भीमताल में ताल और बाल साहित्य संसार

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दिल्ली सुबह तप रही थी, जब मैंने भीमताल जाने के लिए काठगोदाम शताब्दी ट्रेन में शरण ली। रास्ते भर सूरज आग बरसाता रहा, लेकिन शताब्दी हमें लेकर पहाड़ों की ओर भागती रही। उसने हल्द्वानी में मुझे उतारा और काठगोदाम जाकर दम लिया। जगह नजदीक हो तो वहां तक पहुंचने के लिए वाहन मिलना उतना ही कठिन होता है। हल्द्वानी स्टेशन पर मौजूद टैक्सी चालकों ने साफ कह दिया कि भीमताल तक सीधे जाने वाली कोई टैक्सी यहां नहीं मिलेगी। हां, पूरी टैक्सी लेनी हो तो चलेंगे। पूरी टैक्सी? रेट सुन कर करंट लगा। हिंदुस्तान में हर आदमी न इतना कमाता है, और न सपने में ही वह इतना पैसा आधे-एक घंटे की दूरी के लिए दे सकता है। उनकी राय पर सौ रूपए में आटो लेकर तिकोनिया चैराहे के टैक्सी स्टैंड पहुंचा जहां श्री बोरा तीन सौ रूपए में अपनी शेयर्ड टैक्सी में ले जाने को तैयार हुए। बोले, अल्मोड़ा जा रहा हूं, रास्ते में आपको भीमताल में उतार दूंगा। वही एक रास्ता था, इसलिए उनकी टैक्सी में बैठ गया। भीमताल में वे तल्लीताल चौराहे पर उतार कर चले गए। वहां से पेड़ों के पार भीमताल का शांत लेटा ताल दिखाई दे रहा था जिसे मैंने भर आंख देखा और मन ही मन उससे कहा- आता हूं मित्र, कुछ देर में आता हूं।

मुझे बच्चों की पत्रिका ‘बालप्रहरी’ और बाल साहित्य संस्थान, अल्मोड़ा ने राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में भाग लेने के लिए भीमताल बुलाया था। साथ ही तीन स्कूलों के बच्चों को विज्ञान की कहानियां भी सुनानी थीं। इससे मेरा उत्साह दुगुना हो गया था। ताल के निकट ही मेरे लिए मेरे अनुरोध पर एकांत में एक कमरे का भी इंतजाम हो गया। मैंने उस एकांत में प्रवेश किया और अपना भारी रकसैक उतार कर नहाया, पेट को दाल-चावल खिलाया और कुछ देर विश्राम किया। फिर उठ कर सीधा ताल से मिलने चल पड़ा। दोपहर काफी देर पहले ढल चुकी थी।

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मैं एक शांत, एकांत जगह पर अकेला खड़ा होकर ताल को गौर से देख ही रहा था कि मुझे लगा वह बोल रहा है। आवाज आई, “वर्षों बाद आए?”

मैंने चौंक कर पूछा, “कौन?”

“क्यों टैक्सी से उतरते ही तो कह रहे थे- आता हूं मित्र- वही मित्र हूं।”

मैं समझ गया, ताल ही है। मैंने कहा, “हां, वर्षों बाद कहां मित्र, आधी सदी से भी अधिक समय गुजर गया। दो साल पहले थोड़ी देर के लिए यहां आया तो था लेकिन तुमसे बात नहीं हो पाई थी। सच तो यह है कि मैं 54 वर्ष पहले मिला था तुमसे, सन् 1963-64 में।”

ताल बोला, “याद है मुझे। मेरे द्वीप के सामने गहरे पानी में उतर गए थे तुम और तुम्हारा दोस्त नवीन, तैरने के लिए। वहां बहुत गहरा पानी था। वह तो अच्छा हुआ, एक भले मानुष ने तुम दोनों को डांट कर बाहर बुला लिया था।”

“हां, ठीक कह रहे हो। अन्यथा, न जाने क्या होता उस दिन। हम दोनों तैरने में नौसिखिए ही थे तब। लेकिन, तब तो तुम पानी से डबाडब भरे रहते थे?”

लंबी सांस लेकर ताल ने कहा, “हां…वे भी दिन थे। समय पर बरसात होती थी। मेरे भीतर से स्रोतों से भी पानी खूब फूटता था। उतने पानी से क्या करता मैं? डाट के गेट खोल कर नीचे काठगोदाम-हल्द्वानी तक मेरा छल-छल पानी जाता था। वहां पीने और सिंचाई के काम आता था….”

