मसूदा में मेला (3)

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दोनों ओर फैले खेतों के बीच से दूर तक दिखती सड़क पर हम लगातार आगे बढ़ते जा रहे थे। मुझे लग रहा था जैसे पैंतीस नहीं पचासों किलोमीटर दूर है वह जगह। खैर, तब तक विजय नगर आ गया। उसे पार कर आखिर हम नगर पहुंच गए। वहां बच्चे और विज्ञान खोजशाला के प्रभारी राजेन्द्र खाती हमारा इंतजार कर रहे थे। देखा, सारे बच्चे सांझ को पेड़ों पर लौटी चिड़ियों की तरह चहचहा रहे थे। मैं चौंका कि आखिर बात क्या है? पास पहुंचने पर पता लगा कि वे हम मेहमानों के लिए स्वागत के बोल बोल रहे थे।
हम सभी विज्ञान खोजशाला के आंगन में एक पेड़ की छांव में बैठ गए। बच्चों से बातचीत शुरू की। वे सभी ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे थे और जिज्ञासाओं से भरे थे। बहुत सवाल थे उनके मन में। मैंने उन्हें एक छोटी-सी कहानी सुनाई कि रेल के एक डिब्बे में दो यात्री सफर कर रहे थे। उनमें से एक ने दूसरे से पूछा- क्या तुम भूतों पर विश्वास करते हो? उसने कहा- नहीं तो, और गायब हो गया!’ बच्चे हैरान। मैंने उनसे कहा, दोस्तो इस कहानी के बारे में सोचते रहो। तब तक मैं विज्ञान खोजशाला में तुम्हारे बनाए माडल देख लेता हूं।
प्रभारी खाती जी ने मुझे पहले एक कमरा दिखाया जिसमें छत से प्लास्टिक की पानी भरी बोतल और एल्युमिनियम की पन्नी से सूर्य की रोशनी भीतर अंधेरे कमरे में पहुंच रही थी। कमरे में पूर्णिमा की रात जैसी चांदनी छिटकी हुई थी। उन्होंने कहा, गरीब बस्तियों में झुग्गी-झोपड़ियों के भीतर दिन में भी अंधेरा रहता है। वहां इस तरह कमरों में उजाला फैलाया जा सकता है। फिर उन्होंने एक और कमरा दिखाया जो बाहर की तुलना में बहुत ठंडा था। उन्होंने बताया कि उसकी दीवारें और छत पुराने तरीके से मिट्टी थाप कर बनाई गई हैं। यानी, यहां राजस्थान के सूखे इलाकों में हमारा घर बनाने का पुराना, परंपरागत तरीका सही था जिससे उन घरों के भीतर ठंडा रहता था। उसके बाद उन्होंने वे तमाम माडल और पोस्टर दिखाए जो विज्ञान खोजशाला के बाल विज्ञान मित्रों ने बनाए थे।
लौट कर बच्चों से बातें शुरू कीं। पूछा, “कहानी कैसी लगी?” बच्चों ने कहा, “अच्छी।”
मैंने फिर पूछा, “क्या ऐसा हो सकता है?”
बच्चे सोच में पड़ गए। तब मैंने ही कहा, “नहीं, ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि भूत केवल कल्पना में होते हैं। हमें डराने के लिए बचपन में भूतों की कहानियां सुनाई जाती हैं और हमारे मन में उनका डर बैठ जाता है। इसलिए दोस्तो, हमें भूतों की कहानी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। किसी ने देखा है आज तक भूत? किसी ने नहीं।”
“देखा है, इसने देखा है,” एक बच्चे ने दूसरे बच्चे की ओर इशारा करके कहा। वह बच्चा खड़ा उठा। मैंने उससे पूछा क्या तुमने भूत देखा?”
“हां, भूतनी देखी। वह गूजरी थी।”
“कहां देखी?”
