खिल गया है सीता- अशोक

 

Sita-Ashok_(Saraca_asoca)_flowers_in_Kolkata_W_IMG_414611111

आज अचानक नारंगी-लाल रंग के खूबसूरत फूलों से लदे सीता-अशोक को देखा तो देखता ही रह गया। इसे हमारे देश का सबसे सुंदर वृक्ष यूं ही नहीं कहा गया है। पुष्पित सीता-अशोक को देख कर कोई भी इस बात पर विश्वास कर सकता है। फरवरी-मार्च में लंबी, हरी पत्तियों के बीच गुच्छों में जब इसके नारंगी-लाल फूल खिलते हैं तो इसकी शोभा देखते ही बनती है।
3082605766500aceadd89fb678900529सीता-अशोक के पुष्पित वृक्षों के सौंदर्य से मोहित होकर ही हमारे प्राचीन साहित्य और शिल्प में इन्हें सम्मानजनक स्थान मिला होगा। ईस्वी सन् शुरू होने से पहले शुंग काल और पहली से तीसरी सदी के कुषाण काल में ये फूल शिल्प में छा गए। उस काल की मूर्तियों में अशोक वृक्ष के नीचे खड़ी या इसके फूलों से भरी टहनी पकड़े यक्षिणी की मूर्तियां मिली हैं। भरहुत, बोध गया और सांची में भी अशोक वृक्ष के नीचे खड़ी यक्षणियां उत्कीर्ण की गई हैं।
अशोक के वृक्ष को उर्वरता का प्रतीक भी माना गया है। पौराणिक कथाओं में इसे कामदेव के पंचपुष्पी तूरीण का एक पुष्प माना गया है। अपने प्रसिद्ध निबंध ‘अशोक के फूल’ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं: “अशोक के फिर फूल आ गए हैं। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्पों के मनोहर स्तबकों में कैसा मोहन भाव है! बहुत सोच-समझकर कंदर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्पों को छोड़कर सिर्फ पाँच को ही अपने तूणीर में स्थान देने योग्य समझा था। एक यह अशोक ही है।” कहते हैं लुंबिनी में बुद्ध का जन्म भी सीता-अशोक के वृक्ष के नीचे ही हुआ था। इसलिए बौद्ध धर्म में यह एक पूज्य वृक्ष माना गया है। कहते तो यह भी हैं कि महावीर ने अपना प्रथम उपदेश सीता-अशोक के वृक्ष के नीचे ही बैठ कर दिया था। रामायण में वर्णित अशोक वाटिका को भी सीता-अशोक के कुंजों की वाटिका माना गया है। कालीदास ने अपने काव्य ‘ऋतु संहार’ और नाटकों में अशोक के वृक्ष का मनोहारी वर्णन किया है। किंवदंती है कि सीता के पदप्रहार से अशोक में फूल खिल गए थे। तब से यह विश्वास चल पड़ा कि युवतियों के पदप्रहार से सीता-अशोक में फूल खिल जाते हैं।
800px-Birth_of_Buddha_at_Lumbiniलेकिन, यह अशोक और सीता-अशोक का किस्सा क्या है? असल में आमतौर पर आजकल लोग एक दूसरे ही वृक्ष को असली अशोक समझते हैं जबकि हमारा अपना असली अशोक ‘सीता-अशोक’ है। वनस्पति विज्ञानी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। उन्होंने इन दोनों वृक्षों के नाम भी अलग-अलग रखे हैं। इमारतों के आसपास जो लंबे, लहरदार हरी पत्तियों वाले अशोक के वृक्ष लगाए जाते हैं, उन्हें वनस्पति विज्ञानी ‘पालीएल्थिया लोंगीफोलिया’ कहते हैं। यह दक्षिण भारत और श्रीलंका का वृक्ष है इसके शोभाकारी वृक्षों की शाखें भूमि की ओर झुकी होती हैं और उन पर लगी लंबी पत्तियां उन वृक्षों को जहाज के मस्तूल का रूप दे देती हैं। इसीलिए इसे मास्ट-ट्री भी कहा जाता है। इस अशोक पर हरे रंग के फूल आते हैं।
सीता-अशोक हमारा देशज वृक्ष है और भारत में प्राचीनकाल से उग रहा है। वनस्पति विज्ञानियों ने इसका नाम ‘सराका इंडिका’ रखा है। इंडिका का मतलब है मूल रूप से भारतीय। पहले तक इसे ‘जोनेशिया अशोका’ कहा जाता था। यह नाम अंग्रेजी शासन काल के एक अंग्रेज विद्वान सर विलियम जोंस के सम्मान में रखा गया था। बाद में इसे सराका इंडिका कर दिया गया। कभी यह वृक्ष भारत भर में पाया जाता था लेकिन धीरे-धीरे लोग इसे भूल गए और बाग-बगीचों, स्मारकों और इमारतों के आसपास दूसरा अशोक अधिक लगाया जाने लगा। बंगाल और असम की खासी पहाड़ियों में सीता-अशोक बहुतायत से उगता था। मुंबई के आसपास भी सीता-अशोक के वृक्ष काफी पाए जाते थे। इस वृक्ष की पत्तियां भी लंबी, लहरदार और झुकी हुई होती हैं।
संस्कृत में सीता-अशोक को अशोक कहा गया है। हिंदी, बंगला, मराठी, कन्नड़ और मलयालम में भी यह अशोक कहलाता है। गुजरात के लोग इसे अशोपल्लव कहते हैं, ओड़िसा के लोग अशोको, तमिलनाडु में अशोगम और तेलगु भाषी लोग अशोकामु कहते हैं। इससे भी पता लगता है कि यह लोक प्रचलित वृक्ष रहा है।
पिछली सदियों में भले ही हम अपने देश के इस सबसे सुंदर वृक्ष को भूल गए हों लेकिन अब हमें यह गलती दुहरानी नहीं चाहिए। घर के आसपास इस वृक्ष को लगा कर तो देखिए, वसंत आते ही इसके नारंगी-लाल फूलों के गुच्छे किस तरह आपका और अन्य लोगों का मन मोह लेते हैं! कुछ वर्ष पहले केंद्रीय भवन निर्माण संस्थान, रूड़की के परिसर में वरिष्ठ वैज्ञानिक यादवेंद्र पाडेण्य जी के साथ टहल रहा था कि अचानक नारंगी-लाल फूलों से लदे सीता-अशोक के वृक्ष ने हमारा मन मोह लिया था। फूल न खिले हों तो सीता-अशोक लीची की पेड़ों के तरह दिखाई देता है। इसकी पत्तियां भी लीची की तरह ही होती हैं। लेकिन, फूल खिलते ही जैसे पूरी फ़िज़ा में बहार आ जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *