्टर्जियोन आदि विज्ञान कथाकारों ने अपनी कहानियों से विज्ञान कथा विधा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

साहित्य की यह विधा लोकप्रिय होती चली गई और फ्रांस, ब्रिटेन तथा अमेरिका के अलावा रूस, जर्मनी, चेकोस्लाविया, बुल्गारिया, रोमानिया, इटली, पोलैंड, जापान, चीन और भारत में भी विज्ञान कथा साहित्य लिखा जाने लगा।

विज्ञान कथा लेखन की इस हलचल के बावजूद क्या साहित्य की मुख्य धारा के लेखकों ने इस नई विधा में कोई रूचि नहीं ली?

ऐसी बात नहीं है। अपनी कहानियों और उपन्यास को साइंस फिक्शन का नाम उन्होंने भले ही न दिया हो लेकिन मुख्य धारा के कई नामी साहित्यकारों ने भी इस विधा में लिखा। इनमें से कुछ प्रसिद्ध साहित्यकार हैं – आर्थर कानन डायल, जोनाथन स्विफ्ट, वोल्तेयर, अनातोले फ्रांस, रूडयार्ड किपलिंग, जैक लंडन, ई. एम. फास्टर, कारेल चापेक तथा डोरिस लैसिंग। यहां मैं यह भी बता दूं कि विज्ञान कथा साहित्य के स्थापित लेखकों में से भी रे ब्रैडबरी, डोरिस लैसिंग आदि साहित्यकारों को साहित्य की मुख्य धारा में भी भरपूर सम्मान मिला।

भारत में विज्ञान कथा साहित्य का अतीत कितना पुराना है? माना जाता है खास तौर पर हिंदी में लिखी आरम्भिक विज्ञान कथाओं पर विश्व प्रसिद्ध (क्लासिक) विज्ञान कथाओं का सीधा प्रभाव था।

विज्ञान कथा विधा के शोध कार्य के अनुसार भारत में विज्ञान कथा लेखन की शुरूआत 19वीं सदी के उत्तरार्ध से मानी जा सकती है। उस दौर में जो विज्ञान कथाएं लिखी जा रही थीं उन पर अंग्रेजी में प्रकाशित लोकप्रिय विज्ञान कथाओं का प्रभाव साफ झलकता है। अब तक प्राप्त संदर्भों से पता लगता है कि भारत में पहली विज्ञान कथा जगदानंद राय ने सन् 1857 में बंगला भाषा में लिखी। उस कहानी का नाम था ‘शुक्र भ्रमण’। जगदानंद राय ने शुक्र ग्रह में ऐसे प्राणियों की कल्पना की जिनका सिर व नाखून बहुत बड़े थे और शरीर पर बाल ही बाल थे। उन्होंने कल्पना की कि वे प्राणी शायद विकास की प्रक्रिया में हैं।

इसके बाद बंगला भाषा की ही दूसरी विज्ञान कथा ‘रहस्य’ का नाम लिया जा सकता है। उस कहानी में एक ऐसे स्वचालित घर की कल्पना की गई है जिसमें सभी काम मशीनें करती हैं। बंगला भाषा की तीसरी कहानी ‘निरुद्देशेर काहिनी’ सन् 1896 में छपी जिसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चंद्र बसु ने लिखा था। कुछ समय पूर्व तक इसे ही बंगला भाषा की पहली विज्ञान कथा माना जाता था।

हिंदी में विज्ञान कथा लेखन की शुरूआत अंबिका दत्त व्यास लिखित और ‘पीयूष प्रवाह’ (1884-88) में धारावाहिक के रूप से प्रकाशित ‘आश्चर्य वृत्तांत’ उपन्यासिका और ‘सरस्वती’ (1900) में प्रकाशित केशव प्रसाद सिंह की विज्ञान कथा ‘चंद्रलोक की यात्रा’ से मानी जा सकती है, हालांकि इस विषय में शोध की काफी संभावना है। हालांकि, इस विधा को तब तक मुख्य धारा के साहित्य में कहानी लेखन की एक नई विधा के रूप में अलग पहचान नहीं मिली थी, फिर भी ‘सरस्वती’ जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका में विज्ञान की विषय-वस्तु पर आधारित कहानियां प्रकाशित की जाती रहीं।

