फूलों की घाटी में

Valley-of-Flowers

एक दिन मैं और मेरी छोटी बहिन मीता टीवी देख रहे थे कि अचानक उसमें फूलों की घाटी पर प्रोग्राम आने लगा। हम दोनों बड़े मन से उस प्रोग्राम को देखने लगे। उसे देख कर हम तो चकित ही रह गए। इतनी सुंदर फूलों की घाटी है हमारे देश में, और हमने उसे अब तक नहीं देखा! बस, मैंने और मीता ने मन ही मन प्रोग्राम बना लिया कि गर्मियों की छुट्टियों में इस बार हमें फूलों की घाटी की सैर करनी है। इसके लिए मम्मी-पापा को मनाना जरूरी था। तो, एक दिन जब वे हमें परीक्षा की तैयारी जम कर करने की बात समझ रहे थे तो हमें भी उन्हें अपनी बात समझाने का मौका मिल गया।
मैंने कहा, “पापा-मम्मी, हम अपनी पढ़ाई पर पूरा जोर दे रहे हैं, आप चिंता मत कीजिए।“
“मयंक बेटे चिंता कैसे न करें? तुम्हारी हाईस्कूल की परीक्षा है और मीता का भी आठवीं में अच्छे अंकों से पास होना है,” पापा ने कहा।
तभी मीता पापा के गले लग कर बोली, “अच्छा, अगर हमने पूरी मेहनत से पढ़ कर परीक्षा दी और अच्छे अंक ले आए तो हमें क्या मिलेगा?”
“क्या मिलेगा? अरे अच्छे अंक और अच्छा स्थान मिल जाएगा,” मम्मी ने हंसते हुए कहा।
“वह तो हमारी मेहनत हुई, आप दोनों की ओर से भी तो कुछ मिलना चाहिए ना? मैंने बात को आगे बढ़ाया।
तब पापा खुश होकर बोले, “चलो ठीक है। बोलो, क्या चाहिए तुम्हें?“
बस, हमें इसी मौके का इंजतार था। मीता ने चहकते हुए कहा, “पहाड़ों की सैर!“
“अरे वाह, मैंने तो सोचा, न जाने क्या मांगोगे तुम लोग। तुम्हारी परीक्षाएं अच्छी हो गईं तो हम तुम्हें जरूर सैर पर ले चलेंगे,” मम्मी बोलीं।
“लेकिन सैर पर किस जगह जाएंगे, यह हम बताएंगे,“ मैंने कहा। हमारी बातचीत में मम्मी-पापा को भी आनंद आने लगा। पापा ने कहा, “चलो जगह भी तुम्हारी पसंद की होगी। अब बता तो दो, कौन-सी जगह जाना चाहोगे तुम लोग?“
“ऐसी सुंदर जगह जो पूरे विश्व में अपने तरह की अकेली जगह हो और कम से कम विश्व की धरोहर तो जरूर हो!“ मैंने कहा तो मीता हंसने लगी। मम्मी सोच में पड़ गईं कि ऐसी कौन-सी सुंदर जगह हो सकती है। फिर पूछने लगीं, “हमारे देश में या कहीं विदेश की तो बात नहीं कर रहे हो?“
मैंने कहा, “नहीं मम्मी, अपने देश की बात कर रहा हूं। यूनेस्को ने उस सुंदर जगह को विश्व धरोहर घोषित किया हुआ है। दुनिया भर से लोग वहां घूमने आते हैं।”
“मम्मी-पापा, एक सुराग दूं? बिल्कुल परीलोक है वह जगह। इसी धरती पर परीलोक!” मीता ने मुस्करा कर कहा।
ऐसी जगह और हमने अब तक नहीं देखी है?” पापा ने पूछा। मैंने और मीता दोनों ने कहा, “वही तो! हम लोगों ने अब तक वह परीलोक नहीं देखा है पापा।”
“तुम लोग कश्मीर की बात तो नहीं कर रहे हो ना?” मम्मी ने पूछा तो मीता ने कहा, ”नहीं मम्मी, वह तो धरती का स्वर्ग कहलाता है।”
“तो तुम्हारा यह परीलोक कहां है?” मम्मी के साथ पापा ने भी पूछ लिया।
हमारी आंखें चमक उठीं। हमने कहा, “उत्तराखंड के चमोली जिले में।”
पापा हंसते हुए बोले, “फूलों की घाटी की बात कर रहे हैं ये? क्यों ठीक कह रहा हूं मैं?“
हमने हामी भरी तो उन्होंने कहा, “जरूर ले चलेंगे फूलों की घाटी की सैर पर। लेकिन, पहले परीक्षा में मन लगाओ।“
“वह तो हम पहले ही कह चुके हैं पापा,” हमने कहा।
वे बोले, “तो ठीक है, जून में चलेंगे वहां, पक्का।”
हमने भी ‘पक्का’ कहते हुए पापा-मम्मी की हथेलियों पर अपनी हथेलियां मारीं और पढ़ाई में जुट गए।
परीक्षाएं खत्म हुईं और हम फूलों की घाटी के सपने देखने लगे। एक दिन मीता ने पापा से कहा, “पापा आप कहते हैं, आपको सदा पहाड़ों के ही सपने आते हैं।“
“हां आते हैं,“ वे बोले।
