मसूदा में मेला (2)

DSCN128911चलते-चलते एक जगह तार पर बैठी पंडुक की आवाज सुनाई दी तो मैंने पूछा, “अच्छा, ये बताओ लक्ष्मण, इस चिड़िया को यहां क्या कहते हैं? यह हमारे यहां पहाड़ों में भी होती है।”
लक्ष्मण थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला, “यहां अच्छी नहीं मानी जाती यह?”
मैं चौंका, “अरे क्यों? हमारे यहां तो यह बहुत अच्छी मानी जाती है। हम इसे घुघुती कहते हैं। हमारे लोकगीतों में भी है यह।”
तभी पीछे की सीट पर बैठे गौरव ने गीत की पंक्तियां सुना दीं, “नीं बास घुघुती चैत की/नराई लागे मां मैंत की!”….
मैंने कहा, “इसका मतलब है- ‘चैत माह की घुघुती, तू मत बोल/मुझे अपने मायके की याद आने लगती है।……कु कु कु कू कू कू….!”
“ना, ना सा, यहां तो इसके गाने को अपशकुन मानते हैं। कहते हैं, यह गाती है कि मैं तेरा सब बर्बाद कर दूंगी। घर का खंडहर बना दूंगी। वैसी जगहों पर ही तो बोलती है यह। लोग इसे सुनते नहीं, भगा देते हैं।”
मैं हैरान होकर सोचने लगा- लोक में कितने मिथ होते हैं? पहाड़ों में इसे बेटी को मायके की याद दिलाने वाली चिड़िया माना जाता है और यहां इसी को पनौती मानते हैं? ऐसा क्यों?
पथरीली पहाड़ियों और खेतों को पार करते हुए हम चले जा रहे थे। सिंचाई का तो मतलब ही नहीं था, पूरी वर्षाधीन खेती थी। फिर भी कई जगह गेहूं की पुष्ट बालियों वाली एकसार फसल दिखाई दी। बीच-बीच में बस्तियां आतीं जो वहां मंगरा कहलाती हैं। एक जगह पहाड़ी के मोड़ से निकल ही रहे थे कि एक आदमी सूखी डामर की सड़क पर हाथ जोड़ कर दंडवत मुद्रा में लेटा हुआ दिखाई दिया। अभी देख ही रहे थे कि वह खड़ा उठा और फिर हाथ जोड़ कर उससे आगे दंडवत लेट गया।
“यह क्या है?” मैंने पूछा।
“मन्नत मांगी होगी इसने। रामदेवरा जा रहा होगा,” लक्ष्मण ने बताया।
“क्या आसपास ही है वह जगह?”
“नहीं सा, जैसलमेर जिले में पोखरण की तरफ है रामदेवरा गांव। वहां रामदेवरा महाराज की समाधि है। एक बावड़ी भी है वहां। कहते हैं उसमें नहाने से कुष्ठ रोग भी ठीक हो जाता है। बड़ी मान्यता है रामदेवरा की।”
“तो वहां तक इस गर्मी में, ऐसे ही जमीन पर लेटते-उठते ही जाएगा यह आदमी?”
“हां संकल्प कर रखा होगा।”
यह आस्था का एक रूप था। शायद ऐसे ही कठोर संकल्प से लोग हिमालय की चोटियों तक में चढ़ जाते हैं, रेगिस्तानों को पार कर जाते हैं। हम बात कर ही रहे थे कि एक तीतर तेजी से सड़क पार करके पहाड़ी की ओर चला गया।
खैर पेड़-पौधों को देखते, पहचानते, बातें करते हम सड़क किनारे मसूदा की बाल विज्ञान खोजशाला में पहुंच गए। वहां मेले की बड़ी हलचल थी और आसपास के गांवों से स्कूली बच्चों का आना शुरू हो चुका था। विज्ञान खोजशाला में उसके प्रभारी कानाराम जी और दूसरे साथियों से भेंट हुई। राजेंद्र खाती, धीरज शर्मा, महेश चंद्र, जूली सेन, श्रीमती ललिता, श्रीमती कमला शर्मा, गोविंद और सीमा सभी मुस्तैदी से व्यवस्था में जुटे हुए थे।
विज्ञान मेले में आने वाले बच्चों में बहुत उत्साह था। वे बड़ी उत्सुकता से उन माडलों को देख रहे थे जिन्हें 65 विज्ञान-मित्र बच्चे पूरे आत्म विश्वास के साथ समझा रहे थे। एक ओर बच्चे ऊर्जा बचाने और सौर, पवन तथा जल ऊर्जा पर बनाए गए अपने विशेष माडल दिखा रहे थे। दिन भर में 964 बच्चों और 38 शिक्षकों ने मेला देखा। सांझ ढलते-ढलते मैं वापस ब्यावर के अपने होटल में लौट आया। सूरज पश्चिम में क्षितिज पर पहुंच चुका था और पक्षियों की टोली होटल के पीछे के पेड़ों पर आकर चहचहा रही थी।
अगला दिन विज्ञान की कहानी सुनाने का दिन था। विज्ञान खोजशाला के हाल में मैंने बच्चों से विज्ञान की तमाम बातें कीं और उन्हें किस्सागोई में सौरमंडल की सैर कराई। बच्चों को कहानियां सुनाने के बाद कुछ वक्त विज्ञान खोजशाला के साथियों के साथ गपशप में बीता। मैंने अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखीं। पूछा, “हमारे यहां जिस पंडुक चिड़िया को इतने प्यार से देखते हैं, उसे यहां बुरी नजर से देखने का क्या कारण होगा?”
“शायद इसलिए कि वह अकसर खंडहरों और वीरान जगहों में दुख भरी आवाज में बोलती है। लोगों ने सोच लिया होगा, इसे किसी ने दुःख दिया होगा, इसलिए यह बदला लेनी की बात कहती होगी,” धीरज शर्मा बोले।
“यहां इसे कहते क्या हैं?”