“अब तो वैसे ही पानी कम दिख रहा है। मल्लीताल में तो काफी भीतर तक मलबा और टीले दिखने लगे हैं,” मैंने कहा।

ताल बोला, “दिखेंगे ही। जरा मेरे चारों ओर देखो। क्या-क्या बना दिया है? मकान ही मकान, होटल और रिजार्ट बनते जा रहे हैं। उनका गंदा पानी मेरे भीतर भर रहा है। जंगल काट दिया है। जमीन छिल दी गई है। उसे बुरी तरह खोदा जा रहा है। कहां जाएगा वह मलबा और मिट्टी? मेरे भीतर ही जमा होता जा रहा है वह सब। उससे मेरे पानी के स्रोत बंद होते जा रहे हैं। तली में गाद बैठती जा रही है।

“सच कह रहे हो मित्र,” मैंने कहा, मैंने शोध छात्रा शिखा पंवार के उस शोध कार्य के बारे में सुना है जिसमें उसने पता लगाया है कि पिछले पच्चीस वर्षों में तुम्हारा पानी दस मीटर तक कम हो गया है।”

DSCN3130“सच पूछो तो बीमार हूं मैं। यही हाल रहा तो एक दिन चारों तरफ एक से एक आलीशान मकान तो रहेंगे, उनमें बजते बाजे-गाजों पर लोग झूम-झूम कर नाच-कूद भी रहे होंगे, लेकिन मित्र तब मैं न रहूंगा, न मेरे भीतर भरी सैकड़ों महाशीर मछलियां रहेंगी, न ये हरे-भरे पेड़-पौधे और न ये चहचहाते परिंदे,” बड़ी पीड़ा के साथ ताल ने कहा।

“मित्र तुमने तो मुझे बशीर बद्र का एक शेर याद दिला दिया है। लो, तुम भी सुनो:

अब यहां प्यासे परिंदे आएंगे किसके लिए

झील को सूखे हुए कितने ज़माने हो गए।

लेकिन, दुआ करता हूं दोस्त कि ऐसा कभी न हो।”

“लेकिन, यह तो तभी संभव हो पाएगा, जब इन तमाम बढ़ते निर्माण के कामों पर लगाम लगे, हरियाली बढ़े और होटलों-रिजार्टों से निकला कचरा और गंदा पानी मुझमें न डाला जाए।” तभी उसे खांसी उठी और वह थोड़ा दम लेकर बोला, “मेरे पानी में आक्सीजन इतनी कम हो गई है कि मेरा भी दम घुटने लगा है और मेरी शरण में जी रही मछलियों और अन्य जीवों का भी,” ताल तकलीफ के साथ बोला।

मैं उम्रदराज बकाइन, कौल और सिल्वर ओक के पेड़ों के नीचे से होकर ‘बाल प्रहरी’ के प्रधान संपादक श्री उदय किरौला और अन्य साथियों के संग रात के भोजन के लिए जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान यानी डायट के भोजनालय में पहुंचा। थका-मांदा था, खाना खाकर जल्दी ही सो गया।

सुबह पांच बजे का अलार्म लगाया था लेकिन ठीक साढ़े चार बजे ही बगल में बकाइन के ऊंचे, घने पेड़ पर बैठी एक चिड़िया इतनी मधुर आवाज में प्रभाती गाने लगी कि उसे ही सुनते रहने का मन करने लगा। आज हालांकि बाल साहित्य संगोष्ठी का पहला दिन था, लेकिन मुझे स्कूलों में जाकर दिन भर बच्चों को विज्ञान की बातें और कहानियां सुनानी थीं। किरौला जी ने बता दिया था कि ऊपर पहाड़ पर बसे भवाली से तरूण भाई आएंगे और आपको स्कूलों में बच्चों के पास ले जाएंगे।

DSCN0002युवा, उत्साही तरूण भाई अपने मित्र के साथ आए और मुझे भवाली की एक चोटी पर महर्षि विद्यामंदिर के विद्यार्थियों के पास ले गए। हल्की बारिश हो रही थी। बच्चों और प्रधानाचार्या श्रीमती साधना जोशी के साथ उसी बारिश में हमने अंतरिक्ष की उड़ान भरी और पूरे सौरमंडल की सैर करके धरती पर लौट आए। भावातीत ध्यान में दीक्षा पाए उन बच्चों ने अपने मन की आंखों से सौरमंडल को बड़ी शिद्दत से देखा और पाया कि पूरे सौरमंडल में हमारी प्यारी और निराली धरती जैसा कोई ग्रह नहीं है।