“हमें इन दिनों फूलों की घाटी के ही सपने आ रहे हैं,” मीता ने मचलते हुए कहा तो पापा बोले, “मैं सब समझ रहा हूं तुम्हारी बात। तो, तुम लोग भी सुन लो। हम जून के तीसरे सप्ताह में जा रहे हैं फूलों की घाटी की सैर पर। अरे, वचन दिया है तो निभाएंगे भी। मैं पूरी योजना बना कर, हर इंतजाम कर चुका हूं।
“अच्छे पापा! अच्छी मम्मी!” कह कर मीता मम्मी-पापा के गले लग गई तो पापा बोले, “वहां ट्रैकिंग भी करनी है। यानी पैदल चलना होगा। मैंने यह भी पता कर लिया है कि तुम्हारी उम्र के बच्चे फूलों की घाटी में ट्रैकिंग कर सकते हैं।”
“तब तो बड़ा आनंद आएगा। हमारे लिए भी दो अच्छे पिट्ठू खरीद लीजिएगा,” मैंने कहा।
तभी मीता ने पूछा, “पापा आपने वहां के बारे में सब कुछ पता कर लिया है तो यह भी पता किया होगा कि इस सुंदर घाटी का पता कैसे लगा?“
“हां मैंने पता किया। कहते हैं सन् 1931 में चमोली जिले के उन पहाड़ों में एक अंग्रेज पर्वतारोही और वनस्पति विज्ञानी फ्रैंक स्मिथ घूम रहा था। घूमते-घूमते वह वहां भटक गया और भ्यूंडार घाटी में पहुंच गया। हां, वहां के लोग उस घाटी को भ्यूंडार घाटी ही कहते थे। तो, क्या हुआ कि स्मिथ ने जब वहां अपने आसपास और दूर-दूर तक देखा तो उसे पूरी घाटी में रंग-बिरंगे फूल ही फूल नजर आए। लगता था, जैसे वहां प्रकृति ने फूलों के गलीचे बिछा दिए हों।“
“अच्छा तो फिर?”
“फिर क्या, उसे स्थानीय लोगों ने रास्ता बता दिया। बाद में उसने उस सुंदर घाटी के बारे में एक किताब लिखी जिसका नाम रखा, “वैली आॅफ फ्लावर्स’ यानी ‘फूलों की घाटी’। तब से वह स्थान फूलों की घाटी कहलाने लगा।”
“पापा बड़ी रोमांचक कहानी है यह,“ मैंने कहा तो पापा बोले, “रोमांचक के अलावा दर्दनाक भी है।”
“दर्दनाक क्यों?” मम्मी ने पूछा।
“इसलिए कि सन् 1939 में एक और वनस्पति विज्ञानी युवती जोआन मार्गरेट लेगे वहां गई। फूलों की उस दुनिया को देख कर वह इतना रम गई कि पता ही नहीं लगा, कब पैर फिसला। और, इस हादसे में उसकी जान चली गई। बाद में उसकी बहिन ने उसकी याद में वहां उसकी समाधि बना दी,” पापा ने कहा।
हमें यकीन हो गया कि इस बीच पापा ने फूलों की घाटी के बारे में खूब जानकारी पता कर ली है। और, जून में एक दिन हम अपनी कार में सवार होकर दिल्ली से 225 किलोमीटर दूर ऋषिकेश पहुंचे। वहां गंगा किनारे, शाल के पेड़ों के बीच एक होटल में रात बिताई। सुबह भरपेट नाश्ता करके हम जोशीमठ के लिए चल पड़े। पापा ने बताया ऋषिकेश से जोशीमठ 260 किलोमीटर दूर है। रास्ते में हमने देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के संगम पर गंगा को बनते देखा। हम शाम के पांच बजे के आसपास जोशीमठ पहुंच गए जहां की ठंडी हवा ने हम में नए प्राण भर दिए। वहंा गढ़वाल मंडल विकास निगम के पर्यटक गृह में रात्रि विश्राम किया।
सुबह हम एक घंटे की यात्रा के बाद गोविंदघाट पहुंचे। पापा ने वहां भी पर्यटक गृह में पहले से ही बुकिंग करा दी थी। कार से हम वहीं तक जा सकते थे। गोविंदघाट में हमने अपने-अपने पिट्ठू कसे और अगले पड़ाव घंगरिया की चैदह किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा पर निकल पड़े। मम्मी को पहली बार पिट्ठू पहने देख कर हमें बहुत मजा आया।
दिल्ली की समतल सड़कों पर चलने की आदी हमारी मांसपेशियां पिड़ाने लगी थीं लेकिन मन के उत्साह के सामने उनकी एक-न-चली। घंगरिया में भी पहले से बुकिंग होने के कारण हमें ठहरने-खाने की कोई कठिनाई नहीं हुई।
