अनजान से बना महान

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रविवार था। छुट्टी का दिन। बच्चों ने शाम को ही देवीदा से बात करके तय कर लिया था कि सुबह सैर पर निकलेंगे। गार्गी के घर पर मिलने की बात हो गई। देवीदा ठीक समय पर पहुंच गए। लेकिन, घर के सामने उदास बैठी गार्गी को देख कर चौंक गए।

पूछा, “तुम तो सैर के लिए सबसे ज्यादा खुश थीं, गार्गी। अब क्या हो गया? उदास क्यों हो?”

गार्गी बोली, “बस यों ही देवीदा… ”

“बस यों ही तो नहीं है। कोई न कोई बात जरूर है।” देवीदा बोले।

तब तक कुछ और बच्चे भी आ गए। देवीदा बोले-“भई गार्गी जल्दी बताओ तो सैर पर चलें।”

गार्गी देवीदा को थोड़ा आगे ले गई और उसने सामने गली की ओर इशारा किया। देवीदा ने देखा, पंद्रह-सोलह साल का एक लड़का साइकिल पर जाते हुए चिल्ला रहा है, ”पेपर! रद्दी पेपर! ”

“रद्दी अखबार वाला है।”

“हां देवीदा, वह रद्दी अखबार खरीदता है। हमसे भी उसने अखबार खरीदे। हर रविवार को आता है और गली-गली में घूम कर अखबार खरीदता है। मैंने उससे पूछा था, वह पढ़ता क्यों नहीं। कहने लगा, कैसे पढ़ सकता हूं। मेरे मां-बाप गरीब हैं। मुझे स्कूल नहीं भेज सकते। तो क्या वह जीवन भर रद्दी अखबार ही बेचता रहेगा, देवीदा? क्या वह और कुछ नहीं बन सकता? ”

“अच्छा तो इसीलिए उदास हो तुम! भई, क्यों नहीं बन सकता? उस रद्दी अखबार वाले में अगर आगे बढ़ने की लगन हो तो वह भी गरीब और अनजान माइकेल की तरह महान आदमी बन सकता है।”

“माइकेल? कौन माइकेल देवीदा? ” गार्गी ने उत्सुकता से पूछा।

“अब यह तो हम सैर करते हुए ही बताएंगे, ” कह कर देवीदा चल पड़े। बच्चे उनके पीछे पड़ गए, “बताइए न देवीदा, कौन माइकेल? ”

“चुंबक से बिजली का आविष्कार करने वाला महान वैज्ञानिक माइकेल फैराडे, ” देवीदा ने बताया।

“अच्छा? तो क्या माइकेल फैराडे बहुत गरीब थे देवीदा? ” विवेक ने पूछा।

“हां विवेक, माइकेल का पूरा बचपन गरीबी में बीता। उसके पिता लुहार का काम करते थे। लेकिन, अक्सर बीमार रहने के कारण घर का खर्च चलाना कठिन हो जाता था। कई बार माइकेल को एक ही रोटी पर पूरा सप्ताह गुजारना पड़ता था। फिर भी कुछ समय तक उसे स्कूल भेजा गया। उसने बस लिखना-पढ़ना सीखा। घर का खर्च चलाने के लिए उसे स्कूल छोड़ देना पड़ा। तब वह केवल बारह वर्ष का बच्चा था। जानते हो उसने कौन-सा काम शुरू किया? ” देवीदा ने पूछा।

गार्गी बोली, “रद्दी अखबार बेचने का काम।” देवीदा ने कहा, “गार्गी ठीक कह रही है। माइकेल रद्दी अखबार बेचने लगा। वह मुहल्ले के एक बुकसेलर के यहां रद्दी अखबार बेच देता था। उसे जो पैसे मिलते उनसे घर खर्च चलाता।”

तब प्रिया ने पूछा, “देवीदा, माइकेल फैराडे का जन्म कहां हुआ था? ”

“अरे हां, यह बताना तो मैं भूल ही गया,“ चलते-चलते देवीदा ने कहा, ”उसका जन्म आज से 217 साल पहले 22 सितंबर 1791 को इंग्लैंड के न्यूइंगटन गांव में हुआ था।…हां, तो दोस्तो मैं कह रहा था, माइकेल रद्दी अखबार बेचने लगा। बुकसेलर को उसका स्वभाव बहुत अच्छा लगा। उसने खुश होकर माइकेल को किताबों की बाइंडिंग का काम सिखा दिया। इससे उसे कुछ और पैसे मिलने लगे। लेकिन, माइकेल ज्यादा खुश इस बात से हुआ कि अब वह खूब किताबें पढ़ सकेगा।”

“कौन-सी किताबें देवीदा? ” अरूण ने पूछा।

“वही जो बाइंडिंग के लिए आती थीं। माइकेल उन्हें पढ़ता और बाइंड कर देता। इस तरह उसने बहुत किताबें पढ़ीं। पढ़ते-पढ़ते उसकी विज्ञान में रूचि बढ़ती गई। वह किताबों में बताए हुए प्रयोग करने लगा। उसने पुरानी बोतलों और तार वगैरह से बिजली का छोटा-सा जनरेटर बना लिया। उस पर प्रयोग करता रहा।”

“फिर क्या हुआ देवीदा? ” गार्गी ने पूछा।

“फिर, फिर एक ऐसी घटना हो गई, जिसने माइकेल की जिंदगी बदल दी। हुआ यह कि बुकसेलर की दुकान में अपनी किताब लेने एक ग्राहक आया। वह जानता था कि माइकेल की विज्ञान में बहुत रूचि है। उसने माइकेल को बताया कि लंदन में विज्ञान की एक प्रसिद्ध संस्था है ‘रायल इंस्टीट्यूशन‘। वहां जाने-माने वैज्ञानिक सर हम्फ्री डेवी भाषण देने आ रहे है।। उसने माइकेल को भाषण सुनने के टिकट भी दिए। माइकेल ने वहां जाकर सर हम्फ्री डेवी के भाषण सुने। उनके नोट्स बनाए। घर लौट कर उन नोट्स को अपने शब्दों में समझा कर लिखा। उनकी बाइंडिंग करके किताब बनाई और एक पत्र लिख कर उसे सर डेवी को भेज दिया। पत्र में उसने प्रयोगशाला में नौकरी देने की प्रार्थना की थी।”

“तो क्या माइकेल को नौकरी मिली देवीदा? ” मानसी ने पूछा।

“हां मानसी, कुछ समय लगा लेकिन फिर सर डेवी ने माइकेल को अपनी प्रयोगशाला में सहायक की नौकरी दे दी। वहां माइकेल रात-दिन प्रयोग करने लगा। वह सर डेवी के साथ कई दे्यों में घूमा और प्रसिद्ध वैज्ञानिकों से मिला। उसकी लगन और मेहनत रंग लाई। उसने नई खोजें कर डालीं।”

“कौन-सी नई खोजें देवीदा? ” चेतन ने पूछा।

“उसने चुंबक से बिजली बना दी। बिजली की मोटर, डायनयो और ट्रांसफार्मर का आविष्कार करके बिजली को मानव की सेवा में लगा दिया। दोस्तो, आज हमारे घर-आंगन और शहरों को जगमगाने, टेलीफोन, टेलीग्राफ जैसे हजारों उपकरणों को चलाने वाली बिजली माइकेल फैराडे की ही देन है। उसने बैंजीन नामक रसायन की खोज की। कार्बन और क्लोरीन को मिला कर नए यौगिक बनाए। दूरबीनों के लिए बढ़िया किस्म का शीशा बनाया। और भी कई खोजें कीं।…एक बात बताऊं दोस्तो? ” देवीदा ने मुस्कुरा कर कहा तो सभी बच्चों ने उनकी ओर ध्यान से देखा।

वे बोले, ”वह बच्चों को बहुत अच्छा मानते थे।”

“अच्छा? ” सुन कर सभी बच्चे खुश हो गए।

देवीदा आगे बोले, “फैराडे ने बच्चों के लिए विज्ञान के रोचक व्याख्यान शुरू कराए। उसने अपना पहला व्याख्यान ‘मोमबत्ती का रासायनिक इतिहास’ विषय पर दिया। उसे बहुत बच्चों ने सुना। उसने हर साल क्रिसमस के दिन बच्चों के लिए विज्ञान के मजेदार भाषण देने की परंपरा शुरू की। फैराडे कहता था कि बच्चों के लिए ऐसे मजेदार भाषण बहुत जरूरी हैं, तभी वे विज्ञान को अच्छी तरह समझ-बूझ सकेंगे।…जानते हो आगे बढ़ने की कितनी लगन थी उसमें? ”

सभी बच्चे देवीदा का मुंह ताकने लगे। तब उन्होंने कहा, “इतनी लगन थी उसमें कि वह चालीस वर्ष तक हर रोज अपनी प्रयोगशाला में जाकर काम करता रहा! न कोई छुट्टी, न आराम। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वह बीमार पड़ कर कमजोर हो गया। महारानी विक्टोरिया ने उसे एक मकान भेंट में दिया। उसे ‘नाइट’ की पदवी से भी सम्मानित करना चाहा लेकिन दोस्तो, माइकेल फैराडे ने मना कर दिया। दुनिया भर से उसे सम्मान मिले। वह विश्व प्रसिद्ध हो गया। 25 अगस्त 1867 को माइकेल इस दुनिया से विदा हो गया… ”

देवीदा चुप हो गए। बच्चे भी चुपचाप उनके साथ चलते रहे, मानो उस महान वैज्ञानिक को मौन श्रद्धांजलि दे रहे हों। फिर गार्गी ने चुप्पी तोड़ी, “देवीदा, इसका मतलब है लगन और मेहनत से कोई भी आगे बढ़ सकता है? ”

“हां, गार्गी कोई भी। वह गली में रद्दी अखबार खरीदने वाला लड़का भी। दोस्तो, हम लोग उसे किताबें देंगे। उसकी हर तरह मदद करेंगे। चलो, चल कर उससे बात करते हैं, ” देवीदा ने कहा और बच्चों को साथ लेकर रद्दी वाले बच्चे से मिलने के लिए चल पड़े।

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