Photo 8मराठी में पहली विज्ञान कथा ‘तारेचे हास्य’ सन् 1916 में मासिक ‘मनोरंजन’ में प्रकाशित हुई। उसी दौर में नाथ माधव का उपन्यास ‘श्रीनिवासराव’ छपा।

हिंदी की अपेक्षा कुछ अन्य भारतीय भाषाओं (मराठी और बांग्ला) में विज्ञान कथा का सृजन कहीं अधिक हुआ है। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

इसका कारण इन भाषाओं के विज्ञान कथा लेखकों की जागरूकता ही माना जा सकता है। मेरे विचार से तब उन्हें अंग्रेजी भाषा में छप रहे विज्ञान कथा साहित्य की नई विधा ने आकर्षित किया होगा और उन्होंने अपनी भाषा में विज्ञान कथाएं लिखीं। इन शुरूआती कहानियों पर अंग्रेजी विज्ञान कथाओं का प्रभाव देखा जा सकता है।

विज्ञान कथा लेखन की शुरूआत हो गई तो फिर मराठी और बंगला भाषा में इस नई विधा में कहानी लेखन का प्रचलन बढ़ता गया। यही कारण है कि भारत में इन दोनों भाषाओं में विज्ञान कथा साहित्य काफी लिखा गया है। इसके अलावा इन भाषाओं में साहित्य की मुख्य धारा के साहित्यिकारों ने भी योगदान दिया।

हिंदी के अलावा भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा सृजन और इसके लेखकों की वस्तु स्थिति के बारे में बताएं।

विगत सौ-सवा सौ वर्षों के दौरान भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में विपुल विज्ञान कथा साहित्य रचा गया है। बंगला तथा मराठी के अलावा असमी, तमिल, कन्नड़ और पंजाबी भाषा में भी विज्ञान कथाएं लिखी गई हैं। बंगला भाषा में प्रमेंद्र मित्र का घनादा और सत्यजित राय का प्रो. शंकु विज्ञान कथाओं के बहुत लोकप्रिय चरित्र रहे हैं। इसी तरह अद्रीश बर्धन ने गोयेनदा चरित्र रचा। बंगला भाषा में नई पीढ़ी के अनेक विज्ञान कथाकार विज्ञान कथाएं लिख रहे हैं। इसी तरह मराठी भाषा में जयंत विष्णु नार्लीकर, बाल फोंडके, निरंजन घाटे, सुबोध जावणेकर तथा अरूण साधु जाने-माने विज्ञान कथाकार हैं। मैं यह देखकर बहुत चकित रहा कि इन दोनों भाषाओं के समान ही असमी भाषा भी विज्ञान कथा साहित्य में काफी समृद्ध है। असमी भाषा में हरि प्रसाद बरूआ की बिराचतियार देश पहली विज्ञान कथा मानी जाती है जो सन् 1937 में लिखी गई। उसके बाद भी अनेक असमी साहित्यकारों ने विज्ञान कथाएं लिखीं। वर्तमान में दिनेश चंद्र गोस्वामी, नबकांत बरूआ और बंदिता फुकन इस कथा विधा को समृद्ध कर रहे हैं।

तमिल भाषा में विज्ञान कथा लेखन की शुरूआत प्रसिद्ध साहित्यकार सुजाता ने की। नई पीढ़ी के अनेक लेखक तमिल भाषा में विज्ञान कथाएं लिख रहे हैं। कन्नड़ भाषा में राजशेखर भूसनूरमठ ने काफी विज्ञान कथा साहित्य रचा है और नई पीढ़ी के  कई लेखक भी इस विधा में योगदान दे रहे हैं। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि विगत तीन-चार दशकों में पंजाबी भाषा में भी विज्ञान कथाएं लिखी गई हैं। डॉ. अमनदीप सिंह, कर्नल जसबीर भुल्लर, डॉ. अमरजीत सिंह, डॉ. सुरेश रतन और डॉ. डी. पी. सिंह आदि लेखक पंजाबी में विज्ञान कथा विधा को समृद्ध कर रहे हैं।

आप स्वयं हिंदी विज्ञान कथा के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं और आपने अनेक महत्वपूर्ण विज्ञान कथाओं का सृजन किया है। यह बताइए कि आपको विज्ञान कथा लेखन की प्रेरणा कहां से मिली?