DSCN0001 (3)हल्की बूंदाबादी में बाहर निकले और चलते-चलते बाज़ार के पार दूसरी पहाड़ी पर बांज वन में चढ़ाई चढ़ कर भवाली के ही जी.बी.पंत इंटर कालेज में पहुंचे। वहां पर्यावरण का संदेश देने के लिए विद्यार्थियों को ‘लौटे हुए मुसाफिर’ कहानी सुनाई। मैंने उन्हें टाइम मशीन में अतीत और भविष्य की सैर कराई। उन्होंने भविष्य में जाकर पचास साल बाद का पर्यावरण देखा। वहां से नीचे उतरे और तरूण भाई के मित्र के साथ भीमताल के लेक इंटरनेशनल स्कूल से पहुंचे।

लेक इंटरनेशनल स्कूल के प्रधानाचार्य श्री एस. एस. नेगी और लगभग डेढ़ सौ बच्चे विज्ञान की कहानी सुनने के लिए हमारा इंतजार कर रहे थे। बच्चों से बातचीत करते-करते पता लगा, वे सौरमंडल की रोमांचक सैर के लिए तैयार हैं। तारों की छांव में गीत गाते-गाते हम सूरज के पास पहुंच गए और आठों ग्रहों, सात बौने ग्रहों, क्षुद्रग्रहों, उल्काओं और धूमकेतु की छटा देखने के बाद अपने ग्रह पृथ्वी पर लौट आए। बच्चों ने मेरे सुर में सुर मिला कर जीवन का गीत गाया।

DSCN0001 (2)आज का पूरा दिन किस्सागोई में बीता। वहां से विदा होकर जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान पहुंचा, बाल साहित्यकार साथियों से मिला और रात का भोजन करने के बाद अपने कमरे के एकांत में लौट आया।

सुबह फिर उसी चिड़िया ने प्रभाती गाकर जगाया। आज बाल साहित्य संगोष्ठी का दूसरा दिन था बच्चों की काव्य गोष्ठी के बाद बाल साहित्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विषय पर मेरा मुख्य व्याख्यान था। इस सत्र की शुरूआत श्री उदय किरौला और उनके साथियों ने ‘ज्ञान-विज्ञान की मशाल’ गीत गाकर की। मैंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बारे में बताते हुए बाल साहित्य में इसकी जरूरत पर प्रकाश डाला। दिन में बच्चे और कहानी तथा बच्चे और कविता पर चर्चा के बाद रात को लेक इंटरनेशनल स्कूल के सभागार में दो-ढाई सौ बच्चों की मौजूदगी में बाल कविताएं सुनाई गई। स्कूल ने सभी अतिथियों के लिए रात्रि भोज का भी आयोजन किया।

DSCN3221संगोष्ठी का तीसरा दिन बाल साहित्य और इलैक्ट्रानिक मीडिया पर चर्चा के बाद सम्मान समारोह का साक्षी रहा। समारोह में खटीमा फाइबर लिमिटेड के प्रबंध निदेशक डा. आर.सी.रस्तोगी ने बाल साहित्यकारों को संबोधित करते हुए उन्हें समाज के लिए समर्पित रूप से काम करने की प्रेरणा दी। इस मौके पर देवेंद्र मेवाड़ी और बानो सरताज को वर्ष 2016 तथा 2017 के लिए राष्ट्रबंधु बाल साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही बाल साहित्यकार श्री लायक राम मानव, आद्याप्रसाद सिंह ‘प्रदीप’, रजनी सिंह, प्रबोध कुमार गोविल, अश्वनी कुमार पाठक, चंद्रप्रकाश शर्मा ‘पटसारिया’, रेनू सैनी, केशव प्रसाद पांडेय ‘वृहद’ और अशोक कुमार गुप्त ‘अशोक’ और डा. आर पी. सारस्वत को बाल साहित्य सम्मान 2017 से विभूषित किया गया।

बाल साहित्य संसार में बिताए ये चार दिन मेरी यादों का हिस्सा बन गए हैं।

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