वंडर रूम के आश्चर्य लोक में

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खरगोश की मांद में से भीतर जाते हुए जैसे एक सफेद खरगोश को देखते-देखते लेविस कैरोल की ‘एलिस इन वंडरलैंड’ की एलिस अचानक एक बड़े हाल में पहुंच गई थी, वैसे ही झमाझम बारिश में आटो से उतर कर मैं भी दिल्ली में जवाहर भवन के दरवाजे पर पहुंचा। वहां मुझे एक आदमी दिखा जिससे मैंने ‘वंडररूम’ का पता पूछा। मुझे लगा वह आदमी उस सफेद खरगोश की तरह है जिसे एलिस ने देखा था। फिर मैं भी एलिस की तरह एक लंबे गलियारे में चलता रहा, चलता रहा। भीतर वहां भी ‘एलिस इन वंडरलैंड’ की तरह दरवाजे ही दरवाजे थे! लेकिन, वे दरवाजे छोटे-बड़े नहीं बल्कि बराबर थे। तभी मुझे बच्चों के चहकने की आवाज सुनाई दी। मैं चुपचाप उस ओर आगे बढ़ा। वहां कांच के बड़े से दरवाजे पर लिखा था- वंडररूम!

वह तो सचमुच वंडररूम ही था! सामने एक पेड़। छोटी-छोटी रंगीन कुर्सियां और दीवारों पर बच्चों के बनाए कई तरह के रंग-बिरंगे चित्र! मैंने धीरे से भीतर झांका। वहां पके हुए केले रखे थे। मैं चौंका, अरे कहीं ‘एलिस इन वंडरलैंड’ की तरह इनके पास भी तो बोतल पर ‘ड्रिंक मी’ और केक पर ‘ईट मी’ लिखकर नहीं रखा है? ना बाबा ना, मैं कुछ पीकर सिकुड़ते-सिकुड़ते छोटा नहीं होना चाहता। एलिस ने तो बोतल पर लिखा ‘ड्रिंक मी’ पढ़ कर उसे पी लिया था और वह सिकुड़ कर छोटी-सी हो गई थी।

मैं पलटा तो देखा प्रतुल और दो बच्चे एक पत्रिका में छपी बाल कविता पढ़ रहे थे, “चूं चूं चूं, चूं चूं चूं! मां बतलाओ बादल क्या होता है?”

उन्हें मेरे आने का पता ही नहीं लगा। तो, मैंने भी प्रतुल की आवाज की नकल की- चूं चूं चूं, चूं चूं चूं! उन्होंने चौंक कर मेरी ओर देखा और ठीक समय पर आया देख कर खुश हो गए। मैंने उनसे बातें कीं। बारिश के बावजूद हाल में बच्चे आते चले जा रहे थे।

प्रतुल ने मुझे बताया, यह वंडररूम है। यहां बच्चे तरह-तरह की गतिविधियां करते हैं। तभी प्रतुल ने पूछा, ”आप चाय पीएंगे?” मैं तो सुनकर चौंक ही गया। फिर सोचा- चाय से तो नहीं सिकुड़ सकता। इसलिए कहा, “हां, जरूर पीवूंगा।”

फिर वे हाथों की कसरत के साथ-साथ बच्चों को कविता सुनाने लगे- चूं चूं चूं, चूं चूं चूं! बच्चे उनके सुर में सुर मिला कर कविता गाने लगे। कविता पूरी हुई तो उन्होंने बच्चों से मेरा परिचय कराया। मुझे कहानी सुनानी थी, किस्सागोई करनी थी। इसलिए मैंने पहले बातों-बातों में यह पता किया कि बच्चों को कैसी कहानी पसंद है? कुछ बच्चों ने कहा, “बंदर की!” कुछ ने कहा, “कामिक्स की!” कुछ बच्चे बोले, “भूतों की!”

मैंने उनसे पूछा, “अच्छा दोस्तो बताओ, भूत किस-किस ने देखा है?” दो बच्चों ने हाथ खड़ा किया। मैं चौंका। पूछा, “कहां देखा?”

