अनूठी पोटली यादों की…

 

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प्रकाशक – नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया

नेहरू भवन, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-2

वसंत कुंज, नई दिल्ली -110070

मूल्य – 140 रुपये
पहाड़ कहीं के भी हों, बहुत आकर्षित करते हैं। प्रकृति का सानिध्य पाने के लिए लालायित पर्यटकों को सबसे ज्यादा सुहाने लगते हैं पहाड़। बर्फ मढ़ी चोटियां, बल खाती नदियां, इठलाते झरने और सनन सन चलती हवा, लेकिन इन पहाड़ों के जीवन की असलियत कितनों को पता होती है/ पर्यटक आते हैं और चले जाते हैं। उनका भला यहां की संघर्षशील जिंदगी से क्या वास्ता/ यहां तक कि प्रवासी पहाड़ियों के बच्चों तक को यहां के जन जीवन के बारे में कुछ पता नहीं होता है। हां, वे जन जरूर थोड़े बहुत जानकार होते हैं, जिनके बाप-दादाओं ने दिल्ली, मुंबई, लखनऊ या जयपुर जैसे किसी शहर में गृहस्थी जमा लेने के बावजूद अपनी यादों में एक पहाड़ बसा रखा होता है और जो इसे अपनी अगली पीढ़ी को किसी धरोहर की तरह सौंपने के जतन करते रहते हैं…। जाने-माने लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने भी अपनी कृति ‘मेरी यादों का पहाड़’ में ऐसा ही जतन किया है। बचपन की स्मृतियां संजोकर मेवाड़ी जी ने संस्मरणात्मक कथा साहित्य को ऐसी ऊंचाई प्रदान की है, ऐसे गद्य का सृजन किया है कि बरबस मुंह से एक ही शब्द निकलता है- अद्भुत। असल में ऐसी कृति तभी संभव है, जब आपका अपनी मातृभूमि से अटूट लगाव हो। जन्मभूमि के प्रति जबर्दस्त तड़प हो आपके भीतर। आप कितने ही उम्रदराज हो जाएं, लेकिन आपके अंदर बचपन हरदम मौजूद हो।

बाघ (श्यूं-बाघ) से शुरू हुआ यह आख्यान पहाड़ के जीवन को तमाम धूसर और चटक रंगों के साथ ऐसे चित्रात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है कि एकबारगी आप किसी आश्चर्य लोक में पहुंच जाते हैं। जिनका उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन से दूर-दूर तक कोई संबंध न रहा हो, वे एक अलग किस्म के रोमांच से भर सकते हैं और जो कभी किसी पहाड़ी गांव में रहे हैं और अभी तक विस्मृत नहीं हुए हैं, वे अपने भूतकाल में लौट-लौट जाते हैं। किताब का एक-एक पैरा, एक-एक पंक्ति जैसे कि जीवन से लबालब है। अनन्य कथा रस से सराबोर। इन किस्सों के साथ चलते हुए आप देर तक मंद-मंद मुस्कराते रह सकते हैं या खिलखिलाकर हंस सकते हैं। अतीत में खो सकते हैं। बेहद उदास हो सकते हैं और कितनी ही बार आपकी रुलाई भी फूट सकती है। इजा-बौज्यू (माता-पिता), ददा (बड़ा भाई), दोस्तों, स्कूल के सहपाठियों, अध्यापकों से लेकर कालू कुत्ते तक से लेखक के जैसे आत्मीय रिश्तों का बखान हुआ है, वह वास्तविक अनुराग और गहरी संवेदनशीलता के बिना संभव ही नहीं है। कई बार लगता है कि किस्सों के भीतर आखिर कितने किस्से हैं/ इन किस्सों में प्रचुर मात्रा में लोक शब्दों का प्रयोग हुआ है, लेकिन वे बाधक कतई नहीं बने हैं। बल्कि इससे परिवेश को प्रामाणिकता मिली है। लोकगीतों की छौंक और लोककथा की मौजूदगी से गद्य के लालित्य में कई गुना अभिवृद्धि हुई है। तमाम किस्सों में मौजूद शाब्दिक ध्वन्यात्मकता प्रसिद्ध कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की कृतियों की याद दिला देती है।

दरअसल इस कृति में मूल कथा के साथ इतनी उप कथाएं हैं कि कहीं कोई भी चीज छूटती नहीं दिखती। लेकिन यह सब स्वत:स्फूर्त और बिना किसी आपाधापी के हुआ है। पंक्ति दर पंक्ति जैसे एक राह से हजार राहें फूट पड़ती हैं, कुछ उसी तरह का मंजर उपस्थित हुआ है। आश्चर्य होता है कि लेखक ने कितनी ही विधाएं कितनी कुशलता के साथ एक ही कृति में समेट दी हैं!! पहाड़ी लोकजीवन की ऐसी प्रामाणिक और लगभग पूर्ण बानगी किसी अन्य लेखक की कृति में आ पाई हो, मेरे स्मरण में नहीं। हालांकि शैलेश मटियानी, मनोहर श्याम जोशी, विद्यासागर नौटियाल, शेखर जोशी, हिमांशु जोशी, रमेश चंद्र शाह, पंकज बिष्ट, बटरोही, सुभाष पंत, नवीन जोशी, नवीन नैथानी, संजय खाती आदि की कहानियों में पहाड़ की विभिन्न छबियां मौजूद हैं, लेकिन उनकी सीमा यह है कि वे ‘मेरी यादों का पहाड़’ की तरह कथेतर नहीं हैं। उनमें जीवन एक इकाई के तौर पर ही धड़कता है। अंत में यही कि यह किताब आर. के नारायण की ‘मालगुड़ी डेज’ और रश्किन बॉन्ड की ‘रस्टी के कारनामे’ से कम महत्व की नहीं है। इस कृति पर भी एक बेहतरीन धारावाहिक का निर्माण हो सकता है, अगर किसी को साहित्य को परदे पर उकेरने की पड़ी हो तो।

 

(6 अगस्त 2017) नवभारत टाइम्स, मुंबई में मेरी पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ की समीक्षा, वरिष्ठ साहित्यकार हरि मृदुल की कलम से।

 

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