गेयटी थिएटर में आलू

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शिमला की ऐतिहासिक विरासत और गाथिक वास्तुकला का अनूठा उदाहरण है गेयटी थिएटर। ऐसा अनूठा थिएटर जिसमें खूबसूरत मेहराब हैं, ऊंची मेहराबदार गुंबदाकार छत है, पैपीयर मैशे के पैनल हैं, अनोखा पर्दा और वायरलैस आडियो सिस्टम ऐसा कि पूरे थिएटर में बैठे एक-एक दर्शक को मंच पर बोला गया एक-एक शब्द साफ सुनाई दे। प्रख्यात वास्तुकार हेनरी इर्विन का डिजायन किया गया यह गाॅथिक थिएटर आज से 130 वर्ष पहले 30 मई 1887 को शुरू हुआ था और आज भी यह नाटकों, गीत-संगीत, नृत्य और लोकनृत्यों की प्रस्तुतियों से गुलजार है। इस ऐतिहासिक थिएटर में रूडयार्ड किपलिंग, के एल. सहगल और पृथ्वीराज कपूर जैसे लेखक, गायक और अभिनेता अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं।

ऐसे मंच पर कदम रखने से पहले मैंने विनीत भाव से उसे प्रणाम किया। यह सौभाग्य ही था कि हमें संपादक द्विजेंद्र कुमार की अगवाई में नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने इस थिएटर में बच्चों को कहानी सुनाने और कहानी लिखने के लिए पे्ररित करने का मौका दिया। हम, यानी अनिल सवेरा, रजनीकांत शुक्ल, श्रीमती रीता सिंह और मैं। पता लगा, श्रोता बच्चे भी शिमला के एक ऐतिहासिक स्कूल पोर्टमोर गवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल से हैं। इसे उन्नीसवीं सदी में ‘अर्ल आफ पोर्टमोर’ के बेटे, स्काटलैंड निवासी कर्नल थामस डेविड कोलीइयर ने स्थापित किया था। आजादी के बाद सन् 1948 में इसे पोर्टमोर गवर्नमेंट हाईस्कूल और फिर सन् 1959 में गवर्नमेंट गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल का दर्जा दे दिया गया।

थिएटर में स्कूल की सौ-सवा सौ छात्राएं कहानी सुनने को उत्सुक थीं। उन्हें श्रीमती रीता सिंह ने लड़कियों से जुड़ी जिंदगी की सच्ची कहानी सुनाई, रजनीकांत शुक्ल ने हिमाचल की बहादुर बेटी शिल्पा की बहादुरी का कारनामा सुनाया और अनिल सवेरा ने सांप, नेवला, कछुवा और बगुले की सीख भरी कहानी कही। और मैं? दिल्ली से चलते समय मैं सोच रहा था, जिस मंच पर नामी-गिरामी अभिनेता और कलाकार अपनी कला दिखा चुके हों, जिस मंच पर शैक्सपियर के किंग लीयर, जूलियस सीजर, आथेलो और मैकबैथ जैसे नाटक खेले गए हों, वहां मैं क्या सुनाऊंगा?

सोच ही रहा था कि बगल की टोकरी से आवाज आई, “क्यों, मेरी कहानी सुना सकते हो। आखिर शिमला और हिमाचल प्रदेश से मेरा भी तो गहरा रिश्ता है।”

download“तुम कौन?” कह कर टोकरी की ओर देखा तो अपनी छोटी-छोटी आंखों से मुझे ताक रहा था- आलू! मैंने मन ही मन सोचा, ‘वाह दोस्त, बात तो तुम्हारी ठीक है। बचपन में खूब शिमला आलू, शिमला आलू सुनता था। लोग बोने के लिए तुम्हारा बीज लाते थे। और, आज हिमाचल में तुम्हारी भरपूर खेती तो होती ही है, तुम पर अनुसंधान करने के लिए केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान भी पास ही कुफरी में है। तो तय रहा- वहां मैं बच्चों को इसी की कहानी सुनाऊंगा।’

फिर उससे कहा, “मैं वहां तुम्हारी कहानी सुनाऊंगा। चलोगे साथ?”

आलू कचालू बेटे कहां गए थे,

बंदर की झोपड़ी में सो रहे थे!….

सभी बच्चों ने मेरे साथ एक सुर में यह गीत गाया। मेरे हाथ में बैठा आलू भी खुश हो गया। मुझसे धीरे से बोला, “अब सुना दो मेरी कहानी।”

तब मैंने उसकी कहानी सुनाई, “प्यारे बच्चो, आज आलू को भला कौन नहीं जानता? लेकिन सन् 1492 से पहले तो इसे दक्षिण अमेरिका के रेड इंडियनों के अलावा दुनिया में कोई भी नहीं जानता था। वह तो जब सन् 1492 में कोलंबस वहां पहुंचा तो यह देख कर हैरान रह गया कि यह फसल तो जमीन के भीतर होती है!

