मसूदा में मेला (4)

देवमाली गांव
                          देवमाली गांव

पास के खेत में एक बड़ा पेड़ दिखा तो मैंने कहा, “यहां मैंने नीम भी देखा है कानाराम जी, उत्तर प्रदेश के लोकगीतों में नीम का बहुत वर्णन किया गया है। एक गीत में बेटी कहती है, “बाबा, नीम के पेड़ को मत काटना, नीम तो चिड़ियों का बसेरा हैं। हम बेटियां भी बाबा चिरैयां की तरह हैं।” यहां भी तो होगा किसी लोकगीत में नीम का वर्णन?”
“क्यों नहीं? है ना, जैसेः
नीम की निंबोली मीठी लागै
नीम रो बाग लगा दे रे रसिया। ”
मुझे अंधेरे में कुछ दूर रोशनियां चमकती हुई दिखाई दीं तो पूछा, “वे रोशनियां कहां की हैं कानाराम जी? कोई बस्ती लगती है?”
“जी, गांव है वह, दुनिया का अनोखा गांव-देवमाली।”
“अनोखा कैसे?”
“इस गांव में सभी घर कच्चे हैं, मिट्टी से बने हुए। यहां कोई भी सीमेंट-कंक्रीट का घर नहीं बना सकता।”
“क्यों?”
“यहां के लोगों की मान्यता है कि उनके देवता गुर्जर देवनारायण जी कह गए हैं कि पक्के घर में केवल वह रहेंगे। बाकी सभी कच्चे घरों में रहेंगे।”
“कितने परिवार होंगे इस गांव में?”
“दो-ढाई सौ परिवार। कई लोग पढ़-लिख कर बड़े ओहदे पर भी काम कर रहे हैं लेकिन यहां गांव में उनका घर भी कच्चा ही है। स्कूल, पंचायत घर और स्वास्थ्य केन्द्र पक्का है। इसे हैरिटेज गांव घोषित किया गया है,” उन्होंने कहा।
वे बताते जा रहे थे, “इस गांव के लोग चूल्हा जलाते हैं। किसी भी घर में न एसी है, न कूलर। कोई भी मांस नहीं खाता, न शराब पीता है। लोग घरों में ताला नहीं लगाते, फिर भी आज तक कोई चोरी नहीं हुई। गांव की सारी जमीन की रजिस्ट्री गांव वालों के नाम नहीं बल्कि देवता देवनारायण के नाम है।”
“तब तो सचमुच अनोखा है देवमाली गांव। इस बार तो समय ही नहीं मिला। अगली बार इस गांव को देखने जरूर चलेंगे,” मैंने कहा।
रात के अंधेरे में हम पहाड़ियों के बीच सड़क पर तेजी से ब्यावर की ओर बढ़ते रहे। और हां, ब्यावर नाम सुन कर मुझे लगा कि अंग्रेजी में ब्यावर की वर्तनी तो ‘बी ई ए डब्लू ए आर’ है, लेकिन ‘ब्या’ के लिए ‘बी वाई’ क्यों नहीं है? इस रहस्य का पता मुझे दिन में मसूदा की विज्ञान खोजशाला में स्वादिष्ट खिचड़ी खाते समय लगा। लेकिन, यह किस्सा होटल पहुंचने के बाद।
साढ़े नौ बजे बाद पहुंचे होटल और कानाराम जी गौरव के साथ विज्ञान खोजशाला को लौट गए। उन्हें सुबह फिर आना था, मुझे अजमेर तक छोड़ने के लिए। उनके जाने के बाद मैंने दिन का किस्सा याद किया। हुआ यह कि अंगे्रजों को जब नगर से इमरजेंसी में बेटाइम बाहर निकलना पड़ता तो उन्हें हिदायत दी जाती- ‘बी अवेयर!’ यानी सावधान रहना। कुछ लोग कहते हैं, यह ‘बी अवेयर’ ही आगे चल कर ‘ब्यावर’ हो गया।
“अरे वाह, तभी शायद इसकी वर्तनी में ‘ई’ को छोड़ कर पूरा ‘बी अवेयर’ है!”