हिंदी विज्ञान कथा लेखन में मैंने अपना लघु योगदान दिया है। जहां तक प्रेरणा की बात है तो मुझे बचपन से कहानियां सुनने का बहुत शौक रहा। मां मुझे प्रकृति से जुड़ी जीव-जंतुओं की कहानियां सुनाया करती थी। मन करता था, मैं भी ऐसी कहानियां कहूं। लिखना-पढ़ना सीख गया तो हाई स्कूल में मैं स्वयं कहानियां लिखने लगा। प्रेमचंद, सुदर्शन, चंद्रधर शर्मा गुलेरी आदि लेखकों की कहानियां मन मोह लेती थीं। उसी दौरान ‘विज्ञान लोक’ तथा ‘विज्ञान जगत’ में विज्ञान कथाएं पढ़ने का अवसर मिला। मैं विज्ञान का विद्यार्थी था, इसलिए उन कहानियों में विज्ञान मुझे बहुत अच्छा लगा। मन करता था मैं भी विज्ञान की बात कहने के लिए ऐसी कहानी लिखूं। रात में पेड़ों से निकलने वाली कार्बन डाइआक्साइड गैस को ध्यान में रखकर मैंने सन् 1965 में अपनी पहली विज्ञान कथा ‘प्रेतलीला’ लिखी जो उत्तर प्रदेश सूचना विभाग की प्रमुख पत्रिका ‘त्रिपथगा’ में प्रकाशित हुई।

जब बी.एस-सी. में पढ़ने के लिए नैनीताल गया तो वहां मेरी भेंट प्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक यमुनादत्त वैष्णव ‘अशोक’ से हुई। उन्होंने मुझसे कहा कि आपकी साहित्य में रूचि है, कहानियां लिखते हैं और विज्ञान के विद्यार्थी हैं। आपको साइंस फिक्शन यानी विज्ञान कथाएं लिखनी चाहिए। उदाहरण के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते समय लिखी गई अपनी विज्ञान कथा ‘वैज्ञानिक की पत्नी’ सुनाई जिसे वहां कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला था। उनकी प्रेरणा से मैंने सन् 1965 में ही विज्ञान कथा ‘शैवाल’ लिखी जो नैनीताल से ही प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र ‘पर्वतीय’ में छपी। वह कहानी मैंने झील में उगी काई से अपनी प्रयोगशाला में स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करने वाले एक वैज्ञानिक पर लिखी थी।

Photo 5फिर एक लंबे अरसे बाद सन् 1979 में प्रसिद्ध पत्रिका ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ ने मेरी वैज्ञानिक उपन्यासिका ‘सभ्यता की खोज’ बड़ी सज-धज के साथ प्रकाशित की। उसका कथा बीज मुझे वोएजर यान में भेजे गए पृथ्वी के दृश्यों और आवाजों के रिकार्ड से मिला था। मैंने उसमें ब्रहमांड के किसी सुदूर ग्रह में पनपी सभ्यता के चरम उत्कर्ष और उसी के बनाए बुद्धिमान रोबोटों के हाथ उसके पराभव की कल्पना की।

विज्ञान कथा लेखन में आपने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हिंदी विज्ञान कथा साहित्य के परिदृश्य, चुनौतियों और संभावनाओं पर आपके क्या विचार हैं?

मुझे सदैव अनुभव होता है कि कहानी की इस विधा में लिखने की बहुत संभावनाएं हैं। हिंदी भाषा को कहानी की इस विधा से खूब समृद्ध होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि नई पीढ़ी इस विधा की ओर अधिक से अधिक आकर्षित होकर विज्ञान कथाओं का सृजन करे। इसके लिए भी जरूरी है कि हिंदी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाएं विज्ञान कथाओं के प्रकाशन को प्रोत्साहित करें। हमारे पड़ोसी देश चीन में भी पिछली सदी की शुरूआत में ही विज्ञान कथा लेखन का काम शुरू हुआ। वहां इसे गांव-गांव यानी कम्यूनो के स्तर पर क्लब बना कर एक अभियान की तरह शुरू किया गया। उन विज्ञान कथा लेखन क्लबों में नवोदित ही नहीं बल्कि जाने-माने साहित्यिकार भी भाग लेते थे। धीरे-धीरे पूरे देश में विज्ञान कथा लेखन बढ़ता गया और इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में उन्होंने विज्ञान कथा लेखन की शताब्दी मनाई। हमारे देश में भी पिछली सदी के प्रारंभ से ही ‘सरस्वती’ जैसी प्रसिद्ध पत्रिका में विज्ञान कथाएं छपने लगी थीं, वे आगे भी लिखी गईं। लेकिन सौ साल बाद भी विज्ञान कथा लेखन की कोई जयंती नहीं मनाई गई। विज्ञान कथा साहित्य के परिदृश्य पर नजर डालने पर पता लगता है कि हमारे देश में इस विधा में बहुत धीमी गति से प्रगति हुई। इसका कारण शायद यह रहा हो कि एक तो यह विधा नई थी और दूसरे इसमें विज्ञान होने के कारण साहित्यिक कहानियां लिखने वाले साहित्यिकारों ने इसमें अधिक रूचि नहीं ली होगी। जबकि, सच यह है कि विज्ञान कथा लिखने के लिए विज्ञान का तो सिर्फ बीज चाहिए, पूरे वृक्ष के रूप में तो वह कहानी के तत्वों से विकसित होगी।

