मसूदा में मेला

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कानाताल से देहरादून और देहरादून से दिल्ली। दून शताब्दी से देर रात नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे और घर के लिए भागते-भागते एयरपोर्ट मैट्रो पकड़ी। किसी तरह साढ़े बारह-एक बजे द्वारका घर पर पहुंचे। मन का अलार्म बार-बार बजता रहा कि कल दोपहर बाद आश्रम एक्सप्रेस से ब्यावर के लिए निकलना है, इसलिए नींद और विश्राम जरूरी है। यह सोच कर सो गया। यात्रा के बारे में गहराई से सोचने लगता हूं तो अक्सर नींद में यात्रा पर होता हूं। सपने में ट्रेन खट-खटाक, खट-खटाक चल रही होती है। स्टेशन और यात्री दिख रहे होते हैं। यहां तक कि मेजबान भी मिल जाते हैं। उस रात भी यही हुआ। बल्कि, अवचेतन में कानों में ये सुर भी सुनाई देते रहे- ‘पधारो म्हारे देश!’ लगता था, कानाराम जी गा रहे हैं।

सुबह उठा तो अभी दिल्ली में ही था। सबसे पहले रक-सैक को खाली करके उसमें ब्यावर, मसूदा की यात्रा के लिए कपड़े और जरूरी चीजें रखीं। प्रथम साइंस प्रोग्राम के गौरव बोहरा ने फोन पर बताया कि वे मेरे साथ उसी ट्रेन में चल रहे हैं। सुन कर खुशी हुई कि चलो एक से दो भले। यों भी मैं राजस्थान के उस अपरिचित क्षेत्र में पहली बार जा रहा था।

खैर, रेलवे स्टेशन पहुंचा, प्लेटफार्म का पता लगाया और पीठ पर दस-बारह किलो भारी रक-सैक लादे अपने डिब्बे की तलाश में दूर तक चलता रहा, चलता रहा। उस दिन पहली बार लगा, ट्रेन आखिर इतनी लंबी क्यों होती है। प्लेटफार्म के दूसरे छोर पर जाकर वह डिब्बा मिला जिसमें मेरी आरक्षित बर्थ थी। इंतजार का काफी वक्त था, इसलिए प्लेटफार्म के उस वीरान से हिस्से में कुछ दूर पड़ी बैंच पर बैठने का इरादा किया। सामने की ओर सिर से पैर तक चादर से मुंह ढांपे कोई सोया हुआ था। मैं बैंच के पिछले हिस्से में सामान उतार कर टहलने लगा। सुना था, कई बार नजर चूकते ही ऐसी लेटी हुई निश्चल चीजें सामान के साथ चंपत भी हो जाती हैं। इसलिए आसपास ही रहा। इस बीच एक मां ने दो बच्चों के साथ फर्श पर बैठ कर रोटियां खाईं। हाथों में स्टील की चेनें और ताला-चाबी के गुच्छे लटकाए दो युवक आकर कुछ दूर पड़ी दूसरी बैंच पर बैठ गए। एक कनमैलिया भी कंधे पर चमड़े का छोटा-सा, चीकट बैग लटकाए ग्राहक की तलाश में चक्कर लगा गया। उसे शायद लगा नहीं कि मैं कान का मैल निकलवा सकता हूं।

भूख लग आई थी। लहसुन की पत्तियों के अचार के साथ लपेटा हुआ एक आलू पराठा था, धीरे-धीरे खा लिया। तभी रेहड़ी पर सामान लेकर एक आदमी आकर सामान सजाने लगा- पानी की बोतलें, कोल्ड ड्रिंक, नमकीन वगैरह। उससे पानी की बोतल खरीदी और इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद कंधे में बैग लटकाए, एक युवक ने आकर पूछा, “आप मेवाड़ी जी?”

मैंने पूछा, “गौरव?”

“हां गौरव बोहरा, प्रथम साइंस प्रोग्राम से।” वह हमारी पहली मुलाकात थी। काफी देर बातें करते रहे। ट्रेन के दरवाजे खुले तो गौरव मुझे मेरे डिब्बे में छोड़ने आए। उनका आरक्षण दूसरे डिब्बे में था लेकिन हम फोन से जुड़े रहे। दोपहर बाद 3.20 बजे आश्रम एक्सप्रेस अहमदाबाद के लिए चल पड़ी। रात को ढंग से सो नहीं पाया था, इसलिए सोने की कोशिश में लेट गया। बीच-बीच में उठ कर खिड़की से बाहर झांकता। गुड़गांव, रेवाड़ी, अलवर स्टेशन निकले। दिन ढल रहा था। सांवली पहाड़ियों के पीछे बीच-बीच में ढलता सूरज दिखाई देता। उसकी सुनहरी किरणों में दूर-दूर तक गेहूं की पकी फसल, गांव-घर और पेड़-पौधे धुंधले होते जा रहे थे। चांद आज गैरहाजिर था। आसमान में यहां-वहां तारे दिखाई देने लगे। ट्रेन हमें रात बारह बजे ब्यावर स्टेशन पर उतार कर आगे बढ़ गई। हम आटो लेकर साढ़े बारह बजे होटल श्री पहुंचे और जल्दी-जल्दी खाना खा कर सो गए। सुबह वहां से 28-30 किलोमीटर दूर मसूदा पहुंचना था, बाल विज्ञान मेले में।

सुबह साढ़े पांच बजे होटल के ठीक पीछे बस्ती में खड़े हरे-भरे, घने पेड़ में बैठी गौरेयों के चहचहाने से नींद खुली। तैयार होकर बाहर आया और सामने मसूदा रोड पर काफी दूर तक टहलने निकल गया। राह में बिजली के तारों पर बैठी गौरेयां, दो-एक फाख्ते यानी पंडूक और मैनाएं दिखीं। यहां मैनाएं एकदम काली-सफेद और आकार में थोड़ा छोटी थीं। लगता है, वे एशियन पाईड स्टार्लिंग यानी अबलक मैना थीं तभी तो बुलबुलों के बराबर दिखाई दे रही थीं। तार पर बैठा एक अकेला फाख्ता बोल रहा था- को को को……कु कु कु….कू! कुछ दूर बबूल की शाख पर बैठी एक छोटी पंडूक अपनी ही धुन में गा रही थी- कु कु….कू! तभी सामने गली में पांच-सात गौरेयों के झुंड में से दो नर गौरेयां चिचियाती हुई आपस में एक-दूसरे पर टूट पड़ीं। अच्छा हुआ कि एक दूधिया अपना केन लिए वहां आ गया तो वे झगड़ा भूल कर उड़ गईं। सड़क के दूसरी ओर एक बड़ी गौशाला थी।

साढ़े नौ बजे सारथी लक्ष्मण आ गया और हम मसूदा के लिए चल पड़े। यह अरावली की पथरीली पहाड़ियों का क्षेत्र है। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गए, यहां-वहां पहाड़ियां नज़र आने लगीं। हम अंधेरी देवरी गांव से आगे बढ़े। चारों ओर रूखी-सूखी जमीन और जलवायु। इक्के-दुक्के पेड़ दिखने पर लक्ष्मण से उनके नाम पूछता रहा। वह बताता, “वो देखो सा, वो खेजड़ी। और, वो ज्वाड़ा। वह नीम है और वह पीपल।”

मैंने पूछा, “इन्हें तो जानता हूं। लेकिन, बबूल की झाड़ियां यहां बहुत हैं।”

“हैं तो सही लेकिन बेकार। किसी काम की नहीं।”

“अरे, इनके कारण तो इतनी हरियाली है?”

“बस हरियाली ही है, जानवरों के किसी काम की नहीं,” लक्ष्मण बोला।

“क्यों, क्या भेड़-बकरियां भी नहीं खातीं?”

“ना, न भेड़-बकरियां, न ऊंट, न गाय-बैल। असल में यह है अंग्रेजी बबूल। इसे जानवर नहीं खाते। बस, एक ही काम आता है ये – जलाने के काम। ईंधन की समस्या हल हो गई इससे,” लक्ष्मण ने बताया।

मैंने पूछा, “यह अंग्रेजी है तो फिर देशी बबूल कौन-सा है?”

“वो देखो सा, वो है जो पेड़ जैसा दिखाई दे रहा है, वह है देशी बबूल। उसे हमारे जानवर खाते हैं।”

“लक्ष्मण, लेकिन यहां अंग्रेजी बबूल तो बहुत दिखाई दे रहा है? जलाने के लिए काटते हैं, फिर भी इतना अधिक क्यों है?”

“वही तो बात है। अगर इसे काटते न रहें तो चारों तरफ यही फैल जाएगा। खेतों में भी। लेकिन, ये ऐसी चीज है कि खतम नहीं होता, बढ़ता ही रहता है।”

“चलो ईंधन की एक बहुत बड़ी समस्या तो दूर हुई इससे अन्यथा यहां न कोई जंगल है न पेड़,” मैंने कहा।

(जारी है)

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