घुघुती
घुघुती

“डेकण,” उन्होंने कहा।
मैंने सोचा, यानी हमारी घुघुती यहां डेकण बन कर दिन काट रही है। सर्दियों में प्रवास पर आती होगी, फिर लौट जाती होगी। मैंने उनसे ‘नी बास घुघुती चैत की….’ लोकगीत का जिक्र किया तो धीरज शर्मा बोले, “लोकगीत में तो यहां भी इसका किस्सा कहा गया है।”
“अच्छा? क्या कहा गया है शर्मा जी?”
“कहते हैं कभी किसी सास ने अपनी बहू से इतना अधिक काम कराया कि दुखी होकर उसके प्राण पखेरू उड़ गए और वह चिड़िया बन गई। अत्याचारी सास मर कर डेकण बन गई और आज तक कहती फिरती हैः
उठ बहू पीसे जहूं
कु कु कु……..कू कू! ”
मैंने खुश होकर कहा, “वाह, यह हुई न बात। मुझे लग रहा था, यहां के लोकगीतों में इसका कहीं तो कोई जिक्र होगा।”
दोपहर बाद हम मसूदा से 35 किलोमीटर दूर नगर गांव की बाल विज्ञान खोजशाला के बच्चों से मिलने गए। हम यानी मैं, कानाराम जी और गौरव। मसूदा कस्बे से निकलते समय कानाराम जी ने ऊपर ऊंचाई पर खड़े मसूदा किले की ओर इशारा किया और कहा, “वहां सोलहवीं सदी का एक किला और हवेली है। कहते हैं, तब के राजा की सेना में एक सैनिक था- मसूद। उसने किले की रक्षा में अपनी जान की बाजी लगा दी थी। उसी के नाम पर यहां का नाम मसूदा रखा गया।”

(जारी है)

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