हिंदी भाषा के कौन से ऐसे प्रमुख विज्ञान कथाकार हैं जिनके नाम इतिहास में दर्ज हुए। उनके योगदान और विशेषताओं पर आपकी टिप्पणी।

जहां तक इतिहास की बात है, अब तक के शोध कार्य के अनुसार ‘आश्चर्य वृत्तांत’(1884) विज्ञान गल्प के लेखक अंबिका दत्त व्यास और ‘चंद्रलोक की यात्रा’ (1900) के कथाकार केशव प्रसाद सिंह का नाम तो सर्वोपरि दर्ज है। उसी दौर में ‘सरस्वती’ में सत्यदेव परिव्राजक की ‘आश्चर्यजनक घंटी’ विज्ञान कथा प्रकाशित हुई। इस विधा में एक बड़ा और ऐतिहासिक काम प्रसिद्ध साहित्यिकार और यायावर राहुल सांकृत्यायन ने सन् 1924 में ‘बाइसवीं सदी’ उपन्यास लिख कर किया। यह उपन्यास आज भी एक चुनौती के रूप में सामने है कि हिंदी का नामी साहित्यिकार भी विज्ञान गल्प लिख सकता है। उन्हीं दिनों दुर्गाप्रसाद खत्री ने भी ‘स्वर्गपुरी और लाल पंजा’ जैसे वैज्ञानिक उपन्यास लिखे।

यमुनादत्त वैष्णव ‘अशोक’ ने अनेक विज्ञान कथाओं के साथ-साथ चक्षुदान, अस्थि पिंजर तथा अन्न का अविष्कार जैसे वैज्ञानिक उपन्यास लिखे। विज्ञान कथा लेखन की चुनौती को स्वीकार करते हुए डॉ. संपूर्णानंद ने ‘पृथ्वी से सप्तऋिषि मंडल’ तथा आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ‘खग्रास’ उपन्यास लिखा। आंखों के डाक्टर डा. नवल बिहारी मिश्र के कहानी संग्रह ‘अधूरा आविष्कार’ और ‘अदृश्य शत्रु’ प्रकाशित हुए। डॉ. ओम प्रकाश शर्मा ने मंगल यात्रा पर उपन्यास लिखा तो रमेश वर्मा ने ‘अंतरिक्ष स्पर्श’ और ‘अंतरिक्ष के कीड़े’ उपन्यास लिखे। वह पिछली सदी में सन् साठ का दौर था जब रमेश दत्त शर्मा, कैलाश साह, राजेश्वर गंगवार, मायाप्रसाद त्रिपाठी और देवेंद्र मेवाड़ी की विज्ञान कथाएं सामने आईं। सन् 1980 तथा 1990 के दशक में हरीश गोयल, डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय, शुकदेव प्रसाद, डॉ. अरविंद मिश्र, सुभाष लखेड़ा, डॉ. सुबोध महंती, डॉ. मनीष मोहन गोरे, कल्पना कुलश्रेष्ठ, डॉ. जाकिर अली रजनीश, अमित कुमार, डा. अरविंद दुबे, डॉ. अनुराग शर्मा, जीशान हैदर जैदी और विजय चितौरी जैसे हिंदी विज्ञान कथाकारों की विज्ञान कथाएं प्रकाशित हुईं। हिंदी में विज्ञान कथा के इतिहास में इन सभी विज्ञान कथाकारों का योगदान अप्रतिम कहा जाएगा क्योंकि इनके योगदान से हिंदी कथा साहित्य इस नई विधा में समृद्ध हुआ है।

आपके ‘भविष्य’ और ‘कोख’ जैसे विज्ञान कथा संग्रह खासे चर्चित रहे हैं। अपने विज्ञान कथा संसार के बारे में हमारे पाठकों से कुछ साझा करें।

मेरी विज्ञान कथाएं मेरे अपने कल्पना लोक की कहानियां हैं। मैं इस बात पर विश्वास करता हूं कि मेरी कहानी का सोच मेरा अपना होना चाहिए। इसलिए मैं पहले कथा बीज सोचता हूं और फिर उसके सहारे कथानक बुनता हूं। अपने देश-काल के अनुसार उस पर विचार करता हूं और फिर उसे कहानी के सांचे में ढालता हूं। अपनी दो प्रारंभिक कहानियों के बारे में आपको मैं बता चुका हूं। कुछ और कहानियों की कहानियां सुनिए। जानते हैं, सभ्यता की खोज का विचार मुझे कहां से मिला? अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सन् 1977 में सौरमंडल के पार जाने के लिए दो वोएजर अंतरिक्ष यान Photo 1भेजे। प्रसिद्ध खगोल विज्ञानी कार्ल सैगन के सुझाव पर वोएजर में पृथ्वी के दृश्यों और आवाजों का ग्रामोफोन रिकार्ड की तरह का रिकार्ड भेजा गया। ताकि ब्रह्मांड में कहीं, कभी किसी सभ्यता को वह रिकार्ड मिले तो उन्हें हमारी पृथ्वी और मानव सभ्यता के बारे में पता चल सके। मैं साल भर सोचता रहा कि वह रिकार्ड किसे मिल सकता है? क्या वे जीव कीट-पतंगों जैसे होंगे, या बंदरों जैसे, या फिर पक्षियों जैसे? फिर सोचा हो सकता है वे मनुष्यों जैसे हों। उस विचार पर कहानी लिखी जा सकती थी लेकिन मैं उससे आगे सोचने लगा। सोचा, अगर वह सभ्यता हमारी सभ्यता से हजार साल आगे की विकसित सभ्यता हो तो वहां का परिदृश्य कैसा होगा? अचानक ध्यान आया कि हो सकता है वह सभ्यता आटोमेशन की चरम अवस्था में पहुंच चुकी हो और वहां रोबोट राज करते हों। इस विचार ने मुझे रोमांचित कर दिया और मैंने ‘सभ्यता की खोज’ लिख दी। असल में मेरी हर कहानी के पीछे एक कहानी है लेकिन वह सब बताने में बहुत समय लगेगा। इसलिए बस एक-दो उदाहरण और।

मैंने अखबार में किसी बाबा के नए अवतार में प्रकट होने के ढोंग के बारे में एक समाचार पढ़ा तो मुझे ‘अंतिम प्रवचन’ कहानी लिखने का कथानक सूझ गया। मैं जानता था कि अवतार तो हो नहीं सकता लेकिन कल क्लोन जरूर तैयार हो जाएंगे। इसलिए  मैंने वह कहानी मानव क्लोन के इर्द-गिर्द बुनी। इसी तरह ‘कोख’ विज्ञान कथा में मैंने यह संकेत किया कि कल इस तकनीक से गरीब और कम आय वर्ग की महिलाओं का आर्थिक शोषण हो सकता है। आप जानते हैं, गुजरात के आनंद जिले के साथ ही विभिन्न राज्यों में टेस्ट ट्यूब बेबी पैदा करने के लिए इस तरह  का किराए की कोख का व्यापार चल पड़ा और काफी शोषण हुआ। ‘गुडबाय मिस्टर खन्ना’ में मैंने आफिस में नियुक्त एक सुंदर सेक्रेटरी रोबोट की कहानी कही है।

भारतीय विज्ञान कथाएं और विश्व के बाकी हिस्सों में लिखी जा रही विज्ञान कथाओं में क्या साम्यता और क्या भिन्नता है? वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत में लिखी जा रही विज्ञान कथाओं को आप किस प्रकार मूल्यांकन करेंगे?