“वहां सामने उस पानी की ऊंची टंकी से वह नीचे कूदी।”
“तुम्हें भरम हुआ होगा?”
“नहीं, वह फिर कूदी। उतनी ऊंचाई से तीन बार कूदी,” उसने कहा।
मैंने कहा, “आज तक इस दुनिया में किसी ने भूत या भूतनी को आमने-सामने नहीं देखा है। हम लोग विज्ञान के युग में जी रहे हैं। हमें केवल उसी चीज पर विश्वास करना चाहिए जिसके बारे में साबित हो जाए कि वह चीज है। भूत का तो अभी तक कोई सबूत मिला ही नहीं है। अच्छा, यह बताओ, किसी और ने भी उसे देखा?”
सभी बच्चे चुप रहे। यानी, और किसी ने भी उसे नहीं देखा। पता लगा उस बच्चे की तबियत खराब थी, बुखार था। उसे जरूर भ्रम हुआ होगा। फिर मैंने उन्हें समझाया कि अपने आप से न कोई प्रकट हो सकता है, न गायब हो सकता है। जानवरों में बच्चों की रूचि देख कर मैंने उन्हें एक मजेदार लोककथा सुनाई।
उनमें एक छोटा-सा बच्चा था, नरेंद्र। उसकी जिज्ञासा हर चीज के बारे में थी- धरती, आकाश के बारे में, आसमान में चमकते चांद-तारों और सूरज के बारे में, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के बारे में। न केवल जिज्ञासा थी बल्कि इनके बारे में उसे कई बातों की जानकारी भी थी। उसके सवाल सुन कर मैं चकित होता रहा और सहज रूप से आशीर्वाद दिया कि तुम जीवन में खूब सफल होगे। सदैव प्रश्न पूछते रहना। बाकी बच्चों से भी कहा कि दोस्तो, अपने आसपास की दुनिया को जानने की सदैव कोशिश करते रहना। सूरज ढल चुका था। मैंने सभी बच्चों को पश्चिम के आकाश में हीरे की तरह चमकता वीनस यानी शुक्र ग्रह दिखाया जिसे देख कर वे बहुत खुश हुए। उन्हें पता लग गया कि वह कोई तारा नहीं बल्कि ग्रह है।
17021968_1185220664925322_2655218073189711300_n1111111देर काफी हो चुकी थी। इतनी कि खाती दम्पति का बड़े मन और मेहनत से बनाया स्वादिष्ट भोजन भी उनके घर पर खाने के बजाय हमने पैक करा लिया। खाती जी ने बड़े प्यार और आदर से हमें पगड़ी भी पहना दी। उनसे विदा लेकर हम अंधेरे में लगभग 70 किलोमीटर दूर ब्यावर की ओर रवाना हुए। गाड़ी कानाराम जी चला रहे थे और मैं बगल की सीट में बैठा सवाल पर सवाल पूछता रहा।
अंधेरे में सड़क के दोनों ओर बबूल की झाड़ियां अब काली दिखाई दे रही थीं। मैंने पूछा, “अच्छा, कानाराम जी, मैं तो इन झाड़ियों को बबूल-बबूल कह रहा हूं। आप क्या कहते हैं इन्हें अपनी भाषा में?”
“हम इसे बुल्यो कहते हैं। देशी बुल्यो और अंगे्रजी बुल्यो। इस इलाके में यह इतना अधिक क्यों है, जानते हैं?”
“नहीं, मुझे पता नहीं।”
“यहां मारवाड़ इलाके के एक बड़े किसान नेता हुए हैं नाथूराम मिर्धा। एम एल ए, एम पी भी रहे, मंत्री भी। यहां के सूखे इलाके को हरा-भरा बनाने के लिए उन्होंने आस्ट्रेलिया से अंग्रेजी बुल्यो के बीज मंगा कर हैलीकाप्टर से छिटकवाए थे सन् साठ के दशक में। वही बबूल है यह।”
(कल अंतिम किस्त)

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