पापा ने सुबह-सुबह कतार में लग कर फूलों की घाटी में प्रवेश के लिए टिकट खरीद लिए। ठीक 7 बजे हम घाटी की सैर पर निकल गए। हमें बताया गया कि वहां घूम-घाम कर ड़ेढ़ बजे दोपहर तक वापसी की यात्रा शुरु कर दें ताकि पांच बजे तक घंगरिया वापस पहुंच जाएं। पांच बजे बाद फूलों की घाटी में कोई नहीं जा सकता। वहां तब केवल प्रकृति रहती है।
हम आगे बढ़ते जा रहे थे और आंखें चारों ओर का सौंदर्य देखते हुए थकती नहीं थीं। चारों ओर ऊंचे पहाड़ों की चोटियां, बीच में फूलों की घाटी और घाटी के बीच में बहती शुद्ध जल की पुष्पावती नदी। आसपास नाना प्रकार के रंग-बिरंगे वनफूल और उन पर मंडराती तितलियां। एक बार तो एक प्यारी-सी तितली आकर मीता के कंधे पर बैठ गई। पुष्पावती नदी के दोनों ओर हरियाली के आंचल में लाल, पीले, नीले, गुलाबी, बैंगनी और सफेद रंग के फूलों की छटा दिखाई दे रही थी।
मीता और मैं वनस्पति विज्ञान पढ़ाने वाली मम्मी से फूलों के बारे में पूछते रहे। वे कुछ फूलों के अंग्रेजी नाम और कुछ के वैज्ञानिक नाम बता रही थीं। उन दिनों वहां गुलाबी रंग के जिरेनियम, हिमालयन ब्यल, मोरिना, पीले रंग का आॅक्जेलिस और गागीया के फूल खिले थे। नीले वायोला और खुशबू बिखेरते जंगली गुलाब के सफेद फूलों पर हमारी आंखें टिकी रह गईं। जगह-जगह जंगली स्ट्राबेरी यानी फ्रेगेरिया के फूल भी खिले थे। पापा ने कहा, “मुझे बताया गया है कि पुष्पावती नदी के किनारों खिले फूलों को न तोड़ें। वे विषैले हो सकते हैं। सुन रहे हो मीता, मयंक, इन सुंदर, मनमोहक फूलों को बचाने के लिए प्रकृति ने इन्हें विषैला बना दिया है।”
मीता ने कहा, “पापा, मम्मी इतने फूलों के बारे में बता रही हैं। आप जूलोजी पढ़ाते हैं, यहां के जीव-जंतुओं के बारे में बताइए ना?”
पापा बोले, “देखो, तितलियां तो खुद ही आकर तुमसे मिल रही हैं। कई और कीट पतंगे भी आसपास घूम कर देख रहे हैं कि ये पिट्ठू लटकाए दोपाए मनुष्य यहां क्या कर रहे हैं। मीता की बांह पर सुंदर लेडीबग चल रही है। और, बेटे शुक्र मनाओ कि हमें अभी तक यहां का कोई काला या भूरा भालू नहीं दिखा, न लाल लोमड़ी आसपास फटकी। लेकिन हां, वह देखो, वहां उस चट्टान के पास कस्तूरी मृग खड़ा है। उसके मुंह के दोनों ओर निकले दांत तो देखो!”
वहां भालू होते हैं सुन कर हम तो डर ही गए थे। लेकिन, पापा ने कहा, “डरने की कोई बात नहीं। वे यहां आदमियों के आसपास नहीं आते। तभी सामने की चट्टान पर बैठे एक नीले, सुंदर पक्षी की ओर इशारा करके वे बोले, “वह देखो, मोनाल है वह।
उत्तराखंड का राज्यपक्षी।”
डेढ़ बज चुका था। यानी लौटने का समय हो चला था। हम उस परीलोक को जी भर कर देखते हुए वापस लौटे। रास्ते में साफ पानी के कई झरनों ने हमें ‘बाई-बाई’ कहा, कई सोतों के पानी में हमने अपनी परछाईं देखी और कई छोटी-छोटी पानी की धाराओं ने हमें अपना कल-कल गीत सुनाया। पक्षी भी चहक कर शायद हमें विदाई दे रहे थे। राह में एक जगह हमने जोआन मार्गरेट रेगे की समाधि भी देखी जो फूलों की दुनिया में ही समा गई थी।
अपनी यादों में फूलों की घाटी को संजो कर हम थके-थकाए घंगरिया पड़ाव पर लौटे। रात में वहां फूलों की घाटी के सपने देखने के बाद सुबह-सुबह गोविंदघाट को चल पड़े। वहां से हम जोशीमठ आ गए और वहां रात्रि विश्राम किया। सुबह तरो-ताजा होकर ऋषिकेश और अगली सुबह चिलचिलाती गर्मी में तप रही अपनी दिल्ली की ओर चल पड़े। बस, सुकून केवल इस बात का था कि पापा ने स्टीरियो पर मक़दूम मोहिउद्दीन की लिखी और लता मंगेशकर-तलत महमूद की गाई ग़ज़ल ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की’…. लगा दी थी।

देवेंद्र मेवाड़ी

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