अच्छी भारतीय विज्ञान कथाएं मैं उन कहानियों को कहूंगा जिनमें भारतीय सोच और भारतीय सुगंध है। बल्कि, एक अच्छी विज्ञान कथा के लिए हमें अपने कथा बीज को भारतीय भाव-भूमि में उगाना चाहिए। हां, वैश्विक सहयोग को दर्शाने के लिए हम भारत या विश्व के किसी अन्य देश में कहानी की नींव रख सकते हैं लेकिन उसमें अंतर्राष्ट्रीय सहयोग जरूर होना चाहिए। यह कभी-कभी इसलिए जरूरी हो जाता है कि कहानी में तकनीकी दृष्टि से जिस उन्नत समाज की हम कल्पना कर रहे हैं, वह फिलहाल पश्चिम के किसी अन्य देश में मौजूद है। इससे पाठकों के मन में कहानी के लिए विश्वसनीयता बढ़ती है। उदाहरण के लिए अगर हम आज के समय में भारत में रोबोटों को अधिकांश काम करते हुए दिखाएं तो पाठक ऐसी कहानी पर विश्वास नहीं करेंगे। लेकिन, अगर हम अपने अंतरिक्ष केंद्र से एक अंतरिक्ष यान सौरमंडल से भी आगे भेजने की कल्पना करते हैं तो हमारे चंद्रयान तथा मंगलयान की सफलता के बाद पाठक उस पर विश्वास कर सकते हैं। इसी तरह हम प्रदूषण के प्रभावों, फसलों में जीनों के हेर-फेर और जीव वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए अपने देश-काल का प्रयोग करते हैं तो वह भी विश्वसनीय होगा।

यहां एक बात यह भी कहना चाहता हूं कि पौराणिक आख्यानों में हमारे पूर्वजों ने बहुत उर्वर कल्पनाएं कीं लेकिन वे कल्पनाएं ही थीं। उनके कोई प्रमाण नहीं हैं। जिन उपलब्धियों के प्रमाण हैं वे हमारे विज्ञान के इतिहास का हिस्सा हैं। इसलिए पौराणिक संदर्भों को लेकर विज्ञान कथा बुनने में भी बहुत सावधानी की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि हम पौराणिक कल्पना मात्र को अपनी कहानी के जरिए सही साबित करने की कोशिश कर रहे हों। वह फर्जी प्रयास होगा।

भारतीय और विदेशी विज्ञान कथाओं का मुख्य अंतर उनमें तकनीकी अंतर को देख कर साफ पता लग जाता है। प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार आइजक असिमोव ने कभी कहा था कि 1930-35 के दौरान वे जो कहानियां लिख रहे थे, सन् 70 के दशक में वह सब उनके देश में मूर्त रूप में दिखने लगा। यानी, पिछली सदी के तीसरे दशक में अमेरिका के जो विज्ञान कथाकार अपनी विज्ञान कथाओं में भविष्य की कल्पना कर रहे थे, तीन-चार दशक बाद वे कल्पनाएं साकार हो गईं। भारतीय कहानियों में हम भविष्य की कल्पना तो कर सकते हैं लेकिन उसके लिए हमें देश की नीतियों और प्रयासों को ध्यान में रखकर ही विकास की कल्पना करके भविष्य बुनना होगा। इसलिए मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह लगता है कि अगर हम मानव मन, जीवन और समाज की स्थितियों पर पड़ रहे विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के प्रभाव की कहानियां अधिक लिखें तो वे मुकम्मल विज्ञान कथाएं होंगी।

Photo 2 (1)भारत में एक जमाने में कई भाषाओं के (हिंदी सहित) अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों ने विज्ञान कथा लेखन की ओर कदम बढ़ाये, नये लेखकों को प्रेरित-प्रोत्साहित किये। आजकल यह स्थिति बनती हुई नहीं दिखती। इसके क्या कारण हैं? साहित्य और विज्ञान लेखन को जोड़कर क्या सृजन की धारा को प्रबल नहीं बनाया जा सकता? इस प्रयास को कौन आगे लेकर जा सकता है?

जैसा कि मैंने पहले बताया प्रसिद्ध साहित्यिकार राहुल सांकृत्यायन, डॉ. संपूर्णानंद और आचार्य चतुरसेन शास्त्री आदि ने हिंदी में विज्ञान गल्प लिखा। लेकिन, अधिकांश साहित्यिकार इस विधा की ओर आकर्षित नहीं हुए। विडंबना यह भी रही कि आलोचकों तथा समालोचकों ने भी हिंदी में इस विधा में लिखे जा रहे कथा साहित्य पर कोई ध्यान नहीं दिया। आपको हिंदी साहित्य के इतिहास के अधिकांश ग्रंथों और हिंदी कहानियों के विश्वकोश में विज्ञान कथाओं का वर्णन या संकलनों में विज्ञान कथाएं नहीं दिखाई देगीं। संभव है किसी जागरूक संपादक ने कोई एक-आध विज्ञान कथा किसी संकलन में दे भी दी हो तो पाठकों तक उसकी बहुत पहुंच नहीं हो पाई है। मैं समझता हूं साहित्य और विज्ञान के बीच की दूरी घटनी चाहिए।

इस दिशा में कुछ नामी साहित्यकारों ने पहल भी की है। डॉ. रमेश उपाध्याय, संजीव, नरेंद्र नागदेव, महुआ माझी, आशीष सिन्हा आदि ने विज्ञान की पृष्ठभूमि पर बहुत अच्छा विज्ञान गल्प लिखा है।

वर्ष 2011 में प्रकाशित सुप्रसिद्ध उपन्यासकार संजीव का उपन्यास ‘रह गईं दिशाएं इसी पार’ टेस्ट-ट्यूब बेबी और जीव वैज्ञानिक प्रयोगों की आड़ में पनपते पूंजी के कारोबार और शोषण का जीवंत वर्णन करता है तो उन्हीं का नवीनतम उपन्यास ‘फांस’ जीएम फसलों के जाल और किसानों की आत्महत्याओं पर आधारित है। इसी तरह महुआ माझी के उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ में झारखंड में भयंकर विकिरण, प्रदूषण और आदिवासियों के विस्थापन का विशद वर्णन किया गया है।

विज्ञान कथाओं के विकास के लिए सरकारी व गैर सरकारी तौर-तरीकों से क्या कुछ और किया जा सकता है?

बहुत-कुछ किया जा सकता है मनीष जी। पहली जरूरत तो यह है कि नई पीढ़ी को विज्ञान कथाओं से परिचित कराने के लिए उनकी पाठ्य पुस्तकों में विज्ञान कथाएं शामिल की जाएं। यों भी यह वर्तमान समय की मांग है। बच्चे अपने समय की कहानियां पढ़ना अधिक पसंद करेंगे। इसके अलावा समाचार पत्र, पत्रिकाओं को विज्ञान कथा विधा को प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें इस विधा की कहानियां प्रकाशित करनीं चाहिए। इससे विज्ञान कथाओं का पाठक वर्ग बढ़ेगा और इन कहानियों की मांग भी बढ़ेगी। यों भी नई पीढ़ी में अंग्रेजी में प्रकाशित साइंस फिक्शन पढ़ने का बहुत क्रेज है। अगर हिंदी में भी उन्हें रोचक और स्तरीय विज्ञान गल्प पढ़ने को मिलेगा तो वे निश्चित रूप से उसे पढ़ना चाहेंगे। सरकार के स्तर पर इस विधा को प्रोत्साहित करने के लिए इसे पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए और इस विधा की अच्छी, स्तरीय रचनाओं को बढ़ावा देने के लिए किसी वार्षिक पुरस्कार की भी व्यवस्था की जा सकती है। दुनिया के कई विकसित देशों में विज्ञान गल्प प्राथमिक से लेकर उच्चतम शिक्षा तक में शामिल है। विद्यार्थी इसमें शोध कार्य भी कर रहे हैं। वहां इस विधा के स्थापित आलोचक भी हैं। हमारे देश में भी यह सब किया जा सकता है।

नये रचनाकारों के नाम आपका क्या संदेश होगा?

नए उभरते कथाकारों से मैं कहना चाहता हूं कि विज्ञान गल्प लेखन में अकूत संभावनाएं हैं और मैं इस विधा का एक सुनहरा भविष्य देख रहा हूं। वे अच्छी विज्ञान कथाएं लिखकर अपना नाम रौशन कर सकते हैं क्योंकि हिंदी साहित्य में अभी इस विधा में बहुत कम लिखा गया है। बस, उनसे एक ही गुजारिश है कि विदेशी कहानियां पढ़कर उनका भावानुवाद या उस कथानक को लेकर उसका मात्र भारतीयकरण न करें बल्कि विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का जो प्रभाव हमारे जीवन और समाज पर पड़ रहा है, उसके बारे में गहराई से सोचें और उस पर विज्ञान कथाएं लिखें। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

धन्यवाद, नमस्कार।

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