DSCN2684मगर प्यारे बच्चों, पेरू और बोलेविया में एंडीज की पहाड़ियों में रेड इंडियन इसे हजारों साल पहले से उगा रहे थे। दुख की बात यह है दोस्तो कि उनका पता लगते ही स्पेन की सेना ने उन पर बुरी तरह हमला कर दिया। सब कुछ तहस-नहस कर दिया। उनके सेनापति फ्रैंसिस्को पिजारो का एक पादरी इस नई, अजीब-सी फसल के कंद यानी ‘आलू’ स्पेन ले आया।

अब एक मजेदार बात सुनो।… वे शकरकंद को बटाटा कहते थे। इसलिए कंद की इस नई फसल को वे ‘पटाटा’ कहने लगे! फिर तो पटाटा फैल गया पूरे यूरोप में……इंग्लैंड, आयरलैंड, स्काटलैंड, जर्मनी, फ्रांस, सभी जगह। फ्रांस वाले इसे ‘पोमे-द-तेरे’ यानी मिट्टी का सेब कहने लगे। लेकिन, ऐसी बात नहीं कि आलू को लोगों ने एकदम मुंह लगा लिया। बल्कि, कई लोगों ने तो इसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया कि न इसमें स्वाद है, न खुशबू, न बाइबिल में इसका जिक्र है। तो, हम क्यों खाए इसे?

लेकिन, दोस्तो भला हो प्रूसिया के सम्राट फ्रेडरिक द ग्रेट का’। उसने आलू के मुफ्त बीज बटवाएं और आदेश दे दिया- आलू उगाओ। जो नहीं उगाएगा, उसके नाक-कान काट लिए जाएंगे! फिर भी लोगों की जुबान पर इसका स्वाद नहीं चढ़ा। स्वाद चढ़ा फ्रांस के सैनिक पारमेंतियर की जुबान पर। उसे लड़ाई के दौरान जर्मन फौज ने पकड़ कर युद्धबंदी बना लिया था। और, जेल में उसे खाने को दिया सिर्फ आलू!

अच्छा, बताओ, आलू कितना पसंद है तुम्हें? भई मुझे तो बहुत पसंद था, बचपन में भी और अब भी है। खेतों में हम खूब आलू उगाते थे। मुझे गर्म दूध और दही के साथ उबला आलू खाने में बड़ा आनंद आता था। फिर, राजा-रानी की तो बात ही कुछ और है। अब देखो, फ्रांस के राजा लुई चौदहवें को और उसकी रानी एंतोइने को भी आलू बहुत पसंद था। उनके यहां तो आलू की दावत खाने नामचीन वैज्ञानिक बैंजामिन फ्रैंकलिन और लेवोइजिए तक आते थे। राजा अपने ओवरकोट के बटन होल में और रानी अपने जूड़े में आलू के प्यारे बैंगनी-गुलाबी फूल लगाने लगी तो उनकी देखा-देखी तमाम लोग लगाने लगे और आलू उगाने लगे।

6-The-Potato-Eaters-grey-Vincent-van-Goghअरे हां, महान चित्रकार वान गाग ने नीदरलैंड में 1895 में ‘आलू खाने वाले लोग’ नामक प्रसिद्ध चित्र बनाया था। किताबों में देखना उसे। कई लोग आलू को बहुत सस्ता समझते हैं। लेकिन, कभी आलू के भी दिन फिरे थे। यह सोने से भी महंगा हो गया था। जिस साल वान गाग ने ‘आलू खाने वाले लोग’ चित्र बनाया था, उसके अगले साल 1896 में कनाडा के बर्फीले यूकोन इलाके में लोग एक-एक आलू को तोलकर उसके वजन के बराबर सोने में बेचने लगे। वहां एक नदी में सोने के कण बटोरने लाख लोग पहुंच गए मगर वहां खाने के लिए आलू के अलावा कुछ भी नहीं था। यह घटना ‘क्लोंनडाइक गोल्ड रश’ कहलाती है।

आलू, कचालू बेटे कहां गए थे,

बंदर की झोपड़ी में सो रहे थे।

गेयटी थिएटर में अगले दिन हमने लगभग डेढ़ सौ बच्चों को कहानी लिखने की कला समझाई। बच्चों को कहानी सुनाने और कहानी कला सिखाने का अवसर देने के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट का हार्दिक आभार।

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