ब्रह्मपुत्र लिटरेरी फेस्टिवल- 2017

16473982_10207968563203459_51979446899851091_nगुवाहाटी, असम से ब्रह्मपुत्र लिटरेरी फेस्टिवल- 2017 की यादें लेकर लौट आया हूं। साहित्य की दुनिया में पूरे तीन दिन गुजारना मेरे लिए एक यादगार अनुभव है।
यों भी, गुवाहाटी की मेरी यह पहली यात्रा थी। विशाल ब्रह्मपुत्र के बारे में सुना भर था, निकट से तो उसे पहली बार इसी यात्रा में देखा। पहले आकाश से महाबाहु, ब्रह्मपुत्र का विस्तार नज़र आया और फिर एक लंबी सांझ क्रूज पर उसकी संगत में शीतल बयार के सुखद स्पर्श के साथ मर्मस्पर्शी कविताएं सुनते हुए बिताई। 27 जनवरी को गुवाहाटी के बारदोलाई हवाई अड्डे पर मार्गदर्शक चिरंजीत होजोंग ने गले में असम का पारंपरिक गमछा पहना कर स्वागत किया और वहां से गेटवे ग्रेडियोर होटल, जी.एस.रोड, क्रिश्चियन बस्ती का रूख किया। दो घंटे लंबी राह में असम के जनजीवन के दृश्य देखते हुए आगे बढ़े। एक जगह खेतों में कहीं बिहू नाचती महिलाएं भी दिखीं और एक झील भी। लेकिन, उसमें प्रवासी पक्षी नहीं दिखे। होटल पहुंचे। पता लगा, असम सरकार ने हम साहित्यकारों को राज्य-अतिथि माना है। वहीं पता लगा, व्यंग्यकार श्री प्रेम जनमेजय, साहित्यकार विशेष कुमार गुप्त, मारीशस के हीरामन, रामदेव धुरंधर, बीबीसी के मिर्ज़ा ए.बी.बेग, प्रज्ञा, राकेश और कई अन्य लेखक भी वहीं रूके हैं।
अगले दिन यानी 28 जनवरी को हरे-भरे श्रीमंत शंकरदेव कला सेतु में ब्रह्मपुत्र लिटरेरी फेस्टिवल-2017 का शुभारंभ हुआ। हजारों स्कूली बच्चे लंबे मार्ग पर साहित्य रैली निकाल चुके थे। उद्घाटन बेजबरूआ लांस में विशेष रूप से निर्मित एक भव्य और विशाल हाल में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री प्रकाश जावडेकर ने किया।
समारोह में 10,000 से अधिक स्कूली बच्चों सहित सैकड़ों लोग मौजूद थे। पूरा आयोजन साहित्य संस्कृति और कला के रंगों में रंगा था। स्कूली बच्चों ने नाना प्रकार के लोक नृत्यों से लोकरंग बिखेरे। परंपरागत बिहू नृत्य की प्रस्तुतियां वसंत ऋतु का स्वागत कर रही थीं। देश-विदेश से आए लगभग 200 साहित्यकार भी लोकरंगों की इन ‘अनेकता में एकता’ की प्रस्तुतियों के गवाह बने। इनमें इटली के कार्लो पिज्ज़ाटी, जापान की रेंडी तागुत्ची, अमेरिका के नील हाल आदि के साथ ही विभिन्न भाषाओं के अनेक जाने-माने वरिष्ठ और युवा पीढ़ी के लेखक भी मौजूद थे। साहित्य महोत्सव में 20 से अधिक भाषाओं के साहित्यकारों ने भाग लिया और 60 से अधिक सत्रों में अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं अथवा परिचर्चाओं में अपने विचार रखे।
विभिन्न सत्र आधुनिक साहित्य, पारंपरिक कहानियां, कविता, उत्तर-पूर्व का साहित्य, असमी साहित्य, बाल साहित्य, विज्ञान गल्प, वन्य जीव तथा पर्यावरण, पूर्वोत्तर का समसामयिक साहित्य, ग्राफिक उपन्यास, महिला लेखन, संस्मरण तथा आत्मकथाएं, इतिहास और रचनात्मक लेखन आदि विषयों पर केन्द्रित थे। मैंने बाल साहित्य, पर्यावरण और नदी-गीत के सत्रों में अपनी बात रखी। बाल साहित्य में मेरे साथी थेः सुबीर राय, रश्मि नरजारी, बंदिता फुकन, क्लारा पेनाल्वेर (स्पेन) और मनीषा चैधरी। पर्यावरण और वन्य जीवों की जीवंत चर्चा में भाग लिया प्रेरणा बिंद्रा, दिलीप चंद्रन, ध्रुब हजारिका, अनीता थंपी और भास्कर दत्त बरुआ।
ब्रह्मपुत्र लिटरेरी फेस्टिवल ने कई साहित्यकारों और कलाकारों से व्यक्तिगत आत्मीय चर्चा का भी मौका दिया। इनमें कलाकार प्रोफेसर सुबीर राय, युवा उपन्यासकार सम्राट  चौधरी, विवेक मेंनेजेस, चित्रकार अशोक भौमिक, रवि सिंह, राज हीरामन तथा रामदेव धुरंधर (मारीशस), ललित लालित्य, प्रेम जनमेजय, विशेष कुमार गुप्त, प्रज्ञा तथा राकेश शामिल थे। तिब्बती मूल के संवेदनशील युवा कवि तेनजिन त्सुनड्यू से मिलना निर्वासन के दर्द से मिलना था। इस दौरान गुवाहाटी के आंचलिक विज्ञान केन्द्र और प्राचीन कामाख्या देवालय को भी देखने का अवसर मिला।
गुवाहाटी की तीसरी सांझ क्रूज यानी पानी के जहाज पर कविता की लंबी सांझ के रूप में बीती। ब्रह्मपुत्र के गहरे शीतल जल में मंथर गति से चलते क्रूज में देश-विदेश के कवियों ने अपनी कविताएं सुनाईं। नील हाल ने अपनी कविताओं में रंगभेद का दर्द बयां किया तो तेनजिन त्सुन्दू ने निर्वासन की पीड़ा का कुछ इस तरह वर्णन कियाः “छत पर उगी घास/अंकुरित हुए सेम के बीज और ऊपर चढ़ गई हैं बेलें/खिड़कियों से रेंग कर भीतर चले गए हैं मनीप्लांट/लगता है जड़ें  निकल आई हैं हमारे घर में/बाड़ बन गई है जंगल/अब कैसे बताऊंगा अपने बच्चों को कि कहां से आए थे हम?“ 
कविताएं सुनते और खाना खाते-खाते रात दस बज गया। क्रूज किनारे आ लगा था और अंधेरे में उसकी रोशनियां ब्रह्मपुत्र के शांत जल में प्रतिबंबित हो रही थीं। यह विदाई की शाम थी। तीन दिनों के इस सफल साहित्य समारोह के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया और असम सरकार को हार्दिक बधाई।

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