श्यामला हिल्स, बारिश और विज्ञान कथाएं

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इस बार जब फिर भोपाल जाने का मौका मिला तो मन रोमांचित हो उठा। आषाढ़ चल रहा था और आसमान में मेघ उमड़ आए थे। इसलिए उनसे मुलाकात भी तय थी। मन में यह भी था कि क्या पता कालीदास के मेघ के किसी वंशज मेघ से भी मुलाकात हो जाए!

एक ख्वाहिश और थी जो अप्रैल माह से ही मन में पाल ली थी कि जब भी भोपाल जाऊंगा, श्यामला हिल्स जरूर जावूंगा। हुआ यह कि ‘नया ज्ञानोदय’ के अप्रैल अंक में जब वंदना शुक्ल का लिखा शहरनामा ‘पतझड़ और पेस्टन ग्रीन यादें’ पढ़ा था तो तभी से मेरे भीतर बचपन से ही साथ-साथ चलता मेरा हमजोली ‘देबी’ मचल उठा कि अब जब भी भोपाल जाएंगे तो मैं श्यामला हिल्स जरूर जाऊंगा। वहां क्यों पूछा तो बोला-वहां सी. एम. हाउस की बगल से नीचे उतरते ढलान पर ‘हवाई जहाज’ बन कर दौडूंगा। मैं जानता था किसी की स्मृति के बिंब में जाकर अतीत के उन पलों को जीना कितना रोमांचक होगा। इसलिए मैंने उसे दिलासा दी कि जरूर, जब भी वहां जाऊंगा, तुम्हें श्यामला हिल्स ले जाऊंगा।

facebook bhopalउस दिन रात 11 बजे नैनीताल से लौटा था। भोपाल के लिए जरूरत का निजी सामान पैक करके रात तीन बजे बेटे बहू के साथ इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की ओर चल पड़ा। जेट के लौह पंछी ने अलसुबह 5:45 बजे उड़ान भरी और चंद पलों में ही हम दिल्ली महानगर को नीचे धरती पर छोड़ कर आसमान में उड़ चले। जल्दी ही लौह पंछी मेघमालाओं से ऊपर उठ कर मध्य भारत की ओर उड़ने लगा। आकाश मार्ग में सफेद और भूरे नाना प्रकार के मेघ दिखाई देते रहे। उनके बीच से कहीं-कहीं नीचे धरती, नदी, पहाड़, जंगल और मकानों की झलक भी दिखाई दे जाती। कहीं क्षितिज पर सूरज दिखने लगा। कभी जब उसकी किरणें हमारे पीछे से सामने श्वेत मेघ-मालाओं से टकरातीं तो गोल इंद्रधनुष दिखाई देने लगता। अद्भुत था वह दृश्य क्योंकि पृथ्वी पर तो इंद्रघनुष आधा ही दिखाई देता है।

मेघ आ-जा रहे थे। उनमें पहचानना कठिन था कि कालीदास ने पंद्रह सौ वर्ष पहले किस तरह के मेघ को मित्र बना कर संदेश ले जाने की याचना की होगी। लेकिन, वे इतने सुंदर थे और उनके इतने रूपाकार थे कि पूरी मेघमाला को मित्र बना लेने का मन होता था। और, मेरे मन ने यही किया भी। मुझे नीचे धरती पर सांप की तरह रेंगती एक नदी दिखाई दी। शायद चंबल रही होगी। कालीदास के मेघ ने इसे देवगिरि पर्वत के पास देखा होगा और फिर वह पश्चिमी मालवा के आकाश से होकर उत्तर दिशा में हिमालय की ओर बढ़ा होगा। लेकिन, उन गछिन मेघों को देखकर तो पता ही नहीं लग रहा था कि वे कहां जा रहे थे। चारों तरफ उन्हीं का लोक था।

सूरज की तिरछी किरणों से चांदी की तरह चमक उठी कुछ सर्पिलाकार नदियों और बेडौल आकार के तालाबों को देखते-देखते हम शहर भोपाल पहुंच गए। वहां धरती बारिश में नहा चुकी थी, इसलिए हवा में उसकी सौंधी खुशबू तैर रही थी। मित्र रवि ने मुझे अपनी गाड़ी में बैठाया और बारिश में नहाए, हरे-भरे पेड़ों के बीच से निकलती सड़कों से होकर बड़ी आत्मीयता के साथ न्यू मार्केट इलाके के एक होटल तक पहुंचा दिया। वहां कवि मित्र मोहन सगोरिया से भेंट हुई। उन्होंने पूछा, “नाटकों की प्रस्तुति शाम को है। दिन में कहीं जाने की इच्छा है तो बताएं?”

