यहां एक पेड़ था

26March11 257fa
यहां एक पेड़ था, वो क्या हुआ?
महानगर दिल्ली में आया था तो उस चौराहे पर पीपल का एक बड़ा पेड़ था। उसी इलाके में रहता था, इसलिए आते-जाते उससे बात-मुलाकात हो जाती थी। दुआ-सलाम कर लेता था। इतने बड़े महानगर में कंक्रीट के घने जंगल में जब उसे पहली बार देखा और प्रणाम किया तो लगा इस अनजान शहर में कम से कम उस पीपल की हरी शाखें तो दस्ते-दुआ की तरह सिर पर मौजूद हैं।
मैं अक्सर उसकी छांव में बैठता और हम दोनों मन ही मन बातें करते। उसकी शीतल छांव में लंबी सांस लेकर उसकी दी हुई आक्सीजन जमकर अपने फेफड़ों में भरता था। उसे मेरा साथ पसंद था इसलिए कि उसके आसपास से दिन भर में हजारों लोग निकलते तो जरूर थे लेकिन उससे गुफ्तगू करने का वक्त किसी के पास नहीं था। यह देख कर वह अक्सर उदास भी हो जाता था।
उसे वे पुराने दिन याद हो आते, जब वहां पर वह पक्की डामर-कंक्रीट की यह रोड नहीं थी बल्कि मिट्टी-पत्थरों की कच्ची सड़क थी। उस पर लोग पैदल चलते या इक्के-तांगे व रिक्शे में निकलते थे। थके हुए राहगीर उसकी शीतल छांव में सुस्ताते। रिमझिम वर्षा में जब उसकी पत्ती-पत्ती नाच उठती, उसका रोम-रोम खुशी मना रहा होता, तब कई लोग उसके नीचे बारिश रूकने का इंतजार करते रहते।
सुबह और शाम उस पर न जाने कितनी चिड़ियां चहचहाया करती थीं। पीपल उनके गीत सुन कर खुश होता। जब हवा चलती तो उसकी पत्तियां भी सरसराते हुए गुनगुनाने लगतीं। कई बार तो उसकी सैकड़ों पत्तियां खुशी में तालियां तक बजाती थीं। मैंने सुनी थी उसकी पत्तियों की वे तालियां।
एक बार मैंने उससे मन ही मन कहा, “आप तो अपनी पत्तियों में हमारे लिए सांसें रचते हो। आक्सीजन बना कर हवा में बिखेरते हो ताकि हर जीव उस प्राणवायु में सांस ले सके।”
पीपल ने कहा, “तो क्या हुआ? तुम लोग भी तो मुझसे इतना प्यार करते हो। मेरे लिए तुम सभी मेरे अपने हो- तुम यानी आदमी, चिड़ियां, कीट-पतंगे, गिलहरियां, सभी। मेरी शाखों और पत्तियों में कितना बड़ा संसार बसता है तमाम छोटे-बड़े जीवों का। मैं तो अपने-आप को बहुत भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे तुम सब का साथ मिला है।”
तबादला होने पर मैं वहां से दूसरे शहर चला गया था। एक अरसे बाद फिर वहां उससे मिलने पहुंचा तो देख कर दिल धक् से रह गया। वह पेड़ वहां नहीं था। उस जगह एक ऊंचा फ्लाइओवर बन गया था जिसके नीचे से चारों दिशाओं में हजारों-हजार कारें दौड़ रही थीं। उसके ऊपर से भी कारों का कारवां अबाध गति से जहरीला धुवां छोड़ता हुआ आगे बढ़ रहा था। मोटर गाड़ियों के हार्न का कर्कश शोर कानों के पर्दे फाड़ रहा था। अथाह गर्मी थी। आसपास कोई छांव नहीं थी। दस्ते-दुआ का कोई हरा हाथ नहीं था वहां। हांफते हुए लोग चिलचिलाती गर्मी में बदहवास होकर चारों ओर देखते लेकिन दूर-दूर तक शीतल छांव दिखाई नहीं देती थी।
हर शख्स उस ओर देख कर जैसे सोचता था- यहंा एक पेड़ था, वो क्या हुआ? क्या करता, मैं भी उस पेड़ की स्मृति को नमन कर इस निश्चय के साथ लौट आया कि उसकी स्मृति में कहीं एक पेड़ जरूर लगाऊंगा।

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