एक ने कहा, “टी. वी. में!” दूसरे ने कहा ‘फिल्म में!’ टी.वी. और फिल्म का बच्चों पर असर साफ दिखाई दे रहा था। भूतों की काल्पनिक कहानी सुन कर या दिखा कर हम बच्चों के मन में बचपन से ही कितना डर भर देने का गंभीर अपराध कर रहे हैं। मैंने उन्हें समझाया, “दोस्तो, भूत आज तक किसी ने नहीं देखा है। इनकी कहानियां बस तुम्हें डराने के लिए सुनाई जाती हैं। मन में बैठा हुआ वह डर फिर कभी नहीं जाता। इसलिए भूतों की कहानियां झूठी कहानियां हैं क्योंकि भूत होते ही नहीं। इन कहानियों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।”

DSCN3432 blogफिर मैंने उस छोटी-सी, पांच साल की बच्ची सरिथा की कहानी सुनाई जो उसने खुद बनाई थी। इस कहानी का पता विज्ञान लेखक श्री बिमान बसु से लगा। वह बच्ची चैन्नई के एक बड़े नामी स्कूल में अपनी मम्मी के साथ आई थी, यू.के.जी. कक्षा में एडमिशन के लिए। प्रिंसिपल ने जब उससे कोई कहानी सुनाने को कहा तो उसने उन्हें अपनी बनाई हुई कहानी सुनाई।

प्रिंसिपल ने सरिथा से पूछा, “यह अक्षय कहां से आ गया? कौन है यह?” सरिथा ने कहा, “अक्षय मेरा दोस्त है। यह मेरी कहानी है, मैं जिसे चाहूं, बुला सकती हूं।” कहानी आगे बढ़ती है। सीता को लेकर हनुमान, स्पाइडरमैन और हल्क चैन्नई के वेलेचरी बस स्टाप पर पहुंचते हैं।

“वेलेचरी बस स्टाप पर क्यों?” प्रिंसिपल ने पूछा?

“क्योंकि वे रास्ता भूल गए थे,” सरिथा ने कहा।

“तो फिर उन्होंने क्या किया?”

IMG_9862 blog“हल्क ने अपनी दोस्त डोरा डाल को बुला लिया।”

“उसे क्यों?”

“क्योंकि वह सीता के घर का रास्ता जानती थी। वह उन्हें वेलेचरी वीनस कालोनी ले गई क्योंकि सीता वहीं रहती थी,” सरिथा ने कहा, “और कहानी खतम!”

फिर उसने प्रिंसिपल से पूछा, “जानती हैं आप, सीता कौन है?”

प्रिंसिपल ने आश्चर्य से उसकी ओर देख कर पूछा- “कौन?”

“मैं, सीता मैं हूं,” कह कर सरिथा ने सब को चौंका दिया।

दोस्तो, प्रिंसिपल ने खुश होकर सरिथा को गोद में उठा लिया। बाज़ार से एक डोरा डाल मंगा कर प्यार से सरिथा को दी और उसका एडमिशन हो गया।

देखो दोस्तो, हम सबने राम, सीता, हनुमान और रावण की कहानी सुनी है। न जाने कब से यह कहानी सुन रहे हैं। लेकिन, नन्ही सरिथा ने कुछ अलग सोचा। कामिक्स के चरित्र लाकर कहानी में नया रंग भर दिया। दुनिया में वे लोग बड़ा काम करते हैं जो सरिथा की तरह कुछ अलग सोचते हैं। तुम लोग भी जीवन में कुछ नया, कुछ अलग सोचने की कोशिश करना।

फिर मैंने उन्हें टाइम मशीन से अतीत और भविष्य की सैर कराई। वे समझ गए कि हम किस तरह प्रकृति को नष्ट कर रहे हैं। उन्होंने कहा, वे एक हरी-भरी दुनिया चाहते हैं, वे जीव-जंतुओं से प्यार करना चाहते हैं।

तब मैंने उनको जीवन का गीत सुनाया जिसे उन्होंने मेरे सुर में सुर मिला कर गाया।

मैंने बच्चों से विदा ली। रमेश बिष्ट जी, वैभव, राजू और निदेशक नलिन जी से मिला जो इन बच्चों के सपनों में रंग भर रहे हैं। बारिश रूक चुकी थी और मैं करीब दो घंटे बच्चों के साथ बिता कर वंडररूम के आश्चर्यलोक से फिर मोटरकारों के कोलाहल भरे शहर दिल्ली में लौट आया।

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