मैंने कहा, ”बस एक ही इच्छा है- श्यामला हिल्स में सड़क की ढलान पर दौड़ना है। लेकिन, आज नहीं, कल या परसों।”

वे बोले, “हो जाएगा।”

थका था, रात भर सोया भी नहीं था, इसलिए यों ही विश्राम की मुद्रा में लेट गया।

सायं सगोरिया जी के साथ भारत भवन का रुख किया। वहां इस पूरे आयोजन के सूत्रधार कवि-कथाकर संतोष चौबे जी से भेंट हुई। साथी विज्ञान कथा लेखक मनीष मोहन गोरे, इरफान ह्यूमन, डा. अरविंद मिश्र, डा. जाकिर अली रजनीश और अर्शिया अली से भी मिलना हुआ। कई स्थानीय रंगकर्मियों और रचनाकारों से परिचय हुआ।

blogभारत भवन के एम्फिथिएटर में पहले बर्तोल्ड ब्रेख्त के नाटक ‘गैलीलियो’ की प्रस्तुति देखी जिसे संतोष चौबे जी के गीतों से भी संवारा गया था। फिर एक नदी की व्यथा-कथा ‘मैं नदी आंसू भरी’ देखी कि किस तरह एक साफ-सुथरी पवित्र नदी स्वयं मनुष्य की करतूतों से कितनी प्रदूषित हो जाती है। देश की निरंतर प्रदूषित हो रही नदियों का प्रतीक था यह नाटक। फिर विज्ञान गीत सुने। इस मौके पर उन विज्ञान गीतों के संगीत निर्देशक श्री संतोष कौशिक को उनके दीर्घ योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

अगला दिन विज्ञान कथाओं का दिन था। उस दिन आइसेक्ट विश्वविद्यालय के सभागार में विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित विज्ञान कथा संग्रह ‘सुपरनोवा का रहस्य’ का लोकार्पण किया गया। संग्रह में जयंत विष्णु नार्लीकर, शुकदेव प्रसाद, देवेंद्र मेवाड़ी, राजीव रंजन उपाध्याय, अमृत लाल वेगड़, संतोष चौबे, सुभाष चंद्र लखेड़ा, हरीश गोयल, डा. अरविंद मिश्र, डा. अरविंद दुबे, मनीष मोहन गोरे, कल्पना कुलश्रेष्ठ, जीशान हैदर जैदी, जाकिर अली, अर्शिया अली, विजय चितौरी, सनोज कुमार और इरफान ह्यूमन की कहानियां संकलित हैं। संग्रह की भूमिका देवेंद्र मेवाड़ी ने लिखी है जिसमें विज्ञान कथाओं के इतिहास से लेकर वैश्विक स्तर पर इन कथाओं के विकास और हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के संपूर्ण परिदृश्य पर प्रकाश डाला गया है। इससे पूर्व श्री इरफान ह्यूमन द्वारा निर्देशित तथा निर्मित फिल्म ‘एलियन’ दिखाई गई।

इस अवसर पर मौजूद विज्ञान कथाकारों ने विज्ञान कथा लेखन की समस्याओं, संभावनाओं और चुनौतियों पर अपनी बातें रखीं। चौबे जी ने आश्वासन दिया कि वे साहित्यकारों और विज्ञान कथाकारों को आपस में विमर्श करने के लिए एक मंच पर लाने का प्रयास करेंगे। साथ ही पाठ्यक्रम में विज्ञान कथाएं शामिल करने और इस विधा को प्रोत्साहन करने की दिशा में भी कदम उठाएंगे।

IMG-20170702-WA0012सी. एस. हाउस के पास मैंने रवि से कहा, “मित्र चलो, थोड़ी देर हम लोग बचपन में लौट जाते हैं। मुझे यहां उतार दीजिए।” बाहर रिमझिम बूंदें बरस रही थीं। मैंने पहले ढलान पर भारत भवन की ओर उड़ान भरी। ऊपर आते दो युवकों ने मुस्कराते हुए मेरी ओर देख कर कहा, “गाड़ियां आ रही हैं।” मैं भी मुस्कराया और चलता रहा। फिर ऊपर आकर देखा फोटो लेने की जिम्मेदारी नन्हीं मुस्कान ने संभाली हुई है। ‘श्यामला हिल्स और पेस्टल कलर यादें’ में जो स्मृति बिंब है, प्रकृति ने आज उसे उसी तरह रीक्रिएट कर दिया था। वही हरे-भरे पेड़, बदली भरा आसमान, बरसती बूंदें! मैंने दोनों पंख फैलाए और पालीटैक्निक चौराहे की ओर उड़ चला।

स्मृति बिंब से लौट कर रवि की गाड़ी में बैठा। विशाल ताल के किनारे खड़े होकर उस पार श्यामला हिल्स की हरियाली को देखा। ताल में लहरें अठखेलियां कर रही थीं और इठलाती हवा आसपास पेड़ों से सरगोशियां कर रही थी। कहीं-कहीं गुलमोहर मुस्करा रहे थे। उस खुशनुमा माहौल में बातें करते-करते हम छह बजे राजा भोज हवाई अड्डे पर पहुंच गए। वहां रवि और मुस्कान से विदा ली। आठ पैंतीस बजे जेट की उड़ान से दिल्ली को रवाना होना था लेकिन वह लौह पंछी देर में आया और उसने रात 10 बजे बाद उड़ान भरी।

रात में नीचे धरती पर शहर भोपाल दीपावली की रोशनियों की तरह जगमगा रहा था।

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