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सिसुणा को साग

असल में लोकोक्ति है- “मंडुवा की रोटी भली, सिसुणा को साग।” बचपन में सुना ही सुना था। सिसुणा का साग बनता बहुत कम घरों में था। फिर भी, जहां बनता था, चखने को मिल जाता था। लेकिन, सच यह है कि जो सम्मान इसे मिलना चाहिए था, वह अब तक …

मंडुवा की रोटी भली

कल मंडुवा की रोटी खाई। एक लेसुवा भी खाया। बहुत आनंद आया। दिनों-महीनों बाद मंडुवा की रोटी मिलने पर पाई हुई जैसी …

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हरियाली में किताबें

बाल साहित्य में विज्ञान की बात करके जून के आखिरी दिन देहरादून से दिल्ली लौटा ही था कि अलसुबह रेलवे स्टेशन जाकर …

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अनोखी है हमारी सरजमीं

स्याह रातों में कभी तारों भरा आसमान देखा है आपने? अगर हां तो आसमान में आरपार फैली कहकशां और उसके चमकते बेशुमार …

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दास्तान-ए-गौरेया

आज (20 मार्च) दास्तानगोई का दिन भी है और नन्ही गौरेया का दिन भी। हमारे आसपास सदा घुंघरुओं की खनक-सी आवाज में …

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लौट आई हैं बुलबुलें

मौसमे-बहार की खबर पाकर हमारे शहर में भी लौट कर आने लगी हैं बुलबुलें। इन दिनों अलस्सुबह सन्नाटे में एक अकेली बुलबुल …

अलौकिक प्रेम

    ‘विज्ञान कथा? आपका मतलब है साइंस फिक्शन?’ ‘हां’ कहते ही उन्हें  दूसरी ओर से हंसने की आवाज सुनाई दी। ‘साइंस …

विज्ञान परिक्रमा 2015

विज्ञान परिक्रमा 2015

विज्ञान की अनेक नई विस्मयकारी खोजों से मानव जीवन तथा समाज पर विज्ञान की गहरी छाप छोड़ कर वर्ष 2015 विदा हो …