“तो सुनिए, ब्यावर शहर फैलता गया। आज भी इसका भीतरी भाग प्राचीनकाल का है जिसमें बाज़ार है। बाहरी भाग में कालोनियां, होटल वगैरह हैं।
खिचड़ी की कोई खुशबू अभी तक नहीं आई थी। मैं सोच रहा था, पता नहीं क्या हुआ? सोचा, पूछ ही लेता हूं। तो पूछा, “धीरज जी आप खिचड़ी की बात कर रहे थे। मेरे लिए वही ठीक रहेगी।”
वे बोले, “हां, बस अभी बन जाती है। आपको बढ़िया खिचड़ी खिलानी है।”
“देर हो गई है, मैंने सोचा कुछ और तो नहीं बनने लगा। मैं दूसरी चीज खाता नहीं।”
“नहीं सर, खिचड़ी ही बन रही है। असल में उसमें डालने के लिए गोभी, गाजर, प्याज, पनीर वगैरह बाजार से मंगाया है। वह बस आता ही होगा,” धीरज जी बोले।
मैंने कहा, “आप बेकार कष्ट कर रहे हैं। केवल चावल और मूंग की दाल से काम चल जाता।”
“अच्छा, यह तो बताइए उस कर्नल डिक्शन का क्या हुआ? उसका कोई स्मारक है ब्यावर में?” मैंने पूछा।
“सुनते हैं पहले था, लेकिन अब कुछ नहीं है। कर्नल के निधन के बाद कहते हैं उसे नगर में क्रास के हृदय स्थल पर दफनाया गया। बाद में वहां पर संगमरमर का सुंदर स्मारक बनाया गया। लेकिन, आजादी मिलने के बाद वह नष्ट कर दिया गया। आज उसका कोई नामो-निशां नहीं है।”
तब तक सब्जियां ही नहीं पनीर भी आ चुका था और फटाफट कुकर में खिचड़ी चढ़ा दी गई। बाकी साथी भी बातचीत में शामिल होते रहे। कुकर की सीटी के साथ ही खिचड़ी की खुशबू भी हवा में फैल गई। कुछ देर बाद थाली में जब खिचड़ी आई तो उसकी भीनी सुगंध ने जता दिया कि खिचड़ी वाकई बढ़िया बनी है।
खैर, अभी तो मुंह में खाती जी के घर में बने खाने का ताजा स्वाद था। सोने की तैयारी करते-करते नेट से यह बड़ी जानकारी भी हाथ लग गई कि स्काटलैंड के प्रसिद्ध गणितज्ञ डंकन समरविले का जन्म भी 1879 में इसी ब्यावर में हुआ था। वे जलरंगों के सिद्धहस्त कलाकार भी थे।
अगले दिन 11 बजे कानाराम जी और गौरव मुझे साथ लेकर अजमेर को रवाना हुए। रास्ते में दो-ढाई घंटे उनसे खूब बातें हुईं। दसेक दिन बाद होली आने वाली थी। तो, कानाराम जी से मैंने पूछ लिया, “होली यहां कैसी होती है?”
“जम के होती है। खूब रंग पड़ता है। लोग मस्त होकर होली गाते हैं।”
“क्या गाते हैं, जैसे?” मैंने पूछा।
ठंडाई पीकर जैसे वे गाते हैं: “गांजो पी ले रे, म्हारा भोला यमनी!”
“होली के कोई और बोल?”
कानाराम बोले, “हां प्यार से यह भी गाते हैं:
भर पिचकारी रे, छोरा के माथा ऊपर मारी
भर पिचकारी रे, छोरी का लहंगा ऊपर मारी!”
बातें करते-करते हम अजमेर रेलवे स्टेशन पहुंच गए। मैंने उनसे विदा ली और अजमेर-नई दिल्ली शताब्दी पकड़ कर दिल्ली को रवाना हुआ। खट-खटाक-खट्….खट-खटाक-खट्!
(अंतिम